- भारतीय उद्योग जगत के ‘भीष्म पितामह’ की कालजयी गाथा
Upgrade Jharkhand News. भारत के औद्योगिक इतिहास में कुछ नाम केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि युग परिवर्तन के प्रतीक बन जाते हैं। जमशेदजी नसरवानजी टाटा ऐसा ही एक नाम है, जिन्होंने औपनिवेशिक भारत के अंधकारमय दौर में आधुनिक औद्योगिक राष्ट्रवाद की मशाल जलाई। आज जब देश ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसे अभियानों के माध्यम से आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब यह स्मरण करना आवश्यक है कि इस विचार की वास्तविक नींव एक सदी पहले ही जमशेदजी टाटा ने रख दी थी।
वे केवल उद्योगपति नहीं थे; वे राष्ट्र-निर्माता, दूरदर्शी चिंतक, सामाजिक सुधारक और मानवीय मूल्यों पर आधारित औद्योगिक संस्कृति के निर्माता थे। उन्होंने भारतीय समाज में यह आत्मविश्वास जगाया कि भारतीय भी आधुनिक विज्ञान, तकनीक और बड़े उद्योगों के संचालन में विश्व का नेतृत्व कर सकते हैं।जमशेदजी नसरवानजी टाटा का जन्म 3 मार्च 1839 को नवसारी में एक पारसी परिवार में हुआ। उनके पिता नुसरवानजी टाटा अपने परिवार की पुरोहिती परंपरा को छोड़कर व्यापार में आने वाले पहले व्यक्ति थे। यही साहस और नवीन दृष्टि आगे चलकर जमशेदजी के व्यक्तित्व का मूल आधार बनी।कम आयु में ही वे अपने पिता के साथ मुंबई आए, जहां उन्होंने प्रतिष्ठित एल्फिंस्टन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। पश्चिमी शिक्षा और वैश्विक दृष्टिकोण ने उनके भीतर आधुनिकता और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत समन्वय पैदा किया।
वर्ष 1868 में मात्र ₹21,000 की पूंजी के साथ उन्होंने अपनी व्यापारिक फर्म की स्थापना की। यह छोटा-सा कदम आगे चलकर भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूह की नींव बना। उनका पहला बड़ा प्रयोग वस्त्र उद्योग में हुआ। उन्होंने बंद पड़ी तेल मिल खरीदकर उसे कपड़ा मिल में बदला और उसका नाम ‘अलेक्जेंड्रा मिल’ रखा। इस प्रयोग ने उनकी प्रबंधन क्षमता और औद्योगिक दूरदृष्टि को साबित कर दिया।इसके बाद उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया जिसने भारतीय उद्योग जगत की दिशा बदल दी—उन्होंने कपड़ा मिल के लिए मुंबई के बजाय नागपुर को चुना। उस समय यह अत्यंत साहसिक निर्णय था। कपास उत्पादक क्षेत्रों के निकट होने, कोयले और पानी की उपलब्धता तथा रेलवे संपर्क के कारण नागपुर उनके लिए आदर्श स्थान था।1 जनवरी 1877 को ‘एम्प्रेस मिल’ की स्थापना हुई। यह केवल एक कपड़ा मिल नहीं थी, बल्कि भारतीय औद्योगिक आत्मविश्वास का उद्घोष थी। यहां आधुनिक मशीनों और नवीन तकनीकों का उपयोग किया गया। जमशेदजी ने सिद्ध कर दिया कि भारतीय उद्योग गुणवत्ता और दक्षता में यूरोप को चुनौती दे सकते हैं।
जमशेदजी नसरवानजी टाटा ने भारत को औद्योगिक और वैज्ञानिक महाशक्ति बनाने के लिए चार महान सपने देखे है। इस्पात उद्योग की स्थापना,विश्वस्तरीय वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान,जलविद्युत परियोजना,एक भव्य अंतरराष्ट्रीय होटल है।इनमें से अधिकांश सपने उनके निधन के बाद पूरे हुए, लेकिन उनकी दूरदृष्टि इतनी स्पष्ट थी कि आने वाली पीढ़ियों ने उन्हें साकार कर दिखाया। भारत को औद्योगिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए स्टील उत्पादन को वे अनिवार्य मानते थे। वर्षों के सर्वेक्षण के बाद झारखंड के साकची गांव को स्टील प्लांट के लिए चुना गया।1907 में टाटा स्टील की स्थापना हुई। यह भारत के औद्योगिक इतिहास की सबसे निर्णायक घटनाओं में से एक थी। आगे चलकर यही साकची शहर जमशेदपुर बना।जमशेदजी ने केवल कारखाना नहीं बनाया; उन्होंने एक आदर्श औद्योगिक नगर की परिकल्पना की। चौड़ी सड़कें, पेड़, उद्यान, खेल मैदान और सभी धर्मों के पूजा स्थल—यह सोच उस समय के यूरोपीय औद्योगिक शहरों से भी आगे थी।
