"किसी भी राष्ट्र की राजनीतिक उन्नति तभी संभव है, जब उसका समाज जागरूक, शिक्षित और सामाजिक बंधनों से मुक्त हो। सामाजिक सुधार केवल एक धार्मिक उद्देश्य नहीं है, बल्कि यह देश की राजनीतिक प्रगति और राष्ट्रीय जागरण के लिए पहली अनिवार्य शर्त है।"
— राजा राममोहन राय
Upgrade Jharkhand News. भारतीय समाज मध्यकालीन रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, जाति-पांति के संकीर्ण दायरों और अमानवीय कुरीतियों के गहरे अंधकार में डूबा हुआ था। एक ऐसा दौर, जहाँ धर्म के नाम पर इंसानी गरिमा का हनन हो रहा था और तर्क की जगह अंधश्रद्धा ने ले ली थी। ऐसे संक्रमण काल में बंगाल की धरती पर एक ऐसे मनीषी का उदय हुआ, जिसने न केवल इस अंधकार को चुनौती दी, बल्कि आधुनिक भारत की उस वैचारिक नींव को भी रखा, जिस पर आज हमारा लोकतांत्रिक और प्रगतिशील समाज खड़ा है। उन्हें इतिहास "भारतीय पुनर्जागरण का पिता" और "आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद का प्रारंभिक प्रवर्तक" कहता है—वे थे राजा राममोहन राय।राजा राममोहन राय का चिंतन केवल सतही सुधारों तक सीमित नहीं था। वे एक ऐसे दूरदर्शी राष्ट्र-निर्माता थे, जिन्होंने यह भली-भांति समझ लिया था कि जब तक भारतीय समाज आंतरिक रूप से स्वतंत्र, तार्किक और एकजुट नहीं होगा, तब तक किसी भी प्रकार की राजनीतिक स्वतंत्रता या राष्ट्रवाद की कल्पना बेमानी है। उनका सामाजिक और राजनीतिक चिंतन एक-दूसरे से इस तरह गुंथा हुआ था कि उन्हें अलग करके नहीं देखा जा सकता।राजा राममोहन राय के दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी पहलू यह था कि उन्होंने सामाजिक सुधारों को सीधे राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक विकास से जोड़ दिया। उनका दृढ़ विश्वास था कि एक कमजोर, विभाजित और अंधविश्वासी समाज कभी भी एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकता।
जाति-प्रथा और संकीर्णता पर कड़ा प्रहार है।तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त जात-पात, ऊंच-नीच और छुआछूत को उन्होंने देश की सबसे बड़ी कमजोरी बताया। उनका मानना था कि जाति-प्रथा ने भारतीयों को अनगिनत टुकड़ों में बांट दिया है, जिससे उनके बीच की एकता और सामूहिक साहस पूरी तरह समाप्त हो गया है। जब लोग आपस में ही बंटे होंगे, तो उनमें राष्ट्रीय चेतना का विकास कैसे हो सकता है? राममोहन राय ने उपनिषदों और प्राचीन ग्रंथों का हवाला देकर यह सिद्ध किया कि हिंदू धर्म का मूल स्वरूप एकेश्वरवाद और मानवतावाद पर आधारित है, न कि इस प्रकार के कृत्रिम विभाजनों पर।धार्मिक कर्मकांडों और अंधविश्वासों का विरोध है।समाज में व्याप्त अत्यधिक धार्मिक कर्मकांडों, मूर्तिपूजा के नाम पर होने वाले पाखंडों और पुरोहितवाद का कड़ा विरोध किया। उनके अनुसार, ये कर्मकांड मनुष्य की तार्किक क्षमता को कुंठित करते हैं। एक जागरूक और शिक्षित नागरिक ही किसी राष्ट्र की राजनीतिक उन्नति का आधार बन सकता है। इसलिए, उन्होंने धर्म के एक ऐसे स्वरूप की वकालत की जो समाज को संकीर्णता और विभाजन में बांधने के बजाय आगे बढ़ाए, उसे गतिशील बनाए।