महाशिवरात्रि ( ऋषि बोधोत्सव) पर विशेष
Upgrade Jharkhand News. समाज में भिन्न भिन्न प्रकार से जातीय विभेद उत्पन्न किये जाने से उपजी समस्याओं का एकमात्र निदान युगपुरुष महर्षि दयानन्द की शिक्षाएं हैं, जिनका अनुपालन करके व्यक्ति 'सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्' की भावना से मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने जिस तार्किक आधार पर मानव मात्र की भलाई के लिए आर्यसमाज की स्थापना की, उस आधार पर देश में जातीय संकीर्णता को समाप्त कर कल्याणकारी समाज की रचना की जा सकती है। सर्व विदित है कि भारतीय समाज में विघटन व बिखराव का एक बड़ा कारण अन्धविश्वास एवं पाखंड है। धार्मिक आडंबर एवं पाखंड के चलते आम आदमी तर्क की कसौटी पर सामाजिक व धार्मिक व्यवस्थाओं को परख नहीं पाता तथा किसी व्यक्ति या विचार का अंधानुकरण करने लगता है। उसकी स्थिति उस अंध भेड़ जैसी होती है, जिसे केवल भीड़ का हिस्सा बने रहने में संतुष्टि मिलती है। ऐसी स्थिति में महर्षि दयानंद की शिक्षाएं ही देश को सही दिशा प्रदान कर सकती है।
गुजरात के टंकारा गांव में जन्मे बालक मूल शंकर के महर्षि दयानंद बनने का सफर फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि पर्व की उस रात्रि से प्रारंभ हुआ, जब अपने पिता की आज्ञा से बालक मूल शंकर ने व्रत रखकर गाँव के शिवालय में रात्रि जागरण किया। मन में श्रद्धा भाव लिए वह भगवान शिव के ध्यान में मग्न थे, कि उन्होंने देखा कि एक मूषक शिव की पिंडी पर चढ़ाए गए प्रसाद को खा रहा है। मूल शंकर के मन में प्रश्न उपजा कि जो शिव चूहे से अपनी रक्षा नहीं कर सकते , वह भला सच्चे शिव कैसे हो सकते हैं। मूल शंकर ने तभी सच्चे शिव की खोज का प्रण लिया तथा सत्य की खोज में निकल पड़े। तदुपरांत उन्हें मथुरा में जन्मांध गुरु विरजानंद जी से शिक्षा दीक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला, जिन्होंने उन्हें वेदों व संस्कृत का ज्ञान दिया तथा समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया।
वेदों के प्रचार और समाज सुधार के उद्देश्य से 10 अप्रैल 1875 को महर्षि दयानंद सरस्वती ने बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। बाद में वर्ष 1877 में इसका मुख्यालय लाहौर में स्थानांतरित कर दिया गया तथा देश भर में आर्य समाज का विस्तार हुआ। मानव कल्याण के उद्देश्य से तर्कसंगत जीवन शैली अपनाने के लिए आर्य समाज ने दस नियम बनाए, जिसमें पहला नियम था - सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उनका आदिमूल परमेश्वर है। संसार को चलाने वाली परम शक्ति की अवधारणा में दूसरा नियम है - ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करने योग्य है। ज्ञान के भंडार वेदों के संबंध में कहा गया - वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है। वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है। जीवन एवं सत्य की उपयोगिता के सन्दर्भ में स्पष्ट किया गया कि सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने के लिए सर्वदा उद्यत रहना चाहिए। सब कार्य धर्मानुसार अर्थात सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए।
सर्वमंगल कामना करते हुए नियम बनाया गया, कि संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। सामाजिक समरसता की दृष्टि से कहा गया, कि सबसे प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य व्यवहार करना चाहिए। अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए। सबका साथ और सबका विकास की भावना से जुड़ा नियम कि प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट नहीं रहना चाहिए, वरन सबकी उन्नति में ही अपनी उन्नति समझनी चाहिए, आज सर्वाधिक प्रासंगिक है। स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराओं के निर्वहन में आर्य समाज का नियम महर्षि दयानन्द की दूरगामी दृष्टि का परिचायक है, कि सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने परतंत्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतंत्र रहें। कहना गलत न होगा कि स्वस्थ लोकतंत्र एवं सामाजिक समरसता बनाए रखने के लिए युग निर्माता महर्षि दयानंद सरस्वती की शिक्षा से देश की सभी समस्याओं का निदान संभव है। डॉ. सुधाकर आशावादी




































No comments:
Post a Comment