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Bhopal तपती गर्मी और जलवायु परिवर्तन की भीषण पदचाप Scorching heat and the terrible footsteps of climate change

 


Upgrade Jharkhand News. भारत इस समय जिस प्रचंड ग्रीष्म लहर और असामान्य ताप वृद्धि के दौर से गुजर रहा है, वह अब केवल मौसमी उतार-चढ़ाव का साधारण विषय नहीं रह गया है। यह हमारे पारिस्थितिक तंत्र में आ रहे उस गहरे असंतुलन की गवाही है, जिसे वैज्ञानिक जगत में 'जलवायु आपातकाल' पुकारा जा रहा है। हालिया शोध और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के तुलनात्मक आंकड़े डराने वाले हैं। वर्ष 2026 की यह गर्मी महज एक असामान्य परिवर्तन  है, देश के कई हिस्सों में पारा सामान्य से साढ़े चार डिग्री से लेकर छह डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया है। यह वृद्धि उस तबाही का स्पष्ट संकेत है जो हमारे जीवन, जीविका और जल संसाधनों को अपनी चपेट में ले रही है। स्कूलों की छुट्टी, सामान्य जन जीवन प्रभावित होना तय है। बढ़ती आग की घटनाएं , व्यापार पर असर , डिहाइड्रेशन , बीमारी आदि त्वरित प्रभाव हैं, पर दीर्घ कालिक असर भी समझना चाहिए।


तथ्यों के आईने में देखें तो भारत में बढ़ते तापमान का एक बड़ा कारण 'अल नीनो' के साथ-साथ वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती सांद्रता है। वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन के चलते वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर अब उस खतरनाक बिंदु को पार कर चुका है, जो पिछले आठ लाख वर्षों में कभी नहीं देखा गया। यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में बात करें, तो पिछले 120 वर्षों में भारत के औसत तापमान में लगभग पौन डिग्री सेल्सियस (0.7 डिग्री) की बढ़ोत्तरी हुई है। पहली नजर में यह आंकड़ा छोटा लग सकता है, लेकिन पृथ्वी के संतुलन के लिए तापमान में एक डिग्री का दसवां हिस्सा बढ़ना भी प्रलयकारी होता है। चिंताजनक बात यह है कि इस वृद्धि की गति पिछले तीन दशकों में पहले के मुकाबले कहीं अधिक तीव्र हुई है।


शहरी क्षेत्रों में स्थिति और भी भयावह है, जिसे वैज्ञानिक 'हीट आइलैंड इफेक्ट' कहते हैं। हमारे शहरों में बढ़ते कंक्रीट के जंगल और डामर की सड़कें दिन भर सूर्य की ऊष्मा को सोखती हैं और रातों को उसे वापस वायुमंडल में छोड़ती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि रातें भी ठंडी नहीं हो पा रही हैं, जिससे मानव शरीर को दिन भर की गर्मी से उबरने का प्राकृतिक अवसर ही नहीं मिल रहा। यह शहरी ढांचा गर्मी को कैद करने वाला एक ऐसा पिंजरा बन गया है जहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता। इस तापीय विभीषिका का सीधा प्रहार हमारी कृषि और खाद्य सुरक्षा पर पड़ रहा है। शोध बताते हैं कि तापमान में होने वाली हर एक डिग्री सेल्सियस की औसत वृद्धि गेहूँ की पैदावार को चार से पांच प्रतिशत तक घटा सकती है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की थाली पर संकट है। इसके साथ ही, बढ़ता 'आर्द्र तापमान' (हीट और ह्यूमिडिटी का मिश्रण) मानव सहनशक्ति की अंतिम सीमाएं लांघ रहा है। जब हवा में नमी और गर्मी एक साथ बढ़ती है, तो पसीना सूखना बंद हो जाता है और शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता। तटीय और मैदानी इलाकों में यह स्थिति अब जानलेवा स्तर तक पहुँचने लगी है।


पर्यावरणीय दृष्टिकोण से देखें तो उत्तर में हमारे ग्लेशियरों के पिघलने की दर अब पहले के मुकाबले दोगुनी हो चुकी है। यह स्थिति आने वाले समय में गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी बारहमासी नदियों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगाती है। दूसरी ओर, भीषण गर्मी के कारण बिजली की मांग ने हमारे ऊर्जा ग्रिडों पर अप्रत्याशित दबाव डाला है। यह एक आत्मघाती दुष्चक्र बन चुका है , जितनी अधिक गर्मी होगी, हम उतने ही ज्यादा एयर कंडीशनर चलाएंगे, और उन मशीनों को चलाने के लिए जितनी अधिक बिजली कोयले से पैदा होगी, वातावरण उतना ही ज्यादा गर्म होता जाएगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आपदा आने के बाद जागने की आदत छोड़कर 'जलवायु लचीलेपन' की दिशा में कार्य करें। मियावाकी पद्धति से सघन शहरी वनों का विकास, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार और 'नेट जीरो' उत्सर्जन के लक्ष्यों को समय से पूर्व प्राप्त करने की दृढ़ इच्छाशक्ति ही हमें इस संकट से बचा सकती है। विवेकपूर्ण नीति निर्धारण और जन-भागीदारी के बिना हम इस तपती धरती को शीतल नहीं कर पाएंगे। समय आ गया है कि हम विकास की अंधी दौड़ को प्रकृति के तराजू पर तौलें, वरना भविष्य की पीढ़ियों के हिस्से केवल झुलसी हुई जमीन और प्रदूषित हवा ही आएगी। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति के साथ हमारा सामंजस्य ही अब हमारे सामूहिक अस्तित्व की एकमात्र कुंजी है। विवेक रंजन श्रीवास्तव



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