यदि राजा राममोहन राय के सामाजिक आंदोलनों के चरमोत्कर्ष को देखना हो, तो सती प्रथा के खिलाफ उनका संघर्ष इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। धर्म और परंपरा के नाम पर जीवित महिलाओं को चिता पर जिंदा जला देना एक ऐसी क्रूरता थी, जिसने राममोहन राय की आत्मा को झकझोर दिया था।उन्होंने इसके खिलाफ एक चौतरफा युद्ध छेड़ा। एक तरफ उन्होंने शास्त्रार्थ के माध्यम से यह साबित किया कि किसी भी पवित्र हिंदू ग्रंथ में सती प्रथा को अनिवार्य या धार्मिक रूप से वैध नहीं ठहराया गया है। दूसरी तरफ, उन्होंने आम जनता के बीच जाकर जागरूकता अभियान चलाया और श्मशानों का दौरा कर लोगों को इस कृत्य को रोकने के लिए प्रेरित किया।यह संघर्ष केवल सामाजिक सुधार नहीं था, बल्कि यह मानवीय अधिकारों और महिला गरिमा की बहाली का पहला बड़ा भारतीय आंदोलन था। अंततः, उनके अथक प्रयासों के कारण ही ब्रिटिश सरकार को १८२९ में 'सती प्रथा निषेध अधिनियम' पारित करना पड़ा। इस घटना ने साबित कर दिया कि वैचारिक दृढ़ता और तार्किक दृष्टिकोण से सदियों पुरानी कुरीतियों को भी उखाड़ा जा सकता है।
आधी आबादी का अधिकार ,महिला शिक्षा और सशक्तिकरण है।राजा राममोहन राय भारतीय समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति को लेकर बेहद संवेदनशील थे। वे जानते थे कि जिस समाज में आधी आबादी अज्ञानता और परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ी हो, वह समाज कभी प्रगति नहीं कर सकता। उन्होंने पुरजोर वकालत की कि महिलाओं को पुरुषों के समान ही आधुनिक शिक्षा मिलनी चाहिए। शिक्षा ही वह माध्यम है जो उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सचेत करेगी।संपत्ति का अधिकार है।उन्होंने प्राचीन हिंदू कानूनों का अध्ययन कर यह आवाज उठाई कि विधवाओं और बेटियों को संपत्ति में कानूनी अधिकार मिलना चाहिए, ताकि वे आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर न रहें और समाज में सम्मानजनक जीवन जी सकें।उन्होंने बाल विवाह का कड़ा विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। उनका मानना था कि विवाह दो आत्माओं का सम्मानजनक बंधन है, न कि किसी सामाजिक कुप्रथा की वेदी पर महिला की बलि।राजा राममोहन राय केवल अतीत की बुराइयों को कोसने वाले विचारक नहीं थे, बल्कि उनके पास भविष्य के भारत का एक स्पष्ट रोडमैप था। वे जानते थे कि पारंपरिक शिक्षा पद्धति, जो केवल व्याकरण और रूढ़िवादी धार्मिक ग्रंथों तक सीमित थी, आधुनिक विश्व के साथ कदम मिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।इसी सोच के साथ उन्होंने भारत में पश्चिमी विज्ञान, गणित, दर्शन और अंग्रेजी शिक्षा की वकालत की। १८४६ में स्थापित हिंदू कॉलेज (बाद में प्रेसीडेंसी कॉलेज) की स्थापना में उनकी भूमिका मील का पत्थर साबित हुई। उनका मानना था कि आधुनिक शिक्षा भारतीयों के मानस को संकीर्णता से मुक्त करेगी और उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करेगी। वे पूर्व और पश्चिम के विचारों के बेहतरीन समन्वय के पक्षधर थे। वे चाहते थे कि भारतीय अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें, लेकिन ज्ञान की खिड़कियां पूरी दुनिया के लिए खुली रखें।
