Upgrade Jharkhand News. राष्ट्र है, तो नागरिकों का अस्तित्व सुरक्षित है। राष्ट्र किसी एक व्यक्ति,परिवार, जाति या किसी राजनीतिक दल की बपौती नहीं है। वह प्रत्येक राष्ट्रवासी का आश्रय स्थल है,जिसकी कल्याणकारी नीतियों का अनुपालन करना तथा जिसके प्रति निष्ठा पूर्ण समर्पण प्रत्येक नागरिक का प्रमुख दायित्व है। देश, काल और परिस्थिति के अनुसार जिस प्रकार किसी परिवार द्वारा अपनी क्षमताओं और आर्थिक संसाधनों के प्रयोग में सावधानी बरती जाती है, वही सावधानी राष्ट्रीय संसाधनों के उपयोग में क्यों न बरती जाए, इस पर खासी बहस छिड़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब से सोने की खरीद को कुछ समय के लिए स्थगित करने की बात कही है और आयातित विदेशी उत्पादों पर निर्भरता में कमी करने तथा पेट्रोलियम पदार्थों की काम खपत करके सार्वजानिक यातायात के साधनों का प्रयोग करने तथा घर से कार्य करने की सलाह दी है, तब से देश के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले तत्वों को अपनी राष्ट्र विरोधी सियासत चमकाने का अवसर मिल गया है। यदि ऐसा न होता तो वे जनहित में दी गई सलाह पर बढ़ चढ़ कर नकारात्मक टिप्पणी न करते।
कौन नहीं जानता, कि युद्ध की स्थिति हो अथवा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई समस्या, प्रत्येक देश पर उसका कुछ न कुछ प्रतिकूल प्रभाव पड़ता ही है। गैस व पेट्रोलियम पदार्थों की किल्ल्त से देश में खाद्य पदार्थों व खुदरा महंगाई पर असर पड़ा है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, लेकिन राजनीतिक दलों में आपदा में अवसर ढूंढने और सत्ता को बदनाम करने की प्रवृत्ति जिस प्रकार बढ़ी है, उससे लगता है, कि उन्हें राष्ट्र से सरोकार न होकर अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति से ही सरोकार है। कौन नहीं जानता, कि सन 1965 में भारत भयंकर अन्न संकट सहित भारत पाकिस्तान युद्ध से गुजर रहा था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने राष्ट्र के स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता के लिए संकल्प लिया था कि देशवासी सप्ताह में कम से कम एक समय भोजन न करें, उपवास रखें। उन्होंने संकल्प पहले अपने परिवार में आजमाया तथा उनकी प्रेरणा से देशवासियों ने सोमवार की शाम का उपवास रखना शुरू किया था। इसी कड़ी में गंभीर विदेशी मुद्रा संकट की स्थिति में सन 1967 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने सोना न खरीदने की सलाह दी थी, जिसे राष्ट्रीय अनुशासन की संज्ञा देकर सोने के आयात को कम करके विदेशी मुद्रा की बचत की गई थी।
कहना गलत न होगा,कि राष्ट्र के सम्मुख किसी भी आपदा या चुनौती का सामना करने के लिए दलगत राजनीति से उबरकर सामूहिक रूप से सभी का देश के साथ खड़ा होना होता है, किन्तु देश का दुर्भाग्य है,कि संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए ऐसे तत्व राष्ट्रीय अनुशासन के प्रति प्रतिबद्धता जताने की जगह सकारात्मक नीतियों व कल्याणकारी क़दमों का विरोध करने से बाज नहीं आते। विचारणीय प्रश्न है कि राष्ट्र हित के विरोध में किए जाने वाले ऐसे किसी भी आचरण की निंदा क्यों न की जाए? डॉ. सुधाकर आशावादी
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