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Bhopal राजनीति में स्थाई निष्ठा मिथक या मजबूरी? Permanent loyalty in politics: myth or compulsion?

 


Upgrade Jharkhand News. किसी राजनीतिक दल के प्रति स्थाई निष्ठा का प्रश्न  हो या किसी निजी व्यापारिक प्रतिष्ठान में स्वामी के मनमाने आदेशों को स्वीकार करते हुए उसकी इच्छानुसार कार्य करने की मजबूरी, स्वतंत्रता का कोई भी पक्षधर किसी व्यक्ति या विचार का बंधुआ नही हो सकता। राजनीति में किसी व्यक्ति या दल के प्रति निष्ठाएँ बदलना नई बात नही है। आया राम गया राम की नीति भारतीय राजनीति में लंबे अरसे से प्रभावी रही है। जब जब भी कोई प्रभावशाली राजनेता दल बदल करता है, तब तब उसे ग़द्दार, विश्वासघाती जैसी संज्ञा प्रदान की जाती है। 


हाल ही में आम आदमी पार्टी के सात बड़े नेताओं ने आम आदमी पार्टी से नाता तोड़कर भाजपा का दामन थामा है, दल बदल का असली कारण तो वही बता सकते हैं, लेकिन इतना अवश्य है कि कोई भी प्रभावशाली व्यक्ति या तो पार्टी में उचित सम्मान न मिलने के कारण दल बदल करता है या किसी व्यक्ति की वैचारिक तानाशाही या दंभ से त्रस्त होकर। आम आदमी पार्टी का इतिहास भी इससे इतर नहीं है। जिस टीम ने राष्ट्र से भ्रष्टाचार दूर करने के उद्देश्य से ईमानदार सुशासन का दावा किया था तथा आडम्बर मुक्त राजनीति का संकल्प लिया था, वह स्वयं सुख सुविधाओं का मोह नही छोड़ सकी। ऐसे में अनेक संस्थापक सदस्यों को समय समय पर पार्टी से अलग कर दिया गया। 


कटु सत्य यही है कि राजनीतिक चरित्र में अवसरवादिता एवं स्वार्थ पूर्ण सोच निहित रहती है। आम आदमी पार्टी भले ही स्वयं को कितना भी दूध से धुला सिद्ध करने की बात करे, लेकिन राजनीतिक हमाम में सब दलों की स्थिति समान ही है। चाहे भाजपा हो या कांग्रेस, आम आदमी पार्टी हो या राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यू हो या अन्य कोई राजनीतिक दल, न जाने कब किस राजनीतिक दल या किस नेता से किसी का मोह भंग हो जाए यह पूर्व निश्चित नहीं होता। किसी भी राजनीतिक दल में व्यक्ति का सम्मान एवं तत्कालीन परिस्थितियाँ प्रभावशाली व्यक्ति के दल बदल की भूमिका तैयार करती है। इसी कारण यदा कदा दल बदल होता रहता है, कोई भाजपा से खिन्न होकर कांग्रेस या आम आदमी पार्टी का दामन थामता है, कोई आम आदमी या कांग्रेस से खिन्न होकर भाजपा की उँगली पकड़ता है। बहरहाल दल बदल रोकने के लिए संविधान में व्यवस्था की गई है। इसके उपरांत भी दल बदल होता है तथा उसका विरोध व समर्थन भी किया जाता है। यह जनता की समझ का विषय है कि वह किसे ग़द्दार मानती है और किसे राष्ट्र भक्त। 


बहरहाल लोकतंत्र में कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है, कि दल बदल करने वाले प्रभावशाली व्यक्तियों के दोनों हाथों में लड्डू रहते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, कि अनेक दलों की परिक्रमा करके आने वाले व्यक्तियों को विशेष नामधारी दलों ने मुख्यमंत्री जैसे विशेष पदों पर बिठाकर सम्मानित किया है तथा उन दलों के समर्पित कार्यकर्ताओं के हिस्से में केवल जनसभाओं में दरियाँ या कुर्सियाँ बिछाने का ही दायित्व आया है। डॉ. सुधाकर आशावादी



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