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Jamshedpur मन्मथनाथ गुप्त: क्रांति की मशाल और कलम के सिपाही Manmathnath Gupta: Torch of Revolution and Soldier of the Pen

 


Upgrade Jharkhand News. मन्मथनाथ गुप्त का जन्म 7 फरवरी, 1908 को वाराणसी में हुआ था। वे न केवल एक निडर क्रांतिकारी थे, बल्कि भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के सबसे प्रामाणिक इतिहासकारों में से एक भी थे। अमर उजाला के अनुसार, उनका जीवन 'कलम और पिस्तौल' के अद्भुत समन्वय का उदाहरण है।


प्रारंभिक जीवन और असहयोग आंदोलन -उनका बचपन विरासती देशभक्ति से ओत-प्रोत था। मात्र 13 वर्ष की आयु में, उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया और जेल गए। गांधी जी द्वारा चौरी-चौरा कांड के बाद आंदोलन वापस लेने से वे असंतुष्ट होकर सशस्त्र क्रांति की ओर मुड़ गए।


हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन और काकोरी कांड -मन्मथनाथ गुप्त, चंद्रशेखर आजाद और राम प्रसाद बिस्मिल के करीबी सहयोगी बने। 9 अगस्त, 1925 को हुए काकोरी ट्रेन एक्शन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस घटना के दौरान दुर्घटनावश चली एक गोली से एक यात्री की मृत्यु हो गई थी, जिसके कारण उन्हें कड़ी सजा दी गई। कम उम्र होने के कारण वे फांसी से तो बच गए, लेकिन उन्हें 14 वर्ष की कठोर कैद हुई।


जेल का जीवन और वैचारिक परिवर्तन -जेल की काल कोठरी उनके लिए एक विश्वविद्यालय बन गई। यहाँ उन्होंने मार्क्सवाद और विश्व साहित्य का गहरा अध्ययन किया। उन्होंने अनुभव किया कि केवल बंदूक से आजादी नहीं मिलेगी, बल्कि जनता की चेतना को जगाना भी जरूरी है।


साहित्यिक यात्रा: इतिहास का लेखन -आजादी के बाद, उन्होंने अपनी कलम को हथियार बनाया। उनकी पुस्तक 'भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास' को इस विषय पर सबसे विश्वसनीय स्रोत माना जाता है। उन्होंने दर्जनों उपन्यास, संस्मरण और वैचारिक पुस्तकें लिखीं।  जो उनके बौद्धिक विस्तार को दर्शाती है।


निष्कर्ष और विरासत -26 अक्टूबर, 2000 को इस महान सपूत का निधन हुआ। वे अंतिम समय तक लेखन के माध्यम से नई पीढ़ी को क्रांतिकारी मूल्यों से जोड़ते रहे।


मन्मथनाथ गुप्त और भगत सिंह: वैचारिक एकता और समाजवाद का स्वप्न -मन्मथनाथ गुप्त और शहीद-ए-आजम भगत सिंह के बीच का संबंध केवल दो क्रांतिकारियों का नहीं, बल्कि दो प्रखर वैचारिक साथियों का था। दोनों ही हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन  के आधार स्तंभ थे। 


सशस्त्र क्रांति से समाजवाद की ओर - मन्मथनाथ गुप्त ने अपनी रचनाओं में स्पष्ट किया है कि भगत सिंह की तरह वे भी केवल सत्ता परिवर्तन के पक्ष में नहीं थे। दोनों का मानना था कि वास्तविक स्वतंत्रता तभी आएगी जब 'मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण' समाप्त होगा। वे रूसी क्रांति से प्रभावित थे और भारत में मार्क्सवादी चेतना लाना चाहते थे। जिस प्रकार भगत सिंह ने जेल से 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' जैसे लेख लिखे, मन्मथनाथ गुप्त ने भी जेल की सजा को अध्ययन और लेखन के अवसर में बदला। गुप्त जी ने अक्सर भगत सिंह को एक 'बौद्धिक क्रांतिकारी' के रूप में चित्रित किया। उन्होंने अपनी पुस्तक 'भगत सिंह और उनका युग' में विस्तार से बताया है कि कैसे भगत सिंह ने क्रांतिकारी आंदोलन को केवल भावुकता से निकालकर एक ठोस वैचारिक धरातल पर खड़ा किया।


धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण - दोनों ही क्रांतिकारी धर्म और अंधविश्वास के कट्टर विरोधी थे। मन्मथनाथ गुप्त ने अपनी आत्मकथा में उल्लेख किया है कि वे और भगत सिंह अक्सर धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के भविष्य पर चर्चा करते थे। उनका साझा विश्वास था कि जाति और धर्म के नाम पर बंटा समाज कभी पूर्ण स्वतंत्र नहीं हो सकता। भगत सिंह चाहते थे कि क्रांतिकारियों का इतिहास जनता तक पहुँचे। उनके शहीद होने के बाद, मन्मथनाथ गुप्त ने इस जिम्मेदारी को निभाया। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से यह सुनिश्चित किया कि भगत सिंह और उनके साथियों का बलिदान केवल वीरता की कहानी बनकर न रह जाए, बल्कि एक राजनैतिक विचारधारा के रूप में जीवित रहे।



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