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Jamshedpur हैदराबाद मुक्ति संग्राम के विस्मृत नायक: अमर बलिदानी नन्हू सिंह और उनका ऐतिहासिक सत्याग्रह The forgotten hero of the Hyderabad Liberation War: Immortal Martyr Nanhu Singh and his historic Satyagraha

 


​Upgrade Jharkhand News. ​भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास केवल ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ी गई लड़ाइयों तक सीमित नहीं है। यह इतिहास उन अनगिनत संघर्षों से भी बुना गया है, जो देश के भीतर ही मौजूद दमनकारी और निरंकुश रियासतों के खिलाफ लड़े गए। ऐसा ही एक रक्तरंजित और गौरवशाली अध्याय है 'हैदराबाद मुक्ति संग्राम' और उसमें आयोजित 'हैदराबाद सत्याग्रह'। आज 29 मई को देश उस महान हुतात्मा नन्हू सिंह का बलिदान दिवस मना रहा है, जिन्होंने हैदराबाद के निजाम की मजहबी और क्रूर सत्ता के खिलाफ अपने प्राणों की आहुति दे दी। दुर्भाग्यवश, इतिहास के पन्नों में और स्वतंत्र भारत की सरकारों की प्राथमिकताओं में इन बलिदानियों को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। आज समय आ गया है कि हम नन्हू सिंह जैसे विस्मृत नायकों की शौर्यगाथा को मुख्यधारा के विमर्श में लेकर आएं।


​विभाजन की विभीषिका और रियासतों की कुटिल चालें -​15 अगस्त, 1947 को जब भारत ने गुलामी की जंजीरों को तोड़ा, तो वह आजादी अधूरी और खंडित थी। ब्रिटिश हुकूमत ने भारत को स्वतंत्र तो किया, लेकिन साथ ही 560 से अधिक देशी रियासतों को यह आत्मघाती स्वायत्तता भी दे दी कि वे अपनी इच्छानुसार भारत या पाकिस्तान में शामिल हो सकती हैं, या चाहें तो स्वतंत्र रह सकती हैं। यह भारत को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटने की एक गहरी साम्राज्यवादी साजिश थी।​कार्यवाहक प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन गृह मंत्री लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के सामने पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने की ऐतिहासिक चुनौती थी। सरदार पटेल के अटूट संकल्प और कूटनीति के कारण देश की अधिकांश रियासतें स्वेच्छा से भारत संघ में विलीन हो गईं। परंतु, कुछ रियासतों के मन में दुर्भावना थी। इनमें जूनागढ़ और भाग्यनगर (हैदराबाद) सबसे अधिक टेढ़ी-तिरछी चालें चल रही थीं। इन दोनों ही रियासतों के मुखिया मुस्लिम शासक थे, जबकि बहुसंख्यक आबादी हिंदू थी।


​हैदराबाद की त्रासदी: बहुसंख्यक आबादी और शत-प्रतिशत मुस्लिम पुलिस -​भाग्यनगर, जिसे आधुनिक इतिहास में हैदराबाद कहा गया, उस समय की सबसे बड़ी और समृद्ध रियासतों में से एक थी। यहाँ की लगभग 85 प्रतिशत आबादी हिंदू थी, लेकिन सत्ता की कमान मीर उस्मान अली खान (निजाम) के हाथों में थी। निजाम की प्रशासनिक और सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से सांप्रदायिक आधार पर केंद्रित थी। हैदराबाद की पुलिस और सेना में शत-प्रतिशत मुस्लिम अधिकारियों और जवानों की भर्ती की गई थी।व्यवस्था का परिणाम यह हुआ कि रियासत के भीतर बहुसंख्यक हिंदू आबादी का घोर उत्पीड़न होने लगा। हिंदुओं को धार्मिक स्वतंत्रता नहीं थी, उनकी सांस्कृतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध थे, और उनके नागरिक अधिकारों को कुचल दिया गया था। निजाम के संरक्षण में 'कासिम रिजवी' के नेतृत्व में 'रजाकारों' नामक एक कट्टरपंथी अर्धसैनिक संगठन का उदय हुआ, जिसका एकमात्र उद्देश्य हिंदुओं को आतंकित करना और हैदराबाद को एक पूर्ण मुस्लिम राष्ट्र या पाकिस्तान का हिस्सा बनाना था। रियासत के भीतर हिंदुओं की कहीं कोई सुनवाई नहीं थी। निजाम का स्पष्ट झुकाव पाकिस्तान की तरफ था और वह लगातार अपनी सेना को आधुनिक हथियारों से लैस कर भारत के सीने पर एक 'कैंसर' विकसित करने का प्रयास कर रहा था।


