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Bhopal मध्यप्रदेश में राहुल का प्रयोग और मीनाक्षी प्रकरण: कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे...Rahul's experiment in Madhya Pradesh and the Meenakshi episode: The caravan passed, we kept watching the dust...

 


Upgrade Jharkhand News.  "स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,

लुट गए श्रृंगार सभी, बाग़ के बबूल से।

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे,

कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।"


हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि गोपाल दास नीरज की ये पंक्तियाँ इस समय मध्य प्रदेश कांग्रेस की स्थिति पर सटीक बैठती हैं। राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने की घटना ने प्रदेश कांग्रेस के संगठन, नेतृत्व और राजनीतिक परिपक्वता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। यह किसी चुनावी हार की कहानी नहीं है, यह उस चूक की कहानी है जिसमें जीत और हार का फैसला मतदान से पहले ही हो गया। इस समय सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इस पूरे घटनाक्रम की राजनीतिक जवाबदेही कौन तय करेगा? क्या यह मामला एक तकनीकी गलती मानकर भुला दिया जाएगा या फिर कांग्रेस नेतृत्व इसे संगठनात्मक विफलता के रूप में देखेगा?  राजनीति में कई बार हार जनता देती है और कई बार नेता स्वयं अपने हाथों से अवसर गंवा देते हैं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के साथ भी ऐसा ही हुआ या ऐसे हालात दिखा दिए गए कि राज्यसभा की एक और सीट भारतीय जनता पार्टी उनसे जबरदस्ती छीन ले गई। ये ठीक वैसा ही दृश्य दिखाने की कोशिश लगती है, जब अपराधी अपराध करने के बाद अपने बचाव के लिए कुछ दृश्य प्लांट कर देता है।


मीनाक्षी नटराजन को क्यों चुना गया था? -  राज्यसभा चुनाव के लिए मीनाक्षी नटराजन का चयन सामान्य राजनीतिक निर्णय नहीं था। यह सीधे तौर पर राहुल गांधी की राजनीतिक सोच से जुड़ा हुआ निर्णय माना जा रहा है। मीनाक्षी नटराजन लंबे समय से राहुल गांधी की विश्वसनीय सहयोगियों में गिनी जाती हैं। वे कांग्रेस संगठन में राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय रही हैं और वर्तमान में तेलंगाना की प्रभारी जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रही हैं। उनकी पहचान उन नेताओं में रही है जो सत्ता की राजनीति से अधिक संगठनात्मक राजनीति में सक्रिय रहे।       मध्य प्रदेश की राजनीति में उनका अपना इतिहास भी रहा है। वे 2009 से 2014 तक मंदसौर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। उस समय उन्हें कांग्रेस की उभरती हुई युवा नेता माना जाता था। बाद के वर्षों में वे चुनाव हारी और उनकी सक्रियता दिल्ली और राष्ट्रीय संगठन तक सीमित होती चली गई। प्रदेश की राजनीति में उनकी सीधी भागीदारी कम होती गई।


राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा लंबे समय से थी कि राहुल गांधी मीनाक्षी नटराजन को फिर से मध्य प्रदेश की राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं। राज्यसभा चुनाव इस दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा था। यदि वे निर्वाचित होतीं तो प्रदेश में कांग्रेस को एक नया चेहरा मिलता और राहुल गांधी के भरोसेमंद नेताओं में से एक नेता मध्य प्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने की स्थिति में आतीं,मगर यह प्रयास मतदान तक भी नहीं पहुंच सका।


चूक या संगठनात्मक विफलता - राज्यसभा चुनाव का नामांकन कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं होती। इसमें विधायी दल, संगठन, कानूनी सलाहकार और वरिष्ठ नेता सक्रिय रहते हैं। हर दस्तावेज कई स्तरों पर जांचा जाता है। उम्मीदवार के साथ पार्टी के सबसे अनुभवी लोग मौजूद रहते हैं। ऐसी स्थिति में यदि नामांकन निरस्त हो जाता है तो यह किसी एक व्यक्ति की भूल नहीं मानी जा सकती। इस पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत दिया है कि प्रदेश कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के बीच समन्वय और गंभीरता की कमी है। जिस प्रक्रिया में अतिरिक्त सावधानी बरती जानी चाहिए थी, उसी में ऐसी चूक होना बताता है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों ने अपेक्षित सतर्कता नहीं दिखाई। राजनीतिक रूप से यह घटना कांग्रेस के लिए इसलिए अधिक नुकसानदेह है क्योंकि यह विरोधियों के साथ जनता को पूरी कांग्रेस की क्षमता पर सवाल उठाने का अवसर देती है। चुनाव हार जाना अलग बात है, चुनाव लड़ने का अवसर खो देना अलग बात है।


