- मुंबई में लोहड़ी का सबसे बड़ा संगम
- मुंबई की आग में सजी 4 बंगला की ऐतिहासिक लोहड़ी
Mumbai (Anil Bedag) मुंबई की भागदौड़ भरी ज़िंदगी के बीच, जब कहीं आग के चारों ओर गीत, गिद्धे और भांगड़े की ताल गूंजे, तो समझ लीजिए वहाँ पंजाब की रूह सांस ले रही है। अंधेरी स्थित गुरुद्वारा 4 बंगला में आयोजित लोहड़ी का 24वां भव्य उत्सव कुछ ऐसा ही नज़ारा लेकर आया—जहाँ श्रद्धा, संस्कृति और सामूहिक उल्लास ने मिलकर इतिहास रच दिया। करीब 2,000 से अधिक लोग, विभिन्न समुदायों और पृष्ठभूमियों से, इस आयोजन में शामिल हुए और इसे मुंबई की सबसे बड़ी सार्वजनिक लोहड़ी के रूप में स्थापित किया। यह सिर्फ एक पर्व नहीं था, बल्कि परंपराओं को जीवित रखने का एक भावनात्मक संकल्प भी था।
इस ऐतिहासिक परंपरा की नींव वर्ष 2002 में स्वर्गीय सरदार सरदार सिंह सूरी जी ने रखी थी। तत्कालीन अध्यक्ष के रूप में उनका सपना था—मुंबई में बसे पंजाबी समुदाय के लिए ऐसा स्थान बनाना, जो “घर से दूर एक घर” जैसा महसूस हो। पवित्र अग्नि के चारों ओर एकत्र होकर संस्कृति, आस्था और अपनापन साझा करना ही इस आयोजन की आत्मा रही है। आज उनके इस सपने को पूरे समर्पण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं उनके पुत्र और वर्तमान अध्यक्ष सरदार जसपाल सिंह सूरी जी। उनके नेतृत्व में यह उत्सव हर वर्ष और अधिक भव्य होता गया है, लेकिन इसकी परंपरागत आत्मा और मूल भावना आज भी वैसी ही बनी हुई है।
गुरुद्वारे के पीछे स्थित खुले मैदान में आयोजित इस समारोह में जाति और धर्म से परे हर किसी का स्वागत किया गया। सिख परंपरा के अनुरूप सभी को समान रूप से प्रसाद वितरित किया गया—जिसमें रेवड़ी, गज्जक के साथ-साथ भोजन में ब्रेड पकौड़ा, जलेबी, पुलाव और दूध शामिल था। पवित्र लोहड़ी अग्नि, रंगीन आतिशबाज़ी और पंजाबी संगीत पर झूमता जोशीला भांगड़ा माहौल को जीवंत बना रहा। प्रसिद्ध कलाकार जग्गी संधू की विशेष प्रस्तुति ने उत्सव में चार चांद लगा दिए। आयोजन की व्यवस्थाओं में सरदार मनिंदर सिंह सूरी की सक्रिय भूमिका भी सराहनीय रही।
इस अवसर पर भावुक शब्दों में सरदार जसपाल सिंह सूरी जी ने कहा, “लोहड़ी कृतज्ञता, एकता और आशा का पर्व है। यह सर्दियों के अंत और नई फसल की खुशी का प्रतीक है। मेरे पिता ने मुंबई जैसे व्यस्त शहर में हमारी परंपराओं को जीवित रखने के लिए इसकी शुरुआत की थी, और आज हजारों लोगों को एक साथ देखना उसी सोच की सफलता है।” 24 वर्षों की यह निरंतर यात्रा इस बात का प्रमाण है कि जब परंपरा, समर्पण और सामूहिक प्रयास साथ चलते हैं, तो संस्कृति किसी भी शहर में अपनी जड़ें मजबूती से जमा सकती है—और गुरुद्वारा 4 बंगला इसकी सबसे सुंदर मिसाल बन चुका है।



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