Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

Bhopal जब सत्ता बचाने के लिए संविधान का गला घोंटा गया" When the Constitution was strangled to save power."

 


25 जून 1975

Upgrade Jharkhand News.  25 जून 1975 की वह तारीख भारतीय इतिहास के पन्नों पर एक ऐसा अमिट और काला धब्बा है, जिसे चाहकर भी कभी मिटाया नहीं जा सकता। यह वह दिन था जब भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर एक गहरा आघात किया गया था। सत्ता के अहंकार और अपनी राजनीतिक कुर्सी को हर हाल में बचाए रखने की घिनौनी जिद के कारण तत्कालीन कांग्रेस सरकार और प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने पूरे देश को आपातकाल की बेड़ियों में जकड़ दिया था। सबसे ज्यादा शर्मनाक और अफसोसजनक बात तो यह थी कि इस तानाशाहीपूर्ण कदम के पीछे कोई राष्ट्रीय संकट या देश की सुरक्षा का कोई मुद्दा नहीं था, बल्कि केवल और केवल सत्ता को बचाए रखने का कांग्रेसी स्वार्थ था। जब देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया, तो उस न्यायिक निर्णय को झूठा ठहराने, उसकी अनदेखी करने और न्यायपालिका को अपने कदमों के नीचे रौंदने के लिए संविधान में ही मनमाने संशोधन कर दिए गए। जिस संविधान की दुहाई आज कांग्रेस और उसके सहयोगी दल देते नहीं थकते, उसी पवित्र संविधान की आत्मा को 1975 में इसी कुनबे ने लहूलुहान किया था। देश पर अनिश्चितकाल के लिए इमरजेंसी थोपकर लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया। 


आज जब कांग्रेस और उसके साथी दल लोकतंत्र एवं संविधान को बचाने के नाम पर राजनीतिक नाटक करते हैं और हाय-तौबा मचाते हैं, तो इतिहास की समझ रखने वाले हर नागरिक को गहरा आश्चर्य और घृणा होती है। इतिहास इस बात का साक्षात गवाह है कि जिस संगठन और जिन नेताओं ने भारत के माथे पर इमरजेंसी का यह कभी न छूटने वाला काला दाग लगाया, वे आज किस मुंह से लोकतांत्रिक होने का ढोंग रच रहे हैं। उस कालखंड में जिसने भी सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई, उसे बिना किसी वारंट के सलाखों के पीछे डाल दिया गया। समूचे विपक्ष के बड़े-बड़े नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया, प्रेस की आजादी छीन ली गई, मीडिया पर कड़ा सेंसरशिप लगाकर उसे सरकार की कठपुतली बना दिया गया और जनता के मौलिक अधिकारों को पूरी तरह से निलंबित कर दिया गया। सरकार के खिलाफ किसी भी तरह की अभिव्यक्ति या शांतिपूर्ण विरोध को सीधे देशद्रोह मान लिया गया और निर्दोष नागरिकों पर बेइंतहा अत्याचार किए गए। कांग्रेस का यह क्रूर दमन चक्र तब तक चलता रहा जब तक कि पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक पूरे देश में हाहाकार नहीं मच गया। लेकिन भारतीय जनता की रगों में लोकतंत्र का खून दौड़ता है, जिसे डराकर दबाया नहीं जा सकता था। छात्र, व्यापारी, सरकारी और निजी क्षेत्र के नौकरीपेशा लोग, देश के अन्नदाता किसान, उद्योगपति, महिलाएं और बुजुर्ग, समाज का हर वर्ग इस दमन के खिलाफ सड़कों पर उतर आया। पूरा देश 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'तानाशाही बंद करो' के गगनभेदी नारों से गूंज उठा था। कांग्रेस की पुलिस लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोलों और कई जगहों पर तो सीधे गोलियों का सहारा लेकर इस जन-आंदोलन को कुचलने की पुरजोर कोशिश कर रही थी। हजारों-लाखों देशभक्तों ने यातनाएं सहीं, कई लोगों ने अपनी जान गंवाई और अनेक परिवारों का जीवन हमेशा के लिए बर्बाद हो गया। पूरे ढाई साल तक चले इस भीषण और ऐतिहासिक संघर्ष के बाद, असंख्य कुर्बानियों के बूते पर बड़ी मुश्किल से 1977 में दोबारा लोकतंत्र का सूरज चमकता दिखाई दिया था। इस लोकतांत्रिक महासंग्राम में जिन ताकतों ने अग्रिम पंक्ति में रहकर लोहा लिया, उनमें भारतीय जनसंघ और वर्तमान की भारतीय जनता पार्टी की भूमिका स्वर्ण अक्षरों में लिखी जाने योग्य है। 