जीतू, उमंग और दिग्विजय पर उठ रहे सवाल -  इस पूरे प्रकरण के बाद स्वाभाविक रूप से प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी संगठन के सर्वोच्च पद पर हैं। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार विधानसभा में कांग्रेस का चेहरा हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह प्रदेश कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। अब राजनीति ही नहीं बल्कि सामान्य चर्चाओं में भी सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि जब इतने बड़े नेता पूरी प्रक्रिया में मौजूद थे तो आखिर ऐसी स्थिति बनी कैसे?  कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि यदि पार्टी अपने राज्यसभा प्रत्याशी का नामांकन तक सुरक्षित नहीं रख सकती तो फिर वह बड़े राजनीतिक संघर्षों का नेतृत्व कैसे करेगी? इस घटना को संगठन की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली घटना भी माना जा रहा है। कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी सामने आना स्वाभाविक है, उनका मनोबल कमजोर होता है।


राहुल गांधी के लिए भी यह बड़ा संदेश -  यह मामला केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संदेश राहुल गांधी तक भी पहुंचा है। कांग्रेस में लंबे समय से संगठन को नए ढंग से खड़ा करने की बात होती रही है। राहुल गांधी लगातार युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने और संगठन को नई दिशा देने की कोशिश करते रहे हैं। मीनाक्षी नटराजन का चयन भी उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा था,मगर प्रदेश नेतृत्व की लापरवाही ने उस प्रयास को बीच रास्ते में रोक दिया। राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो नुकसान मीनाक्षी नटराजन का नहीं हुआ है। सबसे बड़ा नुकसान उस राजनीतिक संदेश का हुआ है जिसे राहुल गांधी मध्य प्रदेश में स्थापित करना चाहते थे। जिस नेता को राष्ट्रीय स्तर से प्रदेश की राजनीति में फिर से स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा था, उसका नामांकन ही निरस्त हो जाना कांग्रेस नेतृत्व के लिए असहज स्थिति पैदा करता है।


अब निगाहें राहुल और खड़गे पर -  इस पूरे प्रकरण के बाद कांग्रेस के भीतर सबसे बड़ी चर्चा कार्रवाई को लेकर है। अब निगाहें राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पर टिक गई हैं। प्रदेश कांग्रेस के पदाधिकारियों और वरिष्ठ नेताओं की भूमिका की समीक्षा होगी या नहीं, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। यदि इस पूरे मामले को सामान्य भूल मानकर छोड़ दिया जाता है तो कार्यकर्ताओं के बीच गलत संदेश जाएगा। दूसरी ओर यदि जवाबदेही तय होती है तो यह संदेश जाएगा कि कांग्रेस नेतृत्व संगठनात्मक अनुशासन को लेकर गंभीर है। राजनीतिक दलों में गलतियां होती हैं। चुनावी राजनीति में कई बार अप्रत्याशित घटनाएं भी सामने आती हैं। अंतर इस बात से पड़ता है कि नेतृत्व उन घटनाओं पर प्रतिक्रिया कैसे देता है। मध्य प्रदेश कांग्रेस इस समय उसी मोड़ पर खड़ी है।


जवाबदेही तय होगी या नहीं? -  कांग्रेस के सामने आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है। मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के साथ पार्टी को  राजनीतिक नुकसान भी हो चुका है। संगठन की छवि को जो आघात लगा है, वह भी तुरंत समाप्त नहीं होगा। लेकिन पार्टी के पास अभी एक अवसर है। वह यह तय कर सकती है कि इस घटना को एक सबक बनाया जाए या फिर इसे भी अन्य विवादों की तरह समय के हवाले कर दिया जाए। यदि जिम्मेदारी तय नहीं हुई तो कार्यकर्ताओं में यह धारणा और मजबूत होगी कि कांग्रेस में पद तो हैं,लेकिन जवाबदेही नहीं। यदि कार्रवाई हुई तो यह संकेत जाएगा कि पार्टी अपनी भूलों से सीखने को तैयार है इसलिए अब पूरा राजनीतिक ध्यान मीनाक्षी नटराजन पर नहीं, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के अगले कदम पर है।


मध्य प्रदेश कांग्रेस के लिए यह घटना एक चेतावनी है। यदि इस प्रकरण से सबक नहीं लिया गया, जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय नहीं हुई और संगठनात्मक शिथिलता पर अंकुश नहीं लगा, तो भविष्य में भी अवसर हाथ से निकलते रहेंगे। तब पार्टी के हाथ में राजनीतिक सफलता नहीं, गुबार ही बचेगा और कारवाँ बहुत दूर निकल चुका होगा। तब कांग्रेस के हर कार्यकर्ता को नीरज जी की ये पंक्तियां प्रासंगिक लगेंगी-

"स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,

लुट गए श्रृंगार सभी, बाग़ के बबूल से।

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे,

कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

पवन वर्मा



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