Upgrade Jharkhand News. देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जिस प्रकार का अराजक वातावरण बनाया जा रहा है तथा समाज में विघटनकारी प्रदर्शनों से जातीय वैमनस्यता को बढ़ावा दिया जा रहा है, वह भले ही सत्ता को अस्थिर करने का मंसूबा पालने वाली शक्तियों के लिए हर्ष का विषय हो, लेकिन देश के लिए गंभीर चिंता का विषय है। सोशल मीडिया एवं विभिन्न संचार माध्यम अपने संकीर्ण स्वार्थ के लिए जिस प्रकार से जातीय विघटनकारी विमर्श पर अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं, उससे प्रश्न उत्पन्न होता है, कि जिन पर देश में शांति, सद्भाव, समरसता बनाये रखने का दायित्व है, वे अपने दायित्व से विमुख होकर अराजक तत्वों के मंसूबों को सींचने में अपना सहयोग प्रदान क्यों कर रहे हैं। कौन नहीं जानता, कि देश में बढ़ती जनसंख्या गंभीर मुद्दा है, बिना स्पष्ट एवं कठोर जनसंख्या नीति के देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। देश के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अधिकाधिक हो रहा है। जल और आवास की मूलभूत सुविधाएं भी लोगों को मयस्सर नहीं हैं। वोट के लालच में कतिपय राजनीतिक दल इस मुद्दे पर गंभीर नहीं हैं। कुछ राजनीतिक दल तो घुसपैठियों को संरक्षण प्रदान करके कुछ प्रदेशों में सत्ता सुख भोग रहे हैं। लंबे समय से देश में समान नागरिक संहिता लागू किये जाने की वकालत की जा रही है, किन्तु राजनीतिक कारणों से इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
देश को राजनीति की प्रयोगशाला बनाने में सभी दल सामाजिक समरसता और गुणवत्ता परक शिक्षा से खिलवाड़ करने में लगे हैं। जिन प्रतिभाशाली छात्र छात्राओं को अध्ययन करके राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभानी चाहिए थी,वे शिक्षण कक्ष की जगह सड़कों पर ढपली बजाकर सामाजिक समरसता का विरोध करने पर आमादा हैं। उन्हें आजाद भारत में न जाने कौन सी आजादी चाहिए। जिस दौर में हाथ का कारीगर अपनी मजदूरी स्वयं तय कर रहा है, तथा अपनी शर्तों पर कार्य कर रहा है, बिना किसी भेदभाव के एक दूसरे के साथ बैठकर भोजन करता है, उस दौर में शिक्षा के क्षेत्र में जातिगत भेदभाव विमर्श प्रस्तुत करके जनमानस में नफरत की दीवार खड़ी करने के पीछे कौन सी शक्तियां खड़ी हैं, यह जाँच का विषय है। लोकतंत्र में मत भिन्नता होना स्वाभाविक है, किन्तु आपसी मतभेदों में राष्ट्र की एकता, अखंडता, सामाजिक समरसता जैसे मूल्यों की अवहेलना किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराई जा सकती। सो आवश्यक है, कि समाचार चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक नफरत परोसने वाले विमर्श पर प्रतिबंध लगे। प्रमाणिक तथ्यों के बिना प्रस्तुत किसी भी विचार या कथन को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा जाए। डॉ. सुधाकर आशावादी




































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