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Bhopal भारतीय संस्कृति में पूजनीय नारी, पर संसद में अधूरी हिस्सेदारी Women are revered in Indian culture, but have an incomplete representation in Parliament.

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“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”

          मनु स्मृति के इस सुप्रसिद्ध श्लोक का अर्थ है कि "जहां नारी का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास होता है, और जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां हर प्रयास निष्फल हो जाता है।"   इसी श्लोक के आलोक में जब हम भारतीय लोकतंत्र को देखते हैं, तो एक गहरी विडंबना सामने आती है। जिस देश में नारी को पूजनीय माना जाता है, उसी देश के लोकतंत्र के मंदिर (संसद) में उनकी भागीदारी बढ़ाने का प्रयास बार-बार हुआ, लेकिन हर बार यह प्रयास किसी न किसी मोड़ पर अटकता रहा। लगता है कि संसद एवं विधानसभाओं में, महिलाओं को आरक्षण देने का मुद्दा एक मृगमरीचिका बनता जा रहा है।  हर बार विधेयक पेश होता है, इस पर हंगामा होता है और फिर यह विधेयक या तो वापिस ले लिया जाता है, या फिर गिर जाता है। इस मामले में तो पाकिस्तान भी भारत से आगे निकल गया, जहां कट्टरपंथियों का बोलवाला हैं, फिर भी वहां एक सैनिक शासक ने संसद और प्रांतीय विधानसभाओं में महिलाओं के लिये कुछ स्थान आरक्षित करवा दिये।


भारत में महिलाओं को अधिकार दिये जाने के संघर्ष का एक लम्बा इतिहास रहा है। बीसवीं सदी के प्रारंभ से ही महिलाओं ने आजादी के आंदोलन में हिस्सेदारी की। अंग्रेजों के समय में जब चुनाव हुए तो उन्हें मतदान का समान अधिकार मिला। आजादी के बाद यह धारणा थी कि महिलाओं का विधायिका में अपने आप प्रतिनिधित्व बढ़ जाएगा, पर यह सम्भव नहीं हो सका। इंदिरा गांधी को तो राजनीति थाली में परोसी हुई ही मिली पर महिला आरक्षण की ओर उनका भी ध्यान नहीं गया। बीसवीं शताब्दी के अंत में महिलाओं के सामने यह तस्वीर साफ हो गई कि इस पुरुष प्रधान समाज में उनकी संख्या संसद एवं विधानसभाओं में सीमित ही रहने वाली हैं। नतीजे में कई महिला संगठनों तथा महिला नेत्रियों ने महिलाओं के आरक्षण की मांग बुलंद की। महिलाओं का एक बड़ा वोट बैंक है, इसलिये कोई भी नेता या राजनैतिक दल इस मांग का विरोध नहीं कर सका। पर इससे कई राजनैतिक दलों एवं नेताओं को अपने अस्तित्व एवं वर्चस्व पर संकट मंडराता नजर आने लगा। अपने आपको पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधि कहने वाले कई नेता और राजनैतिक दल इस आरक्षण के भीतर भी आरक्षण देने की मांग करने लगे। उनका कहना है कि महिलाओं को दिये जाने वाले इस आरक्षण में पिछड़े वर्ग की महिलाओं को आरक्षण दिया जाए। इधर कुछ नेताओं ने अल्पसंख्यक महिलाओं को आरक्षण दिये जाने की मांग कर डाली। एक सुझाव, यह भी आया कि राजनैतिक दलों को यह अनिवार्य कर दिया जाए कि उनके उम्मीदवारों में तैंतीस प्रतिशत महिलाएं हो।   

