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Bhopal दृष्टिकोण : मुफ्तखोरी की राजनीति और निरंकुश महंगाई Viewpoint: Freebie politics and unbridled inflation

 


Upgrade Jharkhand News.   सत्ता की चाहत में सभी राजनीतिक दल लोकलुभावन वादे करके अपना स्वार्थ तो सिद्ध कर लेते हैं, लेकिन इसका सीधा असर उस मध्यम आय वर्ग की जेब पर पड़ता है, जो लोकलुभावन वादों की परिधि में नहीं आता। येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करने के लिए देश के सभी राज्यों में जनता को मुफ्त बिजली, पानी, नकद राशि, मकान का वादा करके सत्ता सुख भोगने वाले तत्व न तो राजकोषीय घाटा बढ़ने की परवाह करते हैं और न ही अर्थव्यवस्था के चरमराने की। क्योंकि वे जानते हैं, कि मुफ्तखोरी का दाव ही उनकी सत्ता का आधार है। लम्बे समय से देश में बड़ी जनसंख्या को मुफ्त राशन देने की योजना ने जहाँ मुफ्तखोरों को अकर्मण्य बना दिया है, वहाँ फर्जी राशन कार्ड तथा अन्य भ्रष्टाचार के तरीके आजमाकर घोटालों को अंजाम दिया जाना नई बात नहीं रह गई है। 


केंद्र सरकार भी इसी राजनीति के चलते मौका देखकर समय समय पार आम आदमी पर महंगाई का बोझ बढ़ाती रहती है। ईरान अमेरिकी युद्ध के चलते पेट्रोल व गैस उत्पादों की मूल्य वृद्धि भी इस राजनीति का शिकार हुई है। कच्चे तेल के घटते बढ़ते भावों के बीच कच्चे तेल के दाम घटने का अनुपातिक लाभ आम आदमी को नहीं दिया गया, वहीं बंगाल सहित पांच राज्यों में चुनावों को देखते हुए पेट्रोल व गैस के दामों को न बढ़ाने का आश्वासन दिया गया। चुनाव संपन्न होते ही व्यवसायिक गैस सिलेंडर के दामों में बेतहाशा वृद्धि करके सरकार ने आम आदमी की थाली महंगी कर दी। देश में एक बड़ा कारोबार भोज्य पदार्थों से ही जुड़ा है। समाज में एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो रोजमर्रा मेहनत मजदूरी करके जैसे तैसे अपना भरण पोषण करता है। एक बड़ा रोजगार रेहड़ी पटरी पर भोजन बनाने का भी है, व्यवसायिक गैस सिलेंडर के दाम बढ़ने से खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ाना उनकी विवशता है। विगत दो तीन महीनों में ही व्यावसायिक गैस सिलेंडर के मूल्यों में पचास प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हो चुकी है। 


कहना गलत न होगा कि एक ओर तो सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से मुफ्तखोरी को बढ़ावा दे रही है,वहीं दूसरी ओर आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं के दामों में बेतहाशा वृद्धि करके महँगाई से आम आदमी की कमर तोड़ने में भी संकोच नहीं कर रही है। ऐसी भी राजनीति किस काम की, जो सत्ता की मलाई खाने के फेर में मुफ्तखोरी को बढ़ावा दे तथा देश के ईमानदार लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी को कष्टों में धकेलने में संकोच न करे। लगता है कि संकीर्ण राजनीति देश को ऐसे मोड़ पर ले आई है, जहाँ आम आदमी के सम्मुख जीवन मरण का संकट उत्पन्न हो गया है। यदि समय रहते उपभोक्ता वस्तुओं के दामों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो हो सकता है कि यही सत्ता के पतन का प्रमुख कारण बने।  डॉ. सुधाकर आशावादी



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