​जन-आंदोलन का उदय: हिंदू महासभा और आर्य समाज की भूमिका -​सरदार पटेल ने 1948 में 'ऑपरेशन पोलो' के तहत सैन्य और पुलिस कार्यवाही कर हैदराबाद को अंततः भारत में मिलाया; लेकिन इस सैन्य विजय से कई वर्ष पूर्व ही वहाँ की स्थानीय जनता ने दमन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था। निजाम के अत्याचारों के विरोध में स्थानीय हिंदू जनता ने 'हिन्दू महासभा' और 'आर्य समाज' के बैनर तले एक विशाल नागरिक अधिकार आंदोलन और सत्याग्रह शुरू किया।​इस सत्याग्रह की गूंज केवल हैदराबाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने पूरे भारतवर्ष के राष्ट्रवादियों को झकझोर कर रख दिया। देश के कोने-कोने से जत्थे के जत्थे हैदराबाद की ओर कूच करने लगे। यह केवल एक राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक अखंडता और मानवीय गरिमा को बचाने का धर्मयुद्ध बन चुका था। इस आंदोलन में हजारों लोगों ने लाठियां और गोलियां खाईं, और सैकड़ों राष्ट्रभक्तों को जेल की काल कोठरियों में ठूस दिया गया।


​गरीबी पर भारी पड़ा राष्ट्रप्रेम: नन्हू सिंह का आगमन -​इसी राष्ट्रव्यापी आह्वान से प्रभावित होकर अमरावती (महाराष्ट्र) से भी सत्याग्रहियों का एक जत्था हैदराबाद के लिए रवाना हुआ। इस जत्थे में बुंदेलखंड के मूल निवासी और धार्मिक प्रवृत्ति के श्री गणेश सिंह के सुपुत्र नन्हू सिंह भी शामिल थे। नन्हू सिंह की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी। वे अमरावती में हाड़-तोड़ मजदूरी करके किसी तरह अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।​आमतौर पर यह माना जाता है कि अभावों से घिरा व्यक्ति केवल दो जून की रोटी की चिंता में व्यस्त रहता है, परंतु नन्हू सिंह के भीतर राष्ट्र और धर्म की जो लौ जल रही थी, उसके आगे उनकी गरीबी कभी बाधा नहीं बनी। जब अमरावती के प्रतिष्ठित नेता नानासाहब भट्ट ने सत्याग्रह के लिए स्वयंसेवकों का आह्वान किया, तो 52 वर्षीय नन्हू सिंह अपनी आयु और कमजोर आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना इस दुर्गम पथ पर चल पड़े। वे जानते थे कि हैदराबाद जाने का अर्थ है - सीधा मौत के कुएं में कूदना, लेकिन भारत मां की अखंडता के लिए उन्होंने सर्वस्व दांव पर लगा दिया। हैदराबाद पहुंचकर उन्होंने पूरी निडरता के साथ सत्याग्रह किया, निजाम विरोधी नारे लगाए और अपनी गिरफ्तारी दी।​गिरफ्तारी के बाद नन्हू सिंह को हैदराबाद की कुख्यात 'चंचलगुडा जेल' में डाल दिया गया। जेल के भीतर बंद सत्याग्रहियों के साथ निजाम प्रशासन और वहां के मुस्लिम जेलर रक्षकों का व्यवहार किसी सभ्य समाज जैसा नहीं, बल्कि पशुओं से भी बदतर था। वैसे तो जेल नियमावली के तहत कैदियों के कुछ मानवाधिकार होते हैं, लेकिन हैदराबाद की जेलों में इन नियमों को निजाम के जूतों तले रौंद दिया जाता था।​सत्याग्रहियों को जानबूझकर सड़ा हुआ, गंदा और बेस्वाद भोजन अत्यंत कम मात्रा में दिया जाता था ताकि वे शारीरिक रूप से टूट जाएं। पीने के पानी के लिए तरसाया जाता था और छोटी-सी बात पर बेरहमी से लाठियों से पीटना वहां के जेलकर्मियों की रोजमर्रा की आदत बन चुकी थी। जेल के भीतर बंद इन देशभक्तों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा जाता था।