जमशेदजी मानते थे कि बिना विज्ञान और अनुसंधान के कोई भी राष्ट्र महान नहीं बन सकता। उन्होंने अपनी निजी संपत्ति का बड़ा हिस्सा वैज्ञानिक शिक्षा के लिए दान कर दिया।1909 में भारतीय विज्ञान संस्थान की स्थापना हुई। आज यह संस्थान भारत के वैज्ञानिक विकास की धुरी माना जाता है और इसरो से लेकर परमाणु कार्यक्रम तक के लिए प्रतिभाएं तैयार कर चुका है।औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन की चिंता भी जमशेदजी की सोच का हिस्सा थी। उन्होंने जलविद्युत परियोजनाओं की परिकल्पना की, जिससे उद्योगों को स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा मिल सके। आगे चलकर टाटा पावर ने इस सपने को साकार किया और मुंबई के औद्योगिक विकास को नई गति दी। 1903 में ताज महल पैलेस होटल का उद्घाटन हुआ। यह भारत का पहला विश्वस्तरीय लक्जरी होटल था।कहा जाता है कि नस्लीय भेदभाव के कारण एक यूरोपीय होटल में प्रवेश न मिलने के बाद जमशेदजी ने ऐसा होटल बनाने का निश्चय किया जो भारतीय गौरव का प्रतीक बने। ताज होटल आधुनिक सुविधाओं से युक्त था—बिजली, लिफ्ट, विदेशी पंखे और विश्वस्तरीय आतिथ्य सेवा।आज भी यह होटल भारत की प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान का प्रतीक माना जाता है।
जमशेदजी नसरवानजी टाटा की महानता केवल उद्योग लगाने में नहीं, बल्कि श्रमिकों के प्रति उनकी संवेदनशीलता में भी थी।उन्होंने ऐसे समय में कर्मचारियों के लिए सुविधाएं लागू कीं, जब दुनिया के अधिकांश देशों में श्रमिक अधिकारों की कोई अवधारणा तक नहीं थी।स्वच्छ और सुरक्षित कार्यस्थल,भविष्य निधि, दुर्घटना मुआवजा,पेंशन योजनाएं है। आज जिसे कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी कहा जाता है, उसका व्यावहारिक स्वरूप जमशेदजी ने 19वीं सदी में ही प्रस्तुत कर दिया था जमशेदजी नसरवानजी टाटा का मानना था कि उद्योग से अर्जित संपत्ति अंततः समाज की धरोहर है।उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और अनुसंधान के लिए विशाल दान दिए। 1892 में स्थापित ‘जेएन टाटा एंडोमेंट’ ने हजारों भारतीय छात्रों को विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया।उनकी परोपकार की परंपरा आगे चलकर टाटा ट्रस्ट्स के माध्यम से और भी विस्तृत हुई। 19 मई 1904 को जर्मनी के बैड नौहेम में उनका निधन हुआ। लेकिन उनकी दृष्टि, मूल्य और राष्ट्रनिर्माण का सपना अमर हो गया।आज टाटा समूह विश्व के सबसे प्रतिष्ठित औद्योगिक समूहों में गिना जाता है। नमक से लेकर सॉफ्टवेयर, स्टील से लेकर विमानन और ऑटोमोबाइल तक, टाटा समूह भारत की औद्योगिक शक्ति का प्रतीक है।
आज जब भारत आत्मनिर्भरता, तकनीकी नवाचार और वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है, तब जमशेदजी नसरवानजी टाटा की विचारधारा पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठती है। उन्होंने सिखाया कि सच्चा राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं होता; वह आर्थिक शक्ति, वैज्ञानिक चेतना, श्रमिक सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी से निर्मित होता है।वे निस्संदेह आधुनिक औद्योगिक भारत के ‘भीष्म पितामह’ थे—एक ऐसे युगदृष्टा, जिन्होंने भारतीय उद्योग को केवल व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का माध्यम बनाया।संपूर्ण राष्ट्र इस महान विभूति को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है।



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