ब्रह्म समाज: तार्किकता और मानवतावाद का संस्थागत स्वरूप -अपने विचारों को एक संगठित और स्थायी रूप देने के लिए राजा राममोहन राय ने १८२८ में 'ब्रह्म समाज' की स्थापना की। यह कोई नया धर्म नहीं था, बल्कि हिंदू धर्म के भीतर ही एक सुधारवादी आंदोलन था।ब्रह्म समाज ने बंगाल और धीरे-धीरे पूरे भारत के प्रबुद्ध वर्ग को एक ऐसा मंच दिया, जहाँ वे बिना किसी धार्मिक संकीर्णता के देश के भविष्य पर चर्चा कर सकते थे। इसने भारतीय बौद्धिक वर्ग में आत्म-सम्मान और गौरव की भावना पैदा की, जो आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम की वैचारिक रीढ़ बनी।अक्सर लोग राजा राममोहन राय को केवल एक समाज सुधारक के रूप में याद रखते हैं, लेकिन उनका राजनीतिक चिंतन उतना ही गहरा और क्रांतिकारी था। वे भारत के पहले ऐसे राजनेता थे जिन्होंने 'नागरिक अधिकारों' और 'संवैधानिक तौर-तरीकों' की बात की थी।
राजा राममोहन राय को भारतीय पत्रकारिता का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने 'संवाद कौमुदी' (बंगाली) और 'मिरात-उल-अखबार' (फारसी) जैसे समाचार पत्रों का संपादन और प्रकाशन किया। उनके लिए प्रेस केवल सूचना देने का साधन नहीं था, बल्कि जन-जागृति और सरकार की नीतियों की आलोचना का एक सशक्त माध्यम था।जब १८२३ में ब्रिटिश सरकार ने प्रेस पर कड़े प्रतिबंध लगाने के लिए 'लाइसेन्सिंग रेगुलेशन एक्ट' लागू किया, तो राममोहन राय ने इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उनका यह कदम भारतीय इतिहास में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए किया गया पहला संगठित कानूनी और राजनीतिक संघर्ष था। उनका मानना था कि एक जीवंत समाज के लिए स्वतंत्र प्रेस का होना अनिवार्य है।
प्रशासनिक और न्यायिक सुधारों की मांग है।ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन प्रणाली की कमियों को उजागर किया और कई महत्वपूर्ण सुधारों की मांग की, जैसे:कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण।भारतीय अदालतों में जूरी प्रणाली की शुरुआत। कर प्रणाली को उदार बनाना ताकि किसानों का उत्पीड़न बंद हो।सभी मांगें दर्शाती हैं कि वे एक ऐसे आधुनिक शासन तंत्र की कल्पना कर रहे थे जो कानून के शासन पर आधारित हो। वैश्विक दृष्टिकोण और अंतर्राष्ट्रीयतावाद है।राजा राममोहन राय केवल भारत की सीमाओं में बंधे विचारक नहीं थे। वे दुनिया के पहले अंतर्राष्ट्रीयतावादी विचारकों में से एक थे। वे दुनिया में कहीं भी हो रहे स्वतंत्रता संग्राम या लोकतांत्रिक आंदोलनों का दिल से समर्थन करते थे। जब स्पेन में संवैधानिक शासन की स्थापना हुई या जब नेपल्स में स्वतंत्रता आंदोलन विफल हुआ, तो उसकी लहरें राममोहन राय के दिल को छूती थीं। उनका मानना था कि पूरी मानवता एक ही परिवार है और स्वतंत्रता की लड़ाई सार्वभौमिक है।
