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Bhopal बंगाल की राजनीति में भाजपा का उदय: संघर्ष, संकल्प और वैचारिकता का एक दशक The Rise of the BJP in Bengal Politics: A Decade of Struggle, Determination and Ideology

 


Upgrade Jharkhand News. ​बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का पिछला दशक किसी महाकाव्य से कम नहीं है। यह एक ऐसी यात्रा रही है जिसने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया। 2014 से पहले बंगाल में भाजपा की स्थिति एक हाशिए पर खड़े दल जैसी थी, लेकिन पिछले दस वर्षों में नरेंद्र मोदी का करिश्मा, अमित शाह की रणनीति और स्थानीय नेतृत्व के संघर्ष ने राज्य का भूगोल और इतिहास दोनों बदल दिए हैं। ​2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने बंगाल के लोगों को एक नई उम्मीद दी। उस समय मोदी जी की रैलियों में उमड़े जनसैलाब ने यह स्पष्ट कर दिया कि बंगाल की जनता दशकों के वामपंथी शासन और फिर तृणमूल के शुरुआती वर्षों के बाद एक सशक्त राष्ट्रीय विकल्प की तलाश में है। पार्टी का वोट प्रतिशत अचानक एकल अंक से बढ़कर सत्रह प्रतिशत तक पहुंच गया, जिसने राज्य की सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी।


​2014 से 2019 के बीच का समय भाजपा के लिए सबसे कठिन 'ग्राउंड वर्क' का काल था। इस दौरान तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बंगाल को पार्टी के विस्तार का केंद्र बनाया। शाह की 'विस्तारक' योजना के तहत संगठन को गांव-गांव और बूथ स्तर तक पहुँचाया गया। उन्होंने न केवल चुनावी रणनीति तैयार की, बल्कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत को पुनर्जीवित कर इसे 'बंगाली अस्मिता' से जोड़ दिया। यह वह दौर था जब भाजपा ने बंगाल की माटी के साथ अपना भावनात्मक जुड़ाव बनाना शुरू किया।  ​इस कठिन मार्ग में हिंसा एक बड़ी बाधा बनी। राज्य के विभिन्न हिस्सों में कार्यकर्ताओं की हत्याएं और झड़पें आम हो गई। ऐसे समय में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में दिलीप घोष ने मोर्चा संभाला। उनके निडर और आक्रामक नेतृत्व ने कार्यकर्ताओं के मनोबल को टूटने नहीं दिया। दिलीप घोष ने खुद पर हुए हमलों की परवाह किए बिना ग्रामीण बंगाल के उन क्षेत्रों में पार्टी का झंडा गाड़ा जहाँ पहले जाना भी असंभव माना जाता था। उनकी जमीनी पकड़ ने भाजपा को 'भद्रलोक' की पार्टी के ठप्पे से निकालकर आम जनमानस की पार्टी बना दिया।


​2019 के लोकसभा चुनावों ने बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया। 18 सीटों पर जीत और 40% से अधिक वोट शेयर ने ममता बनर्जी के 'अजेय' होने के भ्रम को तोड़ दिया। इसके बाद, 2021 के चुनावों से ठीक पहले शुभेंदु अधिकारी का भाजपा में शामिल होना एक मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ। शुभेंदु ने न केवल तृणमूल के संगठनात्मक ढांचे को चोट पहुँचाई, बल्कि नंदीग्राम की ऐतिहासिक रणभूमि में स्वयं मुख्यमंत्री को पराजित कर भाजपा की शक्ति का लोहा मनवाया। ​2021 के विधानसभा चुनाव भले ही भाजपा को सत्ता तक न ले जा सके हों, लेकिन 3 विधायकों से 77 विधायकों तक का सफर भाजपा के संघर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। इसके बाद के वर्षों में, विशेषकर 2024 और अब 2026 के दौर में, भाजपा ने शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में विधानसभा के भीतर और बाहर एक प्रखर विपक्ष की भूमिका निभाई । संदेशखाली जैसी घटनाओं के बाद पैदा हुआ जन आक्रोश और महिला सुरक्षा व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर शुभेंदु की आक्रामक घेराबंदी ने सरकार को रक्षात्मक होने पर मजबूर कर दिया है।


​आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो भाजपा का यह 10 साल का संघर्ष इसलिए रंग लाया क्योंकि उसने बंगाल की बदलती नब्ज को पहचाना। नरेंद्र मोदी का विकासवाद, अमित शाह का संगठनात्मक कौशल, दिलीप घोष का जमीनी संघर्ष और शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक मारक क्षमता,इन सबने मिलकर बंगाल में एक ऐसा वैचारिक प्रतिस्थापन किया है जहाँ 'लाल' और 'हरे' के बीच 'भगवा' ने अपनी स्थाई जगह बना ली है। ​अब बंगाल की राजनीति पूरी तरह से द्वि-ध्रुवीय हो चुकी है। भाजपा आज केवल एक विकल्प नहीं है, बल्कि भविष्य की संभावित सरकार के रूप में बंगाल की जनता की चेतना और आकांक्षाओं का केंद्र बन चुकी है। पवन वर्मा



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