Upgrade Jharkhand News. आज जब हम स्वतंत्र भारत की सड़कों पर निर्भय चलते हैं, अपने सपनों के लिए अवसर तलाशते हैं और भविष्य की योजनाएँ बनाते हैं, तब यह याद रखना आवश्यक है कि यह स्वतंत्रता हमें सहज रूप में नहीं मिली। यह उन असंख्य बलिदानों की देन है, जिनमें एक नाम अत्यंत उज्ज्वल है—सूर्य सेन, जिन्हें देश ने स्नेह से ‘मास्टरदा’ कहा। उनकी स्मृति केवल अतीत का अध्याय नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए चेतावनी और भविष्य के लिए दिशा है। मास्टरदा की कहानी हमें यह सिखाती है कि क्रांति का अर्थ केवल हथियार उठाना नहीं होता। वे एक शिक्षक थे—और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। उन्होंने युवाओं को केवल विद्रोह के लिए तैयार नहीं किया, बल्कि विचार, अनुशासन और नैतिक साहस से लैस किया। उनका विश्वास था कि बिना वैचारिक स्पष्टता के कोई भी आंदोलन टिकाऊ नहीं हो सकता। आज के युवाओं के लिए यह सीख अत्यंत प्रासंगिक है, जब सूचनाओं की भीड़ में दिशा भटकने का खतरा बढ़ गया है।
18 अप्रैल 1930 का चटगांव शस्त्रागार कांड इतिहास की वह घड़ी है, जब कुछ साहसी युवाओं ने एक संगठित नेतृत्व के साथ ब्रिटिश साम्राज्य को सीधी चुनौती दी। यह केवल सैन्य कार्रवाई नहीं थी—यह गुलामी की मानसिकता के विरुद्ध उद्घोष था। टेलीफोन-टेलीग्राफ लाइनों को काटना, शस्त्रागार पर धावा बोलना और स्वतंत्र सरकार की घोषणा—ये सब प्रतीक थे उस साहस के, जो भय से ऊपर उठ चुका था। मास्टरदा ने यह दिखाया कि संगठित इच्छाशक्ति साम्राज्य की नींव हिला सकती है। युवाओ, मास्टरदा की क्रांति की एक विशिष्ट पहचान थी—समावेशिता। उन्होंने युवाओं के साथ-साथ महिलाओं को भी अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया।
प्रीतिलता वाडेदार, कल्पना दत्त, अनन्त सिंह जैसे नाम यह प्रमाण हैं कि उनकी दृष्टि संकीर्ण नहीं थी। वे जानते थे कि स्वतंत्रता संग्राम तभी सफल होगा, जब समाज का हर वर्ग उसमें सहभागी बने। आज, जब समानता और न्याय पर प्रश्न खड़े होते हैं, मास्टरदा की यह सीख हमें अपने संघर्षों को अधिक व्यापक और मानवीय बनाने का संदेश देती है। मास्टरदा की स्मृति का सबसे मार्मिक अध्याय उनकी गिरफ्तारी और बलिदान है। 1933 में विश्वासघात के कारण वे पकड़े गए। जेल में उनके साथ अमानवीय यातनाएँ की गईं—शरीर को तोड़ने की कोशिश हुई, मनोबल को कुचलने का प्रयास हुआ। लेकिन वे नहीं टूटे। 12 जनवरी 1934 को फांसी पर चढ़ाया गया वह शरीर अंग्रेज़ी सत्ता के लिए भय का कारण था। इसी भय के चलते उनका शव तक परिवार को नहीं सौंपा गया। परंतु इतिहास ने यह सिद्ध कर दिया कि विचारों को फांसी नहीं दी जा सकती।
आज तुम्हारे सामने चुनौतियाँ अलग रूप में हैं। आज का संघर्ष बंदूकों से नहीं, बल्कि चरित्र, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से लड़ा जाना है। भ्रष्टाचार, असमानता, हिंसा, असहिष्णुता—ये सब हमारे समय की गुलामियाँ हैं। मास्टरदा की स्मृति हमें यह पूछने पर विवश करती है: क्या हम इन गुलामियों के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखते हैं? क्या हम शिक्षा को केवल डिग्री तक सीमित रखेंगे, या उसे समाज-परिवर्तन का माध्यम बनाएँगे?मास्टरदा का आह्वान युवाओं से यह भी कहता है कि देशभक्ति केवल उत्सवों और प्रतीकों तक सीमित न रहे। यह रोज़मर्रा के कर्म में प्रकट हो—ईमानदारी से काम करना, कमजोर के पक्ष में खड़ा होना, संविधान के मूल्यों का सम्मान करना और असहमति को शालीनता के साथ व्यक्त करना। वे सिखाते हैं कि अनुशासन बिना स्वतंत्रता अराजकता बन जाता है, और स्वतंत्रता बिना अनुशासन खोखली हो जाती है।
आज का युवा डिजिटल युग का नागरिक है। विचार तेज़ी से फैलते हैं, पर उतनी ही तेज़ी से भ्रम भी। ऐसे समय में मास्टरदा की स्मृति हमें ठहरकर सोचने, तथ्यों को परखने और विवेकपूर्ण निर्णय लेने का संदेश देती है। क्रांति का अर्थ उग्रता नहीं, बल्कि सत्य के प्रति अडिग प्रतिबद्धता है। युवाओ, स्मृतियाँ तब जीवित रहती हैं जब वे कर्म में बदलती हैं। सूर्य सेन को याद करना केवल श्रद्धांजलि नहीं—यह प्रतिज्ञा है कि हम अपने समय के अन्याय के विरुद्ध खड़े होंगे, शिक्षा को अपना सबसे सशक्त हथियार बनाएँगे और राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखेंगे। यह प्रतिज्ञा है कि हम साहस को संवेदना से, और शक्ति को नैतिकता से जोड़ेंगे।
मास्टरदा चले गए, पर उनका स्वप्न आज भी अधूरा नहीं—वह हर उस युवा की आँखों में जीवित है, जो बेहतर भारत का सपना देखता है। यही स्मृति का आह्वान है—उठो, सोचो, संगठित होओ और अपने समय की जिम्मेदारी संभालो। यही सूर्य सेन ‘मास्टरदा’ को सच्ची श्रद्धांजलि है।

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