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Bhopal दृष्टिकोण -बुरा जो देखन मैं चला Viewpoint - I went to see the bad

Upgrade Jharkhand News.  समाज में विचारों की सत्ता ही सर्वोपरि है। विचारों से ही अनुभूति को अभिव्यक्ति दी जा सकती है। सत्य यह भी है कि सुकरात चिन्तन से प्रभावित होकर सृष्टि में परमात्मा की परम शक्ति को स्वीकारने से परहेज नहीं किया जा सकता। ऐसे में दृष्टि एवं दृष्टिकोण का बड़ा महत्व है, कि व्यक्ति का सामाजिक मान्यताओं, सामाजिक सत्यों, सामाजिक व्यवहार एवं आम व खास व्यक्तियों के प्रति दृष्टिकोण नकारात्मक है अथवा सकारात्मक ? धर्म, जाति, संप्रदाय के संकीर्ण बंधनों से मुक्त जनकवि कबीर दास का दोहा जनमानस को अपने अंतस में झाँकने एवं आत्म अवलोकन हेतु प्रेरित करता है, कि- 

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। 

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।। 


सामाजिक प्राणी होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति बिना सामाजिक सद्भाव, सहयोग, परस्पर निर्भरता, कार्य के प्रति समर्पण भाव,त्याग जैसे मूल्यों के बिना अर्थात एकल आधार पर जीवनयापन नहीं कर सकता। सामाजिक चिन्तन से ऊपर उठकर राष्ट्र की बात करें, तो राष्ट्र में अनेक प्रकार के मत, धर्म, पंथ, आचरण पद्धतियाँ अर्थात् जीवन शैलियाँ विद्यमान रहती हैं। ऐसे में वैचारिक मत भिन्नता होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभिन्नता का अभिप्राय यह नहीं है, कि अपने अपने विचारों को अन्य विचारों से श्रेष्ठ सिद्ध करने के दंभ में अन्य विचारों को नकार दिया जाए। व्यक्तिगत विचारों से बढ़कर एक विचार है, जिसके अंतर्गत व्यक्ति से बढ़कर राष्ट्र को सर्वोपरि माना जाता है। भले ही कितने ही मनभेद अथवा मतभेद हों, राष्ट्र के सम्मुख सभी बौने हैं। राष्ट्र के प्रति निष्ठा एवं समर्पण का विचार जनमानस के लिए प्राथमिकता के आधार पर सर्वोपरि होना अपेक्षित है। यही सच्चा राष्ट्रवाद है। राष्ट्रवाद किसी सामाजिक संस्था, किसी विशेष समूह या किसी विशेष राजनीतिक दल की बपौती नहीं है। राष्ट्रीय अनुशासन को नकारने वाले तत्वों के लिए भी राष्ट्रवाद में कोई स्थान नहीं है। स्पष्ट रूप से राष्ट्रवाद की व्याख्या की जाए, तो राष्ट्रवाद राष्ट्र के प्रति अपने नागरिक दायित्वों के निर्वहन हेतु जनमानस का संकल्प है, जिसके लिए समस्त सार्वजनिक सुविधाओं के रखरखाव, सरकारी संपत्तियों के संरक्षण, राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महापुरुषों के प्रति सम्मान का भाव अपेक्षित होता है, साथ ही यह भी अनिवार्य होता है, कि राष्ट्र की समृद्धि में नागरिक तन मन धन से कितना योगदान देता है।


विडंबना है कि भारत में कतिपय राजनीतिक दल तथा विभाजनकारी शक्तियां आम आदमी को नागरिक कर्तव्यों की अवहेलना करने के लिए उकसाने का हर संभव प्रयास करते हैं। राष्ट्र के सम्मुख समय समय पर उपस्थित होने वाली चुनौतियों में राष्ट्र का सहयोग करने की अपेक्षा राष्ट्र के व्यवस्थापकों के विरुद्ध खड़े होने और चुनौतियों को बढ़ाने में संकोच नहीं करते। बहरहाल यह स्थिति किसी भी देश के लिए उचित नहीं कही जा सकती। ऐसे में आवश्यक है कि प्रत्येक नागरिक आत्म अवलोकन करके स्वयं से ही प्रश्न करे, कि राष्ट्र हित में उसने अपना कितना योगदान दिया। मुफ्त कि सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाने वालों की पात्रता का परीक्षण हो, कि जिन्हें मुफ्त सुविधाएं प्रदान करके आम आदमी की सुविधाओं में कटौती की जा रही है, कहीं वे इन सुविधाओं का दुरुपयोग तो नहीं कर रहे। यही नहीं, समाज को बांटकर राष्ट्र को कमजोर करने में कौन सी शक्तियां सक्रिय हैं, जो भारत के इतिहास की मनगढ़ंत व्याख्या करके समाज में वैमनस्य उत्पन्न करने का एजेंडा चला रहे हैं। समय व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से उबर कर राष्ट्र के प्रति समर्पित दृष्टिकोण अपनाने का है। यदि जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा के आधार पर आपस में लड़ते रहे, तब राष्ट्र के अखंड रहने की अवधारणा पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। यह पुस्तक राष्ट्र के वर्तमान परिदृश्य के कुछ प्रसंगों, राष्ट्र निष्ठा के प्रति जनमानस के उपेक्षित व्यवहार से उत्पन्न आक्रोश की अभिव्यक्ति है। आओ आत्मचिन्तन करें और विचारें, कि हम राष्ट्र के प्रति कितने समर्पित एवं निष्ठावान हैं। डॉ. सुधाकर आशावादी



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