​26 मई की वह क्रूर घटना और नन्हू सिंह का बलिदान -​26 मई, 1939 की सुबह चंचलगुडा जेल के इतिहास में एक काले दिन के रूप में दर्ज है। 52 वर्षीय वयोवृद्ध सत्याग्रही नन्हू सिंह जेल के परिसर में स्नान कर रहे थे। तभी वहां ड्यूटी पर तैनात एक कट्टरपंथी मुस्लिम जेलरक्षक आया और उसने दुर्भावना वश नल बंद कर दिया। नन्हू सिंह ने जब इसका शांतिपूर्वक विरोध किया और पानी चालू रखने को कहा, तो उस जेलरक्षक का सांप्रदायिक अहंकार भड़क उठा। ​दोनों के बीच तीखी कहासुनी हो गई। निहत्थे और बुजुर्ग नन्हू सिंह के तर्कों का जवाब देने के बजाय, उस क्रूर जेलरक्षक ने अपनी भारी लाठी से उनके सिर पर सीधा प्रहार कर दिया। लाठी का वार इतना भयानक था कि नन्हू सिंह का सिर फट गया और खून का फव्वारा फूट पड़ा। वे वहीं अचेत होकर गिर पड़े। उन्हें आनन-फानन में जेल के अस्पताल भेजा गया, लेकिन वहां भी निजाम के डॉक्टरों ने इलाज के नाम पर केवल खानापूर्ति की। उचित चिकित्सा और दवाओं के अभाव में तीन दिनों तक असहनीय पीड़ा झेलने के बाद, आखिरकार 29 मई 1939 को इस महान देशभक्त के प्राण पखेरू उड़ गए।


​शव के साथ बर्बरता और सत्य को छुपाने का कुत्सित प्रयास -​जेल प्रशासन नन्हू सिंह की शहादत से डर गया था। उन्हें भय था कि यदि यह समाचार जेल से बाहर गया, तो पूरे देश में निजाम के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला भड़क उठेगी। अपनी क्रूरता को छुपाने के लिए जेल अधिकारियों ने अमानवीयता की सारी हदें पार कर दीं। उन्होंने नन्हू सिंह के पवित्र शव को एक फटे-पुराने कपड़े और टाट (जूट की बोरी) में लपेटकर जेल के एक अंधेरे और लावारिस कोने में फेंक दिया, ताकि किसी को उनकी मृत्यु की भनक न लगे। इसके बाद, रात के अंधेरे में चुपचाप आधे-अ अधूरे ढंग से उनके शव को फूंकने (जलाने) का प्रयास किया गया।​बाहर, जब नन्हू सिंह के गायब होने की खबरें उड़ीं, तो 'सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा' ने निजाम सरकार को कई चेतावनी भरे तार (टेलीग्राम) भेजे, परंतु अहंकारी निजाम की ओर से कोई उत्तर नहीं आया। इसके बाद सत्याग्रह समिति के वरिष्ठ सदस्य श्री हरिश्चन्द्र विद्यार्थी ने व्यक्तिगत जोखिम उठाकर जेल अधिकारियों से मुलाकात की। अधिकारियों ने झूठ का पुलिंदा बांधते हुए दावा किया कि नन्हू सिंह की मृत्यु 'निमोनिया' के कारण हुई है।​परंतु सत्य को अधिक समय तक छुपाया नहीं जा सकता था। भारी दबाव और कड़े प्रयत्नों के बाद जब सत्याग्रह समिति के लोग उस स्थान पर पहुंचे जहां शव को नष्ट करने का प्रयास किया गया था, तो वहां का दृश्य देखकर सबकी रूह कांप गई। नन्हू सिंह का आधा जला हुआ शव वहां पड़ा था। क्रूरता की पराकाष्ठा यह थी कि उनका धड़ और खोपड़ी के टुकड़े अलग-अलग बिखरे हुए थे।


