- मानसिक चिंताधारा बदलने से बदलती हैं हथेली की रेखाएँ मिलते हैं अपेक्षित परिणाम – डॉ सुरेश झा ।
Jamshedpur (Nagendra) 32वें अंतरराष्ट्रीय ज्योतिष सेमिनार के दूसरे दिन का शुभारंभ देश-भर से पधारे सभी ज्योतिष विद्वानों के मंच पर सम्मान के उपरांत मेडिकल एस्ट्रोलॉजी सत्र से हुआ। इस अवसर पर रांची से आए प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डॉ. नागेंद्र कुमार ने अपने वर्षों के शोध एवं अनुभव के आधार पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। डॉ. नागेंद्र कुमार ने बताया कि यदि कुंडली में शनि-केतु की युति के साथ यूरेनस का प्रभाव हो, तो विशेष रूप से गॉलब्लैडर से संबंधित रोग एवं शल्य चिकित्सा की प्रबल संभावना बनती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि यह योग कुंडली के षष्ठ से अष्टम भाव के मध्य स्थित हो, तो संबंधित कैंसर की आशंका और अधिक बढ़ जाती है।
सत्र के दौरान नेपाल से पधारे प्रतिनिधियों द्वारा सभी उपस्थित ज्योतिष विद्वानों को नेपाली पारंपरिक टोपी एवं नेपाली रुद्राक्ष पहनाकर सम्मानित किया गया, जिससे कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सौहार्द का सुंदर दृश्य देखने को मिला। दिन के दूसरे सत्र में सेमिनार के आयोजक एवं निदेशक प्रो. डॉ. एस. के. शास्त्री ने एस्ट्रो-पामिस्ट्री विषय पर प्रकाश डालते हुए कुंडली में ग्रहों की स्थिति और हथेली के सामंजस्य का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने हथेली की जैव-रासायनिक (Biochemical Property Valuation) विशेषताओं के आधार पर सटीक फलादेश की वैज्ञानिक संभावना पर अपने विचार रखे।
इसके पश्चात डॉ. सुरेश झा ने मानसिक चिंता, तनाव एवं भावनात्मक दबाव के कारण हथेली की रेखाओं में होने वाले परिवर्तनों तथा उनसे प्राप्त होने वाले अपेक्षित फलादेश पर महत्वपूर्ण सूत्र प्रस्तुत किए, जिसे विद्वानों द्वारा विशेष सराहना मिली। कार्यक्रम के दौरान डॉ. संजीव झा एवं पद्मा झा ने भी अपने ज्ञान एवं अनुभव साझा करते हुए बताया कि किन्नरों के हाथ में शनि एवं चंद्रमा के प्रभाव के साथ मस्तिष्क रेखा प्रायः विकृत पाई जाती है, जो उनके मानसिक एवं भावनात्मक ढाँचे की विशिष्टता को दर्शाती है। कार्यक्रम के अंत में बड़ी संख्या में उपस्थित आम जनमानस को निशुल्क ज्योतिषीय परामर्श का लाभ प्रदान किया गया, जिससे सेमिनार का सामाजिक सरोकार भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ।
कार्यक्रम के संचालन एवं समन्वय में डॉ. तपन रॉय, डॉ. राजेश भारती, जे. वी. मुरलीकृष्ण, अभिजित चक्रवर्ती बाबू, विचित्र बेड़ा एवं आयुष कुमार का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा। इनके कुशल संचालन, अनुशासन एवं समर्पण के कारण सेमिनार के सभी सत्र सुचारु रूप से संपन्न हो सके।





































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