यदि आज भी भाजपा के शीर्ष और वयोवृद्ध नेतृत्व के उस दौर के अनुभवों को सुना जाए, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जो नेता जेलों में बंद थे, उन्हें ऐसी दिल दहला देने वाली शारीरिक और मानसिक यातनाओं का सामना करना पड़ता था जिसकी कल्पना भी आज की पीढ़ी नहीं कर सकती। वहीं दूसरी ओर, जिन्हें रणनीति के तहत भूमिगत रहकर इस विशाल आंदोलन की व्यूह रचना बनानी होती थी, उनके लिए कई-कई दिनों तक सूरज के दर्शन करना भी एक दुर्लभ विलासिता बन गया था। वे दिन-रात अंधेरे कमरों में या छिपकर देश को तानाशाही से मुक्त कराने की योजनाएं बुनते थे। आज के राजनीतिक परिदृश्य में ऐसे गिने-चुने संगठन ही बचे हैं जो उस अलोकतांत्रिक और क्रूर व्यवस्था के विरोध पर आज भी पूरी दृढ़ता से कायम हैं। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि वर्तमान भाजपा और पूर्व की भारतीय जनसंघ जिसने देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए लाठियां और गोलियां खाईं, वह आज हर पल पूरे देश को आपातकाल लगाने वाली कांग्रेस के उन काले दुष्कृत्यों से सावधान कर रही है, जबकि देश को ढाई साल तक इमरजेंसी की कालरात्रि में धकेलने वाली कांग्रेस आज खुद को लोकतंत्र की सबसे बड़ी रक्षक बताकर देश की जनता की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास कर रही है। यह देखकर वास्तव में शर्म आती है कि आज भी कांग्रेस और उसके तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सहयोगी संगठन उसी पुराने विभाजनकारी और दमनकारी चरित्र को अपनाए हुए हैं। जो संगठन हमेशा राष्ट्रवाद की पुरजोर हिमायत करते हैं, जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी, उन्हें ये लोग सांप्रदायिक और जनविरोधी घोषित करने का कुत्सित प्रयास करते हैं।


देशभक्तों पर कभी देश को तोड़ने का झूठा आरोप लगाया जाता है, तो कभी विदेशी ताकतों और विदेशी नेताओं के इशारों पर चलने के मनगढ़ंत दावे किए जाते हैं। जबकि हकीकत यह है कि आज पूरा विश्व अपनी आंखों से देख रहा है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के सशक्त नेतृत्व में आज का भारत वैश्विक पटल पर लोकतंत्र की उत्कृष्ट मिसाल पेश कर रहा है। आज भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और शासन मॉडल का लोहा समूचा विश्व मानता है। हमारे देश की इस मजबूत, पारदर्शी और विशाल लोकतांत्रिक प्रणाली का बारीकी से अवलोकन और अध्ययन करने के लिए आए दिन दुनिया भर से विदेशी मेहमान और नीति निर्माता भारत आते हैं। जब वे भारत के इतिहास को देखते हैं और फिर आज के बदलते भारत को देखते हैं, तो वे यह जानकर पूरी तरह हैरान रह जाते हैं कि क्या यह वही देश है जहां कभी सरकार के खिलाफ एक शब्द बोलना भी सबसे बड़ा अपराध और देशद्रोह मान लिया जाता था। आज वर्तमान शासन व्यवस्था में विरोधियों को इतनी अधिक और असीमित छूट मिली हुई है कि वे मर्यादाओं की सारी सीमाएं लांघकर देश के सर्वोच्च प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति को भी सरेआम अपशब्द कहने की हिम्मत जुटा लेते हैं, और फिर भी खुद को पीड़ित बताते हैं। यह बदलाव इस बात का जीवंत प्रमाण है कि आज देश में लोकतंत्र कितना गहरा और सहिष्णु हो चुका है। इस पूरे परिप्रेक्ष्य को लिखने और समझने का एकमात्र उद्देश्य यह है कि देश की वर्तमान और आने वाली युवा पीढ़ी को उस काले इतिहास को कभी भूलना नहीं चाहिए। देश की जनता को हमेशा याद रखना होगा कि कैसे 25 जून 1975 को कांग्रेस ने सिर्फ एक परिवार की सत्ता और एक पद को बचाने के लिए राष्ट्रीय लोकतंत्र की बलि चढ़ा दी थी और संविधान का सरेआम गला घोंट दिया था। इतिहास खुद को न दोहराए, इसके लिए अतीत की गलतियों और अत्याचारों को याद रखना बेहद जरूरी है। 


आइए आज हम सब मिलकर यह दृढ़ संकल्प लें कि हम भारत की धरती पर दोबारा कभी भी ऐसी तानाशाही और लोकतंत्र विरोधी ताकतों को कामयाब नहीं होने देंगे, जो अपने निजी स्वार्थ के लिए देश की स्वतंत्रता, संविधान और जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ करने की मानसिकता रखती हैं। डॉ. राघवेंद्र शर्मा



No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU

-ADVERTISEMENT-

.