​बलिदान रंग लाया: इतिहास का न्याय और हमारी कृतघ्नता -​नन्हू सिंह और उनके जैसे सैकड़ों हुतात्माओं का यह सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके खून से सींची गई क्रांति की भूमि ने निजाम के साम्राज्य की चूलें हिला दीं। आखिरकार, देश के गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के कड़े रुख के कारण 17 सितंबर, 1948 को हैदराबाद का पूर्ण रूप से भारत संघ में विलय हो गया और भाग्यनगर की जनता को मजहबी दमन से मुक्ति मिली।​परंतु, इस गौरवशाली इतिहास का सबसे दुखद पहलू स्वतंत्रता के बाद सामने आया। यह हमारे देश का दुर्भाग्य रहा है कि आजादी के बाद के राजनीतिक परिदृश्य में केवल एक विशेष विचारधारा या दो-चार दिन के लिए जेल जाने वाले रसूखदार लोगों को ही स्वतंत्रता सेनानी मानकर ताम्रपत्र, पेंशन और अनेक सरकारी सुविधाएं दी गईं। वहीं दूसरी ओर, हैदराबाद मुक्ति संग्राम के इन वास्तविक सत्याग्रहियों, जिन्होंने अपनी चमड़ी उधड़वा ली, जिनके सिर सरेआम फोड़ दिए गए और जिन्हें कफन तक नसीब नहीं हुआ, उन्हें स्वतंत्र भारत के इतिहास की पुस्तकों से गायब कर दिया गया। शासन-प्रशासन ने उन्हें याद करना तो दूर, उनके परिवारों की सुध लेना भी ग्वारा नहीं किया।


​निष्कर्ष: आज समय की पुकार -​नन्हू सिंह जी का जीवन और उनका बलिदान हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र की रक्षा के लिए धन, साधन या उच्च सामाजिक पृष्ठभूमि की आवश्यकता नहीं होती; इसके लिए केवल एक फौलादी जिगर और राष्ट्र के प्रति अगाध निष्ठा की आवश्यकता होती है। अमरावती का वह गरीब मजदूर, जो बुंदेलखंड की माटी का लाल था, आज हमारे लिए राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा प्रतीक है। ​आज 29 मई को, उनके बलिदान दिवस पर, कृतज्ञ राष्ट्र इस महान वीरात्मा के चरणों में शत-शत नमन करता है। यह लेख केवल एक श्रद्धांजलि नहीं है, बल्कि वर्तमान पीढ़ी के लिए एक आह्वान है कि वे अपने विस्मृत नायकों के इतिहास को पहचानें, क्योंकि जो कौम अपने शहीदों के बलिदान को भूल जाती है, उसका भूगोल और इतिहास दोनों संकट में पड़ जाते हैं। अमर बलिदानी नन्हू सिंह अमर रहें!



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