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Bhopal दृष्टिकोण : वोट बैंक के आगे नतमस्तक राष्ट्र धर्म Viewpoint: National religion bowing before vote bank

 


Upgrade Jharkhand News.  

चल रहे हैं दौर विष के देवता के आवरण में

रात की काली लता है भोर के नवजागरण में

देश का दुर्भाग्य मित्रों क्या भला तुलसी लिखेंगे

साथ देते हैं जटायु, आज के सीता हरण में।

         केवल धरती के किसी भूभाग में निवास करने से वह भूभाग तब तक राष्ट्र नहीं कहलाता, जब तक कि राष्ट्र के प्रति समर्पित नागरिकों का उसमें निवास न हो। यूँ तो अपना और अपने परिवार का भरण पोषण सभी करते ही हैं तथा अपने और पराये का भेद करके अपने स्वार्थ की सर्वोपरि मानते हैं। परिवार के उपरांत कभी जातिवाद और कभी क्षेत्रवाद की संकीर्ण विचारधारा का अनुपालन करते हुए कुछ लोग अपनी सोच का दायरा संकुचित कर लेते हैं। भारतीय राजनीति का आधार ही यही है। 


भले ही लोक दिखावे के लिए तथाकथित दिशानायक स्वयं को पंथनिरपेक्ष घोषित करें, लेकिन उनके अंतस का संकीर्ण जातीय लगाव यदा कदा उनके आचरण से लक्षित होता रहता है। विघटनकारी शक्तियां भी इसी प्रयास में लगी रहती हैं, कि जैसे भी हो समाज को जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा के आधार पर बांटकर आपस में भिड़ाते रहो और अपना स्वार्थ पूरा करते रहो। उनकी षड्यंत्रकारी चालों में फंसकर आम आदमी राष्ट्र चिंतन और राष्ट्र समर्पण जैसे अपने नागरिक दायित्व की पूर्ति करने की ओर ध्यान नहीं दे पाता , जिसका दुष्परिणाम समाज व राष्ट्र को समय समय पर भोगना पड़ता है। कहीं धार्मिक आधार पर दंगे होते हैं, तो कहीं जातीय वैमनस्य उत्पन्न होता है। आपराधिक घटनाओं को जातीय चश्मे से देखकर समाज में जातीय संघर्ष की भूमिका तैयार करने में भी अराजक तत्व पीछे नहीं रहते। जैसे किसी अपराधी के अपराध के लिए अपराधी की जाति से जुड़ा हर व्यक्ति जिम्मेदार हो। ऐसे में मानवीय दृष्टिकोण से चिंतन कोई नहीं करना चाहता। 


राजनीतिक दल पीड़ित की जाति देखकर अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति में लग जाते हैं तथा केवल उन जगहों पर घड़ियाली आंसू बहाने जाते हैं, जहाँ उन्हें लगता है, कि पीड़ित की जाति उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में सहायक होगी। इतना ही नहीं, राजनीतिक मंसूबों को पूरा करने की आड़ में राजनीतिक दल समाज को भिन्न भिन्न तरीकों से बांटने में पीछे नहीं हैं। विश्व के किसी भी लोकतान्त्रिक देश में ऐसी भेदभावपूर्ण नीतियां लागू नहीं हैं, जितनी कि अपने भारत में हैं। व्यक्ति को सरकारी दृष्टि से ही अमानवीय ढंग से बाँट दिया गया है। सरकार व्यक्ति के आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन को उसके जीवन यापन हेतु उपलब्ध संसाधनों की कमी से नहीं आंकती, सरकार की दृष्टि में कोई व्यक्ति नहीं, वरन उसकी समूची जाति ही पिछड़ी है, इसी प्रकार किन्ही खास व्यक्तियों की समूची जाति ही अगड़ी और समृद्ध है, उन जातियों में कोई भी व्यक्ति आर्थिक या सामाजिक से रूप से दुर्बल नहीं होता।  


विडंबना है, कि जैसे जैसे विश्व तकनीकी क्षेत्र में विकसित हो रहा है तथा वैज्ञानिक रीति नीतियों से जीवन यापन में सुधार की दिशा में गतिशील है, वैसे वैसे संकीर्ण जातीय सोच आम आदमी को दलित सवर्ण, अगड़ा पिछड़ा में विघटित करने के कुत्सित प्रयास में लगी है। स्वाधीनता के उपरांत से दलितों के नाम पर ख़ास जातियों को मिले विशेष क़ानूनी अधिकारों का दुरूपयोग होने के उपरांत भी देश के नियंताओं की आँखों पर पट्टी बंधी है। सत्ता की संकीर्ण सोच सामाजिक समरसता की राह में सबसे बड़ा अवरोधक बनी हुई है। सरकार की इन नीतियों के चलते दलित वोट बैंक साधने के लिए अनेक ऐसे तत्व सक्रिय हैं, जिन्हें महात्मा बुद्ध की अहिंसा सर्वोपरि की अवधारणा से कोई सरोकार नहीं है, यदि न्याय के मंदिर में सामाजिक समरसता और मानवीय दृष्टिकोण से जुड़े कुछ निर्णय सुनाए जाते हैं, तो जातीय क्षत्रप सड़कों पर उतरकर अराजकता फैलाने से भी नहीं चूकते। इससे बड़ा ज्वलंत प्रश्न और क्या हो सकता है, कि जिस देश में संविधान की दुहाई देकर संवैधानिक निर्णयों का ही विरोध हो, उस देश में संविधान के सम्मान की दुहाई वही लोग देते हैं, जिन्हें संवैधानिक व्यवस्था पर ही विश्वास नहीं है। आरक्षण जैसी व्यवस्था का दुरूपयोग चंद जातियां और चंद परिवारों तक ही सीमित है। यदि सर्वेक्षण कराया जाए तो स्पष्ट होगा, कि किस प्रकार से आरक्षण का लाभ उस अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँच पाया है, जिसके जीवन का उत्थान करने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया गया था। 


बहरहाल स्थिति विकट है। भ्रष्टाचार चरम पर है। भले ही शासक कोई भी हो, किन्तु व्यवस्था में जुटी कार्यपालिका के आचरण में कोई बदलाव नहीं आया है। राजस्व विभाग के भ्रष्ट कर्मचारियों की कृपा से भूमाफिया खूब फल फूल रहे हैं। ग्राम पंचायतों में भी लूट मची है। ग्राम प्रधान बनने से पहले और ग्राम प्रधान बनने के बाद ग्राम प्रधानों की आर्थिक समृद्धि इसी तथ्य को पुष्ट करती है, कि ग्राम प्रधान बनने का उद्देश्य ग्राम की सेवा नहीं, अपना और अपने परिवार का आर्थिक उत्थान ही रहता है। ग्राम प्रधान तो मात्र उदाहरण है, जनप्रतिनिधियों का गाहे बगाहे यही हाल है। जो जहाँ है, उसके लिए येन केन प्रकारेण अपनी भौतिक सम्पन्नता सर्वोपरि है, राष्ट्र के प्रति दायित्वों का निर्वहन उसकी किसी भी प्राथमिकता में नहीं आता। विषय अत्यंत व्यापक व गंभीर है। जिसके लिए आवश्यक है कि समाज का प्रबुद्ध वर्ग, साहित्यकार, लेखक, अधिवक्ता, शिक्षक, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री , मनोवैज्ञानिक एकजुट हों, राष्ट्र के प्रति अपना दायित्व निर्वहन करने की दिशा में तत्पर हों तथा समाज का मार्गदर्शन करें। डॉ. सुधाकर आशावादी



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