Jamshedpur (Nagendra) पारंपरिक चिकित्सा, कृषि, वैज्ञानिक अनुसंधान और सतत निर्माण के क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि पंचगव्य आधारित जीवनशैली, देशी कृषि प्रणाली और पर्यावरण अनुकूल निर्माण तकनीकें न केवल स्वास्थ्य को बेहतर बनाती हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करती हैं। यह महत्वपूर्ण कार्यक्रम रोटरी क्लब जमशेदपुर के द्वारा आयोजित किया गया, जिसमें राजन कमानी की मुख्य भूमिका रही। कार्यक्रम में शहर के कई प्रतिष्ठित रोटेरियन्स शामिल हुए और पंचगव्य तथा देशी अनाजों के स्वास्थ्य लाभों की विस्तृत जानकारी प्राप्त की। इस अवसर पर पूर्वी सिंहभूम जिले के सीएमओ साहिर पाल की उपस्थिति भी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।
पंचगव्य जीवनशैली ,स्वास्थ्य संतुलन का आधार है : डॉक्टर मदन कुशवाहा
पंचगव्य आयुर्विज्ञान संस्थान, डोबो के संस्थापक डॉ. मदन सिंह कुशवाहा ने अपने संबोधन में कहा कि मानव शरीर का संतुलन वात (वायु), पित्त और कफ पर आधारित होता है, जबकि पंचभूत—आकाश, अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी—के संतुलन से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है। उन्होंने बताया कि पंचगव्य आधारित जीवनशैली प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने, पाचन तंत्र को सुधारने और समग्र स्वास्थ्य को संतुलित रखने में सहायक है। पारंपरिक अनुभवों के अनुसार यह कई दीर्घकालिक रोगों जैसे कैंसर, मधुमेह, न्यूरोलॉजिकल समस्याओं और किडनी रोगों में सहायक भूमिका निभा सकती है, हालांकि इसके लिए वैज्ञानिक प्रमाण और चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है। डॉ. कुशवाहा, जिन्हें पंचगव्य चिकित्सा में 16 वर्षों से अधिक का अनुभव है, ने बताया कि उन्होंने अनेक गंभीर रोगियों के उपचार में सफलता प्राप्त की है और वर्तमान में झारखंड पंचगव्य डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे हैं।
देशी कृषि और पोषण सुरक्षा पर जोर
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची के एग्रीबिजनेस इनक्यूबेशन सेंटर के प्रमुख सिद्धार्थ जायसवाल ने झारखंड की कृषि विशेषताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि यहां रासायनिक उर्वरकों का कम उपयोग, देशी बीज और देशी पशुधन एक बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि “पोषण सुरक्षा को विकास का मुख्य आधार बनाया जाना चाहिए। गो-आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती है, फसलों के पोषण स्तर को सुधारती है और लोगों की प्रतिरक्षा क्षमता को मजबूत करती है।”
आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र जायसवाल ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने जलवायु-सहनशील प्राकृतिक खेती तकनीकों पर देश के विभिन्न राज्यों में कार्य किया है और उनके नवाचारों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी मिल चुका है।
वैज्ञानिक प्रमाण की आवश्यकता
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR), नई दिल्ली के वैज्ञानिक डॉ. सिद्धार्थ बिस्वास ने पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक कसौटी पर परखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि “पंचगव्य एक प्राचीन ज्ञान प्रणाली है, लेकिन इसे आधुनिक चिकित्सा में स्वीकार्यता दिलाने के लिए Randomized Controlled Trial (RCT) जैसे वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक हैं।”उन्होंने यह भी बताया कि AYUSH और ICMR के बीच सहयोग से पारंपरिक उपचार पद्धतियों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जा रहा है, जो भविष्य में स्वास्थ्य प्रणाली को और मजबूत बना सकता है।
सतत निर्माण: स्वस्थ जीवन का आधार
माट्टी थेराप्यूटिक फाउंडेशन (MTF) के संस्थापक और भारतीय मृदा चिनाई परिषद के अध्यक्ष डॉ. आकाश सिन्हा ने पर्यावरण अनुकूल निर्माण तकनीकों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सुरखी-चूना आधारित कम कार्बन भवन न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर हैं, बल्कि ये जलवायु के अनुकूल होते हैं और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देते हैं। “प्राचीन निर्माण तकनीकों को आधुनिक जरूरतों के साथ जोड़कर हम ऐसे आवास विकसित कर सकते हैं जो विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में टिकाऊ और स्वास्थ्यवर्धक हों,” उन्होंने कहा कि समन्वित विकास ही भविष्य का रास्ता तय करता है।
कार्यक्रम में शामिल सभी विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि यदि पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक अनुसंधान, प्राकृतिक कृषि और सतत निर्माण को एक साथ जोड़ा जाए, तो यह न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे सकता है। यह कार्यक्रम इस बात का संकेत है कि भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां आज भी प्रासंगिक हैं, लेकिन उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ अपनाने की आवश्यकता है। पंचगव्य, पोषण और सतत जीवनशैली का समन्वय न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य को बेहतर बनाएगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास को भी मजबूती देगा।


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