यदि हम गहराई से देखें, तो आज भी हमारा समाज कई स्तरों पर उन्हीं चुनौतियों से जूझ रहा है, जिनका सामना राजा राममोहन राय ने दो सौ साल पहले किया था। आज भी जातिगत विद्वेष, धार्मिक ध्रुवीकरण, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अंधविश्वास की खबरें हमारे अखबारों की सुर्खियां बनती हैं।आज के 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' और फेक न्यूज के दौर में, जहाँ बिना सोचे-समझे किसी भी सूचना पर विश्वास कर लिया जाता है, राममोहन राय का 'तार्किकता का सिद्धांत' सबसे बड़ा मार्गदर्शक है। हमें हर विचार को विवेक की कसौटी पर कसना होगा।महिला सशक्तिकरण का अधूरा एजेंडा है। कानूनन आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, लेकिन सामाजिक मानसिकता में आज भी पितृसत्तात्मक संकीर्णता मौजूद है। राममोहन राय का दर्शन हमें याद दिलाता है कि महिलाओं को केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि पूर्ण गरिमा और अधिकार देना होगा। लोकतांत्रिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखने के लिए प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के प्रति सजगता आज उतनी ही जरूरी है, जितनी १८२३ में थी।
राजा राममोहन राय ने सामाजिक सुधार को केवल एक नैतिक कर्तव्य नहीं माना, बल्कि उसे राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक विकास के इंजन के रूप में स्थापित किया। उन्होंने समझ लिया था कि आंतरिक रूप से सुदृढ़ समाज ही बाहरी स्वतंत्रता को संभाल सकता है। उन्होंने जो वैचारिक नींव रखी, उसी पर आगे चलकर ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद, महात्मा ज्योतिराव फुले और अंततः महात्मा गांधी व डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने आधुनिक और समतामूलक भारत की भव्य इमारत का निर्माण किया। वे सही मायनों में एक ऐसे प्रकाश स्तंभ थे, जिन्होंने भारतीय समाज को भूतकाल के गौरव में डूबने के बजाय भविष्य की चुनौतियों का सामना करना सिखाया। आज के भारत को यदि एक समावेशी
राममोहन राय ने भारत में आधुनिक युग का सूत्रपात किया। उन्हें भारतीय पुनर्जागरण का पिता तथा भारतीय राष्ट्रवाद का प्रवर्तक भी कहा जाता है उनके धार्मिक और सामाजिक सब विचारों के पीछे अपने देशवासियों की राजनीतिक उन्नति करने की भावना मौजूद रहती थी। वे आगे लिखते हैं कि मुझे यह खेदपूर्वक कहना पड़ता है कि हिन्दुओं की वर्तमान पद्धति उनके राजनीतिक हितों की दृष्टि से ठीक नहीं है। जात पात के भाव ने उन्हें राजनीतिक भावना में शून्य कर दिया है। सैकड़ों हज़ारों धार्मिक कृत्यों और शुद्धता के नियमों ने उन्हें कोई भी कठिन काम करने के अयोग्य बना दिया है। मैं समझता हूँ कि यह आवश्यक है कि उनके राजनीतिक लाभ और सामाजिक सुविधा के लिए उनके धर्म में कुछ परिवर्तन हो।
राममोहन राय ने भारत में आधुनिक युग का सूत्रपात किया। उन्हें भारतीय पुनर्जागरण का पिता तथा भारतीय राष्ट्रवाद का प्रवर्तक भी कहा जाता है उनके धार्मिक और सामाजिक सब विचारों के पीछे अपने देशवासियों की राजनीतिक उन्नति करने की भावना मौजूद रहती थी। वे आगे लिखते हैं कि मुझे यह खेदपूर्वक कहना पड़ता है कि हिन्दुओं की वर्तमान पद्धति उनके राजनीतिक हितों की दृष्टि से ठीक नहीं है। जात पात के भाव ने उन्हें राजनीतिक भावना में शून्य कर दिया है। सैकड़ों हज़ारों धार्मिक कृत्यों और शुद्धता के नियमों ने उन्हें कोई भी कठिन काम करने के अयोग्य बना दिया है। मैं समझता हूँ कि यह आवश्यक है कि उनके राजनीतिक लाभ और सामाजिक सुविधा के लिए उनके धर्म में कुछ परिवर्तन हो



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