- पशु क्रूरता पर राष्ट्रीय मंच बना "आईकेसी ”
Mumbai (Anil Bedag) मुंबई में ‘इंडिया करुणा कोलैबोरेटिव (आईकेसी)’ की शुरुआत के साथ आधुनिक खाद्य प्रणाली की उस छिपी कीमत पर ध्यान केंद्रित किया गया, जो अब तक आर्थिक और नीतिगत चर्चाओं से लगभग बाहर रही है। भारत की खाद्य और आर्थिक प्रणालियों में 1.5 अरब से अधिक फार्म पशु शामिल हैं, फिर भी उनके कल्याण और उनसे जुड़ी क्रूरता को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। “वन हेल्थ, वन प्लैनेट” दृष्टिकोण के तहत शुरू हुआ यह मंच जलवायु, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आर्थिक विकास की चर्चाओं में पशु कल्याण को शामिल करने का प्रयास करेगा। इस पहल से 50 से अधिक संगठन और विभिन्न क्षेत्रों के 70 से ज्यादा नेता जुड़े हैं। कार्यक्रम में मारिको के संस्थापक हर्ष मरीवाला ने कहा कि यह पहल केवल संवेदना की अपील नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने का प्रयास है जिसमें उत्पादन, उपभोग और नवाचार की प्रक्रियाओं में करुणा स्वाभाविक रूप से शामिल हो।
मोतीलाल ओसवाल, संस्थापक और प्रबंध निदेशक, मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड और आईकेसी के मेंटर ने कहा कि “इस आपसी संकट को संबोधित करना इतना कठिन इसलिए है, क्योंकि इसका बहुत कुछ जानबूझकर अदृश्य रखा गया है. हम दूध, अंडे, मांस का उत्पादन तो मापते हैं, लेकिन दुख और पीड़ा को नहीं मापते हैं. इस पीड़ा का पैमाना चौंका देने वाला है। ”इस अवसर पर जारी किए गए नए आंकड़े बताते हैं कि इस विषय को लेकर आम जनता पहले ही जागरूक और आगे है. आईकेसी द्वारा कमीशन किए गए एक राष्ट्रीय प्रतिनिधि सर्वेक्षण 2026 “वे महसूस करते हैं, हम परवाह करते हैं: फार्म पशुओं, उनके कल्याण और पौध-आधारित आहार के प्रति युवा भारत का दृष्टिकोण” के अनुसार, 70% प्रतिभागियों का मानना है कि फार्मिंग में उपयोग किए जाने वाले पशु संवेदनशील प्राणी हैं और वे पीड़ा महसूस करते हैं।
सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि डेयरी उत्पादों के 69% उपभोक्ता और मांस व अंडे के 50% से अधिक उपभोक्ता ऐसे उत्पादों के लिए 10% या उससे अधिक कीमत चुकाने को तैयार हैं, जिनमें पशु कल्याण के उच्च मानक अपनाए गए हों. इसके साथ ही, 53% प्रतिभागियों ने यह भी कहा कि वे अपने आहार में कुछ या सभी पशु प्रोटीन को पौध-आधारित विकल्पों से बदलने के लिए तैयार हैं. इस पर टिप्पणी करते हुए YouGov के जनरल मैनेजर (भारत और इंडोनेशिया) एडवर्ड हुतासोइट ने कहा, “आज का भारतीय उपभोक्ता सजग, समझदार और मूल्यों से प्रेरित है. वे मानते हैं कि पशु भी भावनाओं को महसूस करते हैं, वे उत्पादन प्रक्रिया में पारदर्शिता चाहते हैं, और वे उम्मीद करते हैं कि ब्रांड और सरकारें आपूर्ति श्रृंखलाओं में कल्याण मानकों को बेहतर बनाने में नेतृत्व की भूमिका निभाएं।”
पैनल चर्चा के दौरान श्री संजीव मेहता, एग्जीक्यूटिव चेयरमैन, एल कैटरटन इंडिया ने कहा, “जैसे-जैसे मांस उत्पादन और एंटीबायोटिक का उपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इसके आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव भी गंभीर होते जा रहे हैं। इसलिए व्यवसाय करनेवालों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे उद्देश्यपूर्ण सप्लाई चेन विकसित करें, जहां उसी नैतिकता, पारदर्शिता और स्थिरता के मानक लागू किए जाए जो हम अपने ब्रांड्स में अपनाते हैं। आखिरकार एक स्वस्थ समाज और टिकाऊ पारिस्थितिकी तंत्र ही दीर्घकालिक व्यावसायिक सफलता की आधारशिला हैं।”
अमला अक्किनेनी, संस्थापक, ब्लू क्रॉस ऑफ हैदराबाद, ने अपने विचार साझा करते हुए कहा: “आज जिन चुनौतियों का हम सामना कर रहे हैं, पशुओं की पीड़ा से लेकर पर्यावरणीय दबाव और कृषि पर बढ़ते बोझ तक, वे सभी गहराई से एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। गौरी मौलेखी, ट्रस्टी, पीपल फॉर एनिमल्स, ने कहा, “हम भोजन के लिए जिस तरह पशुओं का पालन-पोषण करते हैं, उसका मानव स्वास्थ्य से गहरा संबंध है। दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले लगभग 70% एंटीबायोटिक्स पशुपालन में उपयोग किए जाते हैं, मुख्यतः इसलिए क्योंकि पशुओं को अत्यधिक सघन और भीड़भाड़ वाली परिस्थितियों में रखा जाता है, जहाँ बीमारियाँ आसानी से फैल जाती हैं. फार्मों में पाले जाने वाले पशुओं को दिए जाने वाले एंटीबायोटिक युक्त चारे से लेकर भारत के कुछ हिस्सों में प्रचलित सीवेज-आधारित मछली पालन जैसी प्रथाओं तक, औद्योगिक खाद्य उत्पादन को बनाए रखने के लिए एंटीबायोटिक्स का उपयोग लगातार बढ़ता जा रहा है. हालांकि यह व्यवस्था लागत को कम बनाए रखती है, लेकिन इसकी दीर्घकालिक कीमत कहीं अधिक गंभीर है, क्योंकि यह एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस को तेज़ी से बढ़ावा दे रही है और घातक सुपरबग्स के उभरने का खतरा पैदा कर रही है. इस मुद्दे को सर्वोच्च स्तर पर भी स्वीकार किया गया है, जिसमें माननीय प्रधानमंत्री द्वारा की गई जरूरी बातें भी शामिल हैं, फिर भी इसे अब तक वह तात्कालिक और आवश्यक ध्यान नहीं मिल पाया है, जिसकी इसे सख्त आवश्यकता है।”

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