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Bhopal नीट-यूजी परीक्षा: लकीर की फकीर व्यवस्था और बच्चों का टूटता भरोसा NEET-UG exam: A rigid system and the loss of trust of students

 


Upgrade Jharkhand News.  21 जून को हुई नीट-यूजी की पुनर्परीक्षा में कुछ स्थानों पर कई बच्चे पेपर नहीं दे पाए। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले का एक बेहद भावुक कर देने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। एनटीए की खामियों से परीक्षा रद्द होने के बाद बच्चों ने 50 दिन पेपर का इंतजार किया, लेकिन सख्त नियमों का हवाला देकर परीक्षा केंद्रों में बच्चों का 30-40 सेकेंड से लेकर 2-5 मिनट लेट होना भी कबूल नहीं किया गया। बच्चे के चंद सेकेंड लेट एंट्री से कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ता लेकिन परीक्षक लकीर के फकीर नजर आए। इससे एक बार पुनः यही साबित हुआ कि गलतियां भी बड़े लोगों की ही माफ होती हैं। बहरहाल सरकार के अभूतपूर्व इंतजाम फर्जीवाड़े की कोशिशों पर लगाम नहीं लगा सके। पेपर के दौरान बिहार के लखीसराय में एक बड़ा सॉल्वर गैंग पकड़ा गया। पुलिस की जांच में सामने आया है कि असली परीक्षार्थियों की जगह परीक्षा देने के लिए मेडिकल छात्रों ने 30 से 40 लाख रुपए में सौदा तय किया था। गैंग के सरगना समेत पीएमसीएच, गया मेडिकल कॉलेज, एम्स रायबरेली और बीएचयू के मेडिकल छात्रों सहित कुल 24 लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपियों में बायोमेट्रिक जांच करने वाली कंपनी के कर्मचारी भी शामिल हैं। कुछ रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लखीसराय में गिरफ्तार सॉल्वर गैंग का सरगना अर्पित राज 2024 के पेपर लीक से भी जुड़ा था। सीबीआई ने उस वक्त उससे कई बार पूछताछ की थी। फर्जीवाड़े में बायोमेट्रिक कंपनी के कर्मचारियों की गिरफ्तारी गंभीर है। क्योंकि सुरक्षा की इस व्यवस्था पर सरकार ने खासा जोर दिया था। जाहिर है सरकार के अभूतपूर्व इंतजामों में भी सुराख करने की कोशिश की गई। छात्रों का भरोसा जीतने की कोशिश कर रही एनटीए और सरकार के लिए यह किसी झटके से कम नहीं है।


अब यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि केंद्र सरकार, हर राज्य सरकार, भारी प्रशासनिक मशीनरी के साथ सेना तक जिस काम में लगी थी उसमें बदमाशों को फर्जीवाड़ा करने का साहस कहां से मिल रहा है? एक तर्क तो यही हो सकता है कि पुराने धतकर्मियों के मामले में लचर कानूनी कार्रवाई ने इनके हौसले बुलंद किए हैं। लिहाजा वे हर बार सरकारी व्यवस्थाओं को धता बताकर अपराध करने में सहज दिखते हैं। अगला सवाल हो सकता है कि आखिर सरकार ने पेपर लीक के मामले में क्या कदम उठाए? सीबीआई की तात्कालिक जांच से पता चला कि पुणे स्थित एक रसायनशास्त्र प्रोफेसर और एनटीए पैनल के पेपर सेटर की पहुंच गोपनीय परीक्षा सामग्री तक थी। उन्होंने विशेष कोचिंग सत्र आयोजित किए जिनमें उन्होंने प्रश्न और उत्तर चुनिंदा छात्रों को बताए। इन छात्रों को राजस्थान के कोचिंग केंद्रों में संपर्कों के माध्यम से अन्य एनटीए-मान्यता प्राप्त विषय विशेषज्ञों द्वारा जुटाया गया था। यानि व्यवस्था एनटीए के भीतर ही कमजोर है लेकिन सारी सख्ती दिखी परीक्षा केंद्र पहुंचे उन होनहार बच्चों पर जो किसी न किसी मजबूरी के चलते परीक्षा केंद्र  पहुंचने में चंद मिनिट लेट हो गए।


खामियों का खुल्लमखुल्ला प्रदर्शन नया नहीं है। मध्यप्रदेश का व्यापमं घोटाला इसका सबसे बड़ा इश्तेहार है। जरूरत यह थी कि व्यापम की विरासत लिए आई बीजेपी सरकार परीक्षाओं को तकनीकी रूप से मजबूत करने के लिए कोई कदम उठाती। लेकिन उसने छात्रों के अंगूठी, चूड़ी, ब्रेसलेट, हेयर बैंड, हेयर क्लिप, ईयरिंग, स्कार्फ, धूप का चश्मा, पर्स, यहां तक कि पानी की बोतल तक छीन ली। करोड़ों रुपए महीना वेतन ले रही नौकरशाहों की फौज और मजबूत तकनीकों के बावजूद अगर केंद्र और राज्य सरकारें अपनी चुनिंदा परीक्षाएं साफ-सुथरी नहीं कर सकतीं तो फिर हमें शिक्षा व्यवस्था की खूबसूरत बहसों पर फिर से सोचना चािहए। क्या यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि जब हर परीक्षा में गड़बड़ी सामने आ रही थी तो सरकार देश में सभी परीक्षाओं को ऑनलाइन करने का मिशन शुरू करती? डिग्रियों को जारी करने की प्रणाली को बायोमीट्रिक से जोड़ा जाता ताकि फर्जी डिग्रियों का तंत्र टूट सकता? मेडिकल, इंजीनियरिंग से लेकर प्रशासनिक और बैंकिंग तक सभी परीक्षाओं को ऑनलाइन कराना या सभी तरह की डिग्रियों को आधुनिक डिजिटल सिक्योरिटी से जोडऩा भूसे में सुई ढूंढने जैसा तो नहीं है।

 

सरकार ने नई शिक्षा नीति का जितना ढिंढोरा पीटा उससे कम प्रयास में परीक्षाएं साफ सुथरी हो सकती थीं। एक परीक्षा भी साफ-सुथरी नहीं हो पा रही है और इसके लिए बच्चों को कपड़े तक उतारने पड़ रहे हैं तो हमें विश्व गुरु बनने जैसी बहसों को विराम दे देना चाहिए। शिक्षा और रोजगार पर लंबे-लंबे भाषण ठेलने वाले पहले उन युवाओं के विषय में सोचें जो परीक्षा देने के बाद भी इस डर के साए में रहते हैं, कहीं यह रद्द न हो जाए या किसी अदालत में न अटक जाए। विवेकानंद



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