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Bhopal महिलाओं के प्रति बाहरी नहीं, आंतरिक दृष्टि में बदलाव की जरूरत There is a need for change in the internal view of women, not the external one.

 


Upgrade Jharkhand News.  महिला दिवस के उपलक्ष्य में जब हम नारी शक्ति की चर्चा करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान केवल उनके आर्थिक सशक्तिकरण या कार्यक्षेत्र में उनकी भागीदारी तक ही सीमित रहता है। निसंदेह, आर्थिक स्वावलंबन महत्वपूर्ण है, परंतु यह स्त्री की प्रगति का अंतिम सोपान नहीं हो सकता। वास्तव में महिलाओं की सच्ची तरक्की तभी संभव है जब समाज में उनके प्रति दृष्टिकोण बदले और उन्हें वह सामाजिक सम्मान प्राप्त हो जिसकी वे अधिकारी हैं। स्त्री को केवल भोग की वस्तु या उपभोग की इकाई मानने की संकीर्ण मानसिकता का त्याग करना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। वह परिवार की मुख्य धुरी है, जिसके इर्द-गिर्द पूरे कुटुंब का अस्तित्व और संस्कार घूमते हैं। जब हम स्त्री के सम्मान की बात करते हैं, तो यह केवल बाहरी जगत तक सीमित नहीं होना चाहिए। स्वयं स्त्री को भी सास, बहू, ननद, भाभी, देवरानी और जेठानी जैसे विविध रिश्तों के रूप में अपने व्यवहार का आत्म-अवलोकन करने की आवश्यकता है। घर के भीतर एक महिला दूसरी महिला की शक्ति बने, तभी उसके होने की सार्थकता सिद्ध होगी। आपसी ईर्ष्या और द्वेष के स्थान पर यदि आत्मीयता का भाव हो, तो परिवार स्वर्ग बन जाता है। दुर्भाग्यवश, आज के दौर में कुछ स्वयंभू प्रगतिशील बुद्धिजीवी महिलाओं को पुरुषों का भय दिखाकर मातृशक्ति और पितृशक्ति को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। वे समाज को विभाजित करने पर उतारू हैं, जबकि सत्य तो यह है कि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक हैं। 


भारतीय संस्कृति ने तो सदा से ही स्त्री को प्राथमिकता दी है, जिसका प्रमाण हमारे आराध्य देवों के नामों में मिलता है। हम पहले सीता फिर राम कहते हैं, राधेश्याम कहते हैं, गौरीशंकर कहते हैं। यह क्रम दर्शाता है कि शक्ति के बिना शिव भी अपूर्ण हैं। ममता, सेवा और समर्पण नारी के वे सर्वोत्तम आभूषण हैं, जो उसे गरिमा प्रदान करते हैं, यह गुण पुरुषों में हो ही नहीं सकती। इन गुणों को कमजोरी समझना आधुनिकता का सबसे बड़ा भ्रम है। वहीं दूसरी ओर, पुरुष वर्ग को भी अपनी मानसिकता में विस्तार करने की आवश्यकता है। उन्हें उदार, क्षमाशील और स्त्रियों के प्रति सुरक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा। पुरुष का दायित्व केवल कमाना नहीं, बल्कि स्त्री के मान-सम्मान का रक्षक बनना भी है। महिला दिवस को किसी आलोचना या विवाद का विषय बनाने के बजाय हमें अपनी जड़ों को देखना चाहिए। भारत तो युगों-युगों से शक्ति का उपासक रहा है। हमारे इतिहास और लोक-परंपराओं में लंबे कालखंड से यह देखा गया है कि घरों और तिजोरियों की चाबियां परिवार की बुजुर्ग महिलाओं के पल्लुओं में बंधी रहती थीं। यह मात्र आर्थिक नियंत्रण नहीं, बल्कि घर की लक्ष्मी पर अटूट विश्वास का प्रतीक था। आज जरूरत है उन सनातन संस्कारों की ओर लौटने की, जहाँ पत्नी के सिवाय विश्व की समस्त महिलाओं को माँ, बहन और बेटी के रूप में देखा जाता है।


यदि हम इस पवित्र दृष्टि को पुनः आत्मसात कर लें, तो समाज से असुरक्षा और अनादर का भाव स्वतः समाप्त हो जाएगा। जिस दिन हम स्त्री को शरीर से परे एक आत्मा और शक्ति के रूप में देखना शुरू कर देंगे, संभव है कि हमें अलग से महिला दिवस मनाने की औपचारिकता की आवश्यकता ही न रहे। सनातन संस्कार ही वह पथ हैं जो हमें उस उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जा सकते हैं जहाँ नारी का अस्तित्व केवल संघर्ष का नहीं, बल्कि उत्सव का प्रतीक होगा। नारी शक्ति का यह जागरण ही समाज, राष्ट्र और विश्व के कल्याण का आधार बनेगा, क्योंकि जहाँ नारी पूजी जाती है, वहाँ देवता निवास करते हैं, इस सत्य को भारत के पुरुष वर्ग ने भी सहृदयता से स्वीकारा है। डॉ. राघवेंद्र शर्मा



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