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Bhopal ऊर्जा कूटनीति:युद्ध और अर्थव्यवस्था के बीच फंसा कच्चा तेल Energy Diplomacy: Crude oil caught between war and economy

 


Upgrade Jharkhand News.  अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में तेल बार-बार अपने रंग दिखाता रहा है। अतीत में अरब-इजरायल तनाव के बाद तेल निर्यातक देशों ने कच्चे तेल को पश्चिमी देशों के खिलाफ एक रणनीतिक शस्त्र की तरह इस्तेमाल किया था। आपूर्ति पर प्रतिबंध, कीमतों में बढ़ोतरी और उत्पादन में कटौती जैसे कदमों से पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ विकासशील देशों पर भी भारी बोझ पड़ा था। इससे एक बात साफ हुई कि केवल सैन्य ताकत या औद्योगिक विकास ही नहीं, बल्कि कच्चा तेल भी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने वाला निर्णायक कारक है। होर्मुज जलडमरूमध्य से विश्व के कुल तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। सऊदी अरब, कुवैत, इराक, यूएई, कतर और ईरान का अधिकांश निर्यात इसी मार्ग से होता है। भारत सहित कई एशियाई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर निर्भर हैं। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो सीधा असर दिखेगा। तेल की खेप पहुंचने में ज्यादा समय लगेगा, जहाजों का बीमा और भाड़ा महंगा होगा, और वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में विकासशील देशों का भुगतान संतुलन बिगड़ सकता है और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से मदद लेनी पड़ सकती है। पहले भी युद्ध और राजनीतिक टकराव के समय खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति प्रभावित हुई है। तब अमेरिका और पश्चिमी देशों ने खाड़ी में अपनी उपस्थिति बढ़ाकर ऊर्जा मार्गों को सुरक्षित करने की कोशिश की थी। 


विशेषज्ञ मानते हैं कि तेल भंडारण को सुरक्षित रखना और आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण ही ऐसी किसी भी आपात स्थिति से निपटने का उपाय है। भारत ने भी पिछले कुछ वर्षों में तेल आयात करने वाले देशों की संख्या बढ़ाई है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो।  सत्तर के दशक में तेल की ताकत पूरी तरह उत्पादक देशों के हाथ में थी। आज स्थिति बदल रही है। अमेरिका अब खुद सबसे बड़े उत्पादकों में है। इसलिए विश्लेषक मानते हैं कि ऊर्जा राजनीति का केंद्र धीरे-धीरे खिसक रहा है। उधर रूस और चीन जैसे देश भी वैश्विक ऊर्जा समीकरण में नई भूमिका निभाने की तैयारी कर रहे हैं। यूरोपीय देशों का रुख भी पहले जैसा नहीं रहा। कई देश अब सीधे सैन्य टकराव की बजाय कूटनीतिक समाधान पर जोर देते हैं, क्योंकि यह माना जाता है कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी हल नहीं है। विकासशील देशों के लिए अचानक किसी वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत पर जाना आसान नहीं है। ऐसे में यदि आपूर्ति बाधित होती है या कीमतें बेकाबू होती हैं, तो महंगाई बढ़ती है और विकास परियोजनाएँ प्रभावित होती हैं। खाड़ी देशों ने अतीत में उत्पादन नियंत्रित करके कीमतों में स्थिरता का दावा किया था, लेकिन भू-राजनीतिक संकट के समय वह दावा टिक नहीं पाता। यदि होर्मुज जैसा मार्ग लंबे समय तक बाधित रहे, तो समुद्री यातायात, नाविकों की सुरक्षा और जरूरी सामान की आपूर्ति, सब पर असर पड़ता है।


भारत भी अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और उसका एक प्रमुख हिस्सा होर्मुज के रास्ते आता है। ऐसे में भारत के लिए रणनीतिक तेल भंडार को और मजबूत करना जरूरी है। साथ ही ऊर्जा मिश्रण में बदलाव करके सौर, पवन और ग्रीन हाइड्रोजन पर तेजी से काम करना दीर्घकालिक उपाय है। कूटनीति के स्तर पर सभी पक्षों से संवाद बनाए रखना भी जरूरी है ताकि आपूर्ति बाधित न हो। ईरान-अमेरिका तनाव यदि बढ़ता है तो तेल एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का सबसे असरदार हथियार बनकर उभरेगा। इस बार इसका असर सिर्फ तेल उत्पादक देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था इसकी चपेट में आएगी। महंगाई, आपूर्ति श्रृंखला का टूटना और भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण, ये खतरे सबसे बड़े हैं। दुनिया ने देखा है कि युद्ध से न ऊर्जा सुरक्षा मिलती है, न आर्थिक स्थिरता। इसलिए अधिकांश देश यही चाहते हैं कि होर्मुज जैसे मार्ग खुले रहें और विवादों का हल बातचीत से निकले। तेल ने साबित किया है कि वह सिर्फ ईंधन नहीं, बल्कि कूटनीति की भाषा है। आने वाले समय में जो देश अपनी ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ाएगा, वही इस तेल की राजनीति में सबसे कम प्रभावित होगा। सुभाष आनंद



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