Upgrade Jharkhand News भारत की साहसी बेटियों में बछेंद्री पाल का नाम अत्यंत सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति, साहस और कठिन परिश्रम के बल पर कोई भी ऊँचाई प्राप्त की जा सकती है। 23 मई 1984 का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, जब बछेंद्री पाल ने विश्व की सर्वोच्च चोटी Mount Everest पर भारत का तिरंगा फहराकर देश का गौरव बढ़ाया। वे एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ाई करने वाली भारत की पहली महिला बनीं।
बछेंद्री पाल का जन्म वर्ष 1954 में उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के नकुरी गाँव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। पर्वतीय क्षेत्र में पली-बढ़ी बछेंद्री बचपन से ही साहसी और जिज्ञासु स्वभाव की थीं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में पूरी की और आगे चलकर बी.एड. तक अध्ययन किया। पढ़ाई में प्रतिभाशाली होने के बावजूद उन्हें कोई स्थायी और सम्मानजनक नौकरी नहीं मिली। यह स्थिति उनके लिए निराशाजनक थी, किंतु उन्होंने हार नहीं मानी।
इसी दौरान उन्होंने Nehru Institute of Mountaineering में पर्वतारोहण प्रशिक्षण के लिए आवेदन किया। यही निर्णय उनके जीवन की दिशा बदलने वाला सिद्ध हुआ। पर्वतारोहण के कठिन प्रशिक्षण ने उनके आत्मविश्वास और साहस को नई ऊँचाइयाँ दीं।बछेंद्री पाल को पर्वतारोहण का पहला अनुभव मात्र 12 वर्ष की आयु में मिला, जब उन्होंने अपनी सहपाठियों के साथ लगभग 400 मीटर ऊँची चढ़ाई की। इस अनुभव ने उनके भीतर रोमांच और साहस की नई भावना जगाई। वर्ष 1982 में उन्होंने गंगोत्री और रूदुगैरा जैसी कठिन चोटियों की सफल चढ़ाई कर अपनी क्षमता का परिचय दिया।
उनकी प्रतिभा और लगन को देखते हुए ब्रिगेडियर ज्ञान सिंह ने उन्हें प्रशिक्षक के रूप में कार्य करने का अवसर दिया। हालांकि उस समय समाज और परिवार में महिलाओं के लिए पर्वतारोहण जैसे जोखिम भरे क्षेत्र को स्वीकार करना आसान नहीं था। उन्हें विरोध और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया।
एवरेस्ट विजय : भारतीय नारी शक्ति का प्रतीक -वर्ष 1984 में भारत का चौथा इंडियन एवरेस्ट एक्सपीडिशन 1984 प्रारंभ हुआ। इस अभियान दल में 7 महिलाओं और 11 पुरुषों को शामिल किया गया, जिनमें बछेंद्री पाल भी थीं। अभियान के दौरान मौसम की कठिन परिस्थितियाँ, बर्फीले तूफान और ऑक्सीजन की कमी जैसी अनेक चुनौतियाँ सामने आईं, लेकिन उन्होंने अदम्य साहस और धैर्य का परिचय दिया।23 मई 1984 को दोपहर 1 बजकर 7 मिनट पर उन्होंने Mount Everest की 8,848 मीटर ऊँची चोटी पर कदम रखकर इतिहास रच दिया। इस उपलब्धि के साथ वे विश्व की पाँचवीं महिला और भारत की पहली महिला एवरेस्ट विजेता बनीं। उस क्षण उन्होंने भारतीय तिरंगे को विश्व की सबसे ऊँची चोटी पर फहराकर पूरे देश को गौरवान्वित किया।
एवरेस्ट विजय के बाद भी बछेंद्री पाल ने साहसिक अभियानों का सिलसिला जारी रखा। उन्होंने महिलाओं की एक विशेष टीम का नेतृत्व करते हुए पुनः हिमालयी अभियान पूरे किए। वर्ष 1994 में उन्होंने हरिद्वार से कलकत्ता तक लगभग 2,500 किलोमीटर लंबे गंगा नदी नौका अभियान का सफल नेतृत्व किया।इसके अतिरिक्त उन्होंने भूटान, नेपाल, लेह, सियाचिन ग्लेशियर और काराकोरम पर्वत शृंखला तक फैले लगभग 4,000 किलोमीटर लंबे हिमालयी अभियान को पूरा किया। यह अभियान दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी का ऐतिहासिक उदाहरण माना गया।
बछेंद्री पालको उनके अद्वितीय साहस और उपलब्धियों के लिए अनेक राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें Padma Shri तथा Arjuna Award जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए। उन्होंने देश की अनेक युवतियों को यह विश्वास दिलाया कि महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं हैं। 23 मई केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय नारी शक्ति, साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक। यह संदेश देती है कि कठिनाइयाँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, दृढ़ निश्चय और निरंतर प्रयास से हर शिखर को जीता जा सकता है। उनका जीवन आज भी युवाओं, विशेषकर बेटियों के लिए प्रेरणा का अमिट स्रोत है।

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