 बहरहाल आज यह विधेयक सूत की उस उलझी हुई डोरी की तरह बन गया है जिसका कोई ओर छोर या सिरा नजर नहीं आता है। इसमें भी दिलचस्प बात यह है कि महिला आरक्षण के मार्ग में अवरोध वे नेता और राजनैतिक दल खड़े कर रहे हैं, जो अपने आपको महात्मा गांधी एवं डॉ. राम मनोहर लोहिया का अनुयायी कहते है। डॉ. लोहिया तो यहां तक कहते थे कि राजनीति में ही नहीं सामाजिक जीवन में भी महिलाओं को दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है। उनकी मान्यता थी कि भारतीय नारी सदियों से शोषण  का शिकार रही है। पर विडम्बना देखिये पहले डॉ. राम मनोहर लोहिया को अपना आदर्श मानने वाले मुलायम सिंह यादव ने महिला आरक्षण का विरोध किया और अब एक दशक के बाद उनके पुत्र भी महिला आरक्षण विधेयक का सर्वाधिक विरोध कर रहे है।  वे इस विधेयक के विरोध के माध्यम से पिछड़े वर्ग के अपने वोट बैंक को और मजबूत करना चाहते है। नेताओं के सामने यह संकट भी खड़ा है कि यदि इस विधेयक के पारित होने से,वे जिस सीट से बाहुबल, जातिगत समीकरण या व्यक्तिगत प्रभाव के कारण जीतते रहे हैं, यदि वह महिला के लिये आरक्षित हो गई तो उनका क्या होगा? हर नेता लालू यादव जैसा तो  नहीं हो सकता कि अपना उत्तराधिकारी अपनी पत्नी को घोषित कर दे।


संसद में महिला आरक्षण की इस पूरी यात्रा को ध्यान से देखें, तो एक महत्वपूर्ण तथ्य उभरकर सामने आता है। महिला आरक्षण को आगे बढ़ाने की सबसे ज्यादा सक्रिय पहल भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले दौर में दिखाई देती है। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1998, 1999, 2002 और 2003 में लगातार इस विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिशें हुईं। विरोध, हंगामे और राजनीतिक टकराव के बावजूद इन प्रयासों को बार-बार दोहराया गया।  इसके बाद 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इसे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में संसद के दोनों सदनों से पारित कराया गया। यह वह क्षण था, जब दशकों से अटका मुद्दा पहली बार निर्णायक रूप से आगे बढ़ा। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेन्द्र मोदी तकयह पूरा क्रम यह संकेत देता है कि भारतीय जनता पार्टी लगातार महिलाओं को राजनीतिक हिस्सेदारी देने के पक्ष में खड़ी रही है और प्रयासों का सिलसिला इस बात का साक्ष्य भी  है।


कब-कब सदन में रोका गया बिल -1996 में पटल पर रखे जाने से लेकर साल 2010 में राज्यसभा से पास होने तक महिला आरक्षण विधेयक कई बार सदन से ठुकराया गया। इसका सिलसिला 12 सितंबर 1996 से शुरू होता है। बिल को पटल पर रखा गया, तबविरोध के कारण यह पास नहीं हो सका, फिर बिल को वाजपेयी सरकार में पटल पर लाया गया था, लेकिन उस साल भी बात नहीं बनी। इसी तरह 1999, 2003, 2004 और 2009 में बिल के पक्ष में माहौल नहीं बन सका, लिहाजा ये विधेयक पास नहीं हो सका। 12 सितंबर 1996 को महिला आरक्षण विधेयक को पहली बार एचडी देवगौड़ा सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में संसद में पेश किया। इसके बाद ही देवगौड़ा सरकार अल्पमत में आ गई और 11वीं लोकसभा को भंग कर दिया गया। विधेयक को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सांसद गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया। इस समिति ने 9 दिसंबर 1996 को लोकसभा को अपनी रिपोर्ट पेश की।


इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने 26 जून 1998 को महिला आरक्षण विधेयक  12वीं लोकसभा में 84वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश किया, लेकिन पास नहीं हो सका। इसके बाद वाजपेयी सरकार अल्पमत में आ गई और 12वीं लोकसभा भंग हो गई। 22 नवम्बर 1999  को  एनडीए सरकार ने 13वीं लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक को फिर से पेश किया, लेकिन इस बार भी सरकार इस पर सभी को सहमत नहीं कर सकी। साल 2002 और 2003 में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक पेश किया, लेकिन कांग्रेस और वामदलों के समर्थन के आश्वासन के बावजूद सरकार इस विधेयक को पारित नहीं करा सकी।  मई 2004 में कांग्रेस की अगुवाई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) ने अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने के इरादे का ऐलान किया।6 मई 2008  को महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में पेश हुआ और उसे कानून एवं न्याय से संबंधित स्थायी समिति के पास भेजा गया। 17 दिसंबर 2009 को स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की और समाजवादी पार्टी, जेडीयू तथा राजद के विरोध के बीच महिला आरक्षण विधेयक को संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा गया।


22 फरवरी 2010 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने संसद में अपने अभिभाषण में कहा कि सरकार महिला आरक्षण विधेयक को जल्द पारित कराने के लिए प्रतिबद्ध है। 25 फरवरी 2010 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महिला आरक्षण विधेयक का अनुमोदन दिया। 08 मार्च 2010 को महिला आरक्षण बिल को राज्यसभा के पटल पर रखा गया, लेकिन सदन में हंगामे और एसपी और राजद द्वारा यूपीए से समर्थन वापस लेने की धमकी की वजह से उस पर मतदान नहीं हो सका।  कांग्रेस ने बीजेपी, जेडीयू और वामपंथी दलों के समर्थन से राज्यसभा में 09 मार्च 2010  को महिला आरक्षण विधेयक भारी बहुमत से पारित कराया, लेकिन लोकसभा में यह विधेयक कभी पास नहीं हो सका और अंततः यह समाप्त हो गया।


नई उम्मीदों,नई आशाओं को मिली नई बाधाएं -   दशकों की इस लंबी राजनीतिक जद्दोजहद के बाद 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ संसद से पारित हुआ। यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, जिसने यह भरोसा जगाया कि अब महिलाओं को राजनीतिक हिस्सेदारी का संवैधानिक अधिकार मिलना तय है लेकिन इसमें परिसीमन और जनगणना की शर्त जुड़ी, जिससे इसका तत्काल क्रियान्वयन टल गया।  2026 में जब इसे तुरंत लागू करने की दिशा में प्रयास हुआ, तो एक बार फिर वही चुनौती सामने आई,दो-तिहाई बहुमत का गणित। आवश्यक समर्थन नहीं मिलने से यह प्रयास भी अधूरा रह गया।


आदर्श और यथार्थ के बीच की दूरी -  महिलाओं के आरक्षण के बिल का संसद म बार बार गिरना हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर क्यों जिस समाज में नारी को शक्ति माना जाता है, वहां उसे सत्ता के केंद्र में बराबरी का स्थान देने में इतनी कठिनाई होती है? हर बार कोई न कोई राजनीतिक या सामाजिक कारण सामने आता है। कभी आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग उठती है तो कभी राजनीतिक समीकरण गड़बड़ाने लगते हैं,तो कभी सहयोगी दलों का दबाव में यह कानून अधूरा रह जाता है। यही कारण है कि आधी आबादी का यह सफर अभी भी अधूरा है।  लेख के आरंभ में मैने जिस श्लोक का उल्लेख किया गया, वही इस पूरे विमर्श का मूल है। यदि हम सच में नारी को पूजनीय मानते हैं, तो यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि उसे निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान भागीदारी मिले। भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में एक निर्णायक कदम जरूर उठाया है और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर आज तक इस विषय पर लगातार प्रयास होते रहे हैं। अब जरूरत है सामूहिक राजनीतिक इच्छाशक्ति की, ताकि अगली बार यह प्रयास इतिहास बन जाए और लोकतंत्र के मंदिर में नारी की भागीदारी केवल प्रतीक नहीं, बल्कि वास्तविक शक्ति के रूप में स्थापित हो। अंजनी सक्सेना



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