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Bhopal व्यंग्य -विदेशी आंकड़ों पर नाचते देशी किटाणु Satire: Native germs dancing to foreign figures

Upgrade Jharkhand News. अपनी ख़ासियत है कि अपन को अपने आप पर बिल्कुल विश्वास नही है। विदेश की धरती से जब कोई हमारे बारे में अपनी राय ज़ाहिर करता है, तब हमें उस राय पर विश्वास होता है। यदि ऐसा नही होता, तो हम आँखों देखी पर भी विश्वास करने से नहीं कतराते। विदेश में ऐसे कुछ लोग हैं, कुछ ऐसी जाँच एजेंसियाँ हैं, जो मनमाने जाँच परिणाम घोषित करके भारत को ऐसे ऐसे देशों से भी कमतर आंकती हैं, जिनका खाना खर्चा भारत के रहमों करम पर चलता है। समझ नही आता, कि उनकी अनुसंधान विधि कौन सी है ? उनके शोध की फ़ंडिंग कौन करता है ? उनके शोध परिणामों का आधार क्या है ? ऐसे कौन से आँकड़े उपलब्ध होते हैं, जिनके आधार पर अधिकांश क्षेत्रों में उन्हें भारत की स्थिति केवल नकारात्मक ही दिखाई देती है। तभी तो विदेशी धरती  के अख़बार, विदेशी पुरुष भारत के आंतरिक मामलों में भी ऐसी टीका टिप्पणी करते हैं, जिनका भारत से सीधा सम्बंध नही होता और भारत में बैठे विदेशी जंतुओं के शुभ चिंतक उनकी टीका टिप्पणी को बिना प्रमाण के भी प्रामाणिक सिद्ध करने पर आमादा हो जाते हैं। 


सच तो यह है कि मुफ्त का राशन भी भारतीयों को खुशी प्रदान नही करता। यह हम भारतीय नहीं कहते । यह बात भी हमें विदेशी अनुसंधानकर्ता बताते हैं। भ्रष्टाचार में भारत की रेंक का मामला हो या अन्य कोई मामला, हर क्षेत्र में भारत की नकारात्मक छवि प्रस्तुत की जाती है। यहाँ तक कि भुखमरी में भी भारत को उन देशों से नीचे दर्शाया जाता हैं, जिनके लिए भारत अनाज और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराता है। नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान सहित ऐसे बहुत सारे देश भारत से अधिक खुशहाल हैं। महंगाई का सूचकांक भी भारत में अधिक है। रोटी और आटे की जंग लड़ते हुए अड़ोस पड़ोस के देशों में महंगाई की मार नहीं है। मुफ्त का माल खाने और माल खिलाने वाले का माल हजम करके मुफ्त का राशन खिलाने वालों को गाली दिए जाने का यदि कोई सूचकांक बनता, तो हो सकता है, कि उसमें भारत बाज़ी मार लेता, मगर विदेशी अनुसंधान कर्ता ऐसा अध्ययन करते ही नहीं, जिनमें भारत को किसी मामले में अग्रणी माना जाए।


वैसे भारतीयों में एक आदत बहुत अच्छी है, कि वे कभी अपने आज़माए हुए सच पर भरोसा नहीं करते। भारत की राजनीति में ऐसे कीटाणुओं के लिए कोई स्थान रिक्त नहीं है, जो वे अपने आप पर या अपने शोध निष्कर्षों की प्रमाणिकता को स्वीकार कर सकें। वे केवल औरों के सुर में सुर मिलाने और अपने देश के विरोध में सुर अलापने में महारत हासिल किए रहते हैं। ऐसे तत्वों के बारे में कहें तो क्या कहें, उनके करतब देखकर सेल्फ़ गोल करने वालों या अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वालों के क़िस्से याद आने लगते हैं। साथ ही जै चंदों का इतिहास भी अपनी किताब खोलता हुआ प्रतीत होने लगता है। सुधाकर आशावादी



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