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Bhopal बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने की आवश्यकता The need to talk openly about children's mental health

 


Upgrade Jharkhand News.  आज जब समाज तीव्र सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी बदलावों के दौर से गुजर रहा है, तब बच्चों और किशोरों के सामने चुनौतियों का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। शिक्षा का बढ़ता दबाव, पारिवारिक तनाव, घरेलू हिंसा, यौन शोषण, साइबर बुलिंग, सोशल मीडिया का प्रभाव, प्राकृतिक आपदाएँ और सामाजिक असुरक्षा जैसी परिस्थितियाँ बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन परिस्थितियों की पहचान कर उचित मनोसामाजिक सहयोग नहीं दिया गया, तो ये अनुभव बच्चों के व्यक्तित्व और भविष्य पर स्थायी प्रभाव छोड़ सकते हैं। इन्हीं गंभीर चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए मुजफ्फरपुर के मिठनपुरा में प्रोत्साहन इंडिया फाउंडेशन और अमर त्रिशला सेवा आश्रम के संयुक्त तत्वावधान में महिलाओं, किशोरों एवं बच्चों के अधिकारों, सुरक्षा, संरक्षण तथा समग्र कल्याण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक दिवसीय प्रशिक्षण एवं ज्ञान-साझाकरण कार्यशाला आयोजित की गई। इस कार्यशाला में बिहार के 13 जिलों से बाल संरक्षण इकाइयों, स्वयंसेवी संगठनों, वन स्टॉप सेंटर, बालगृहों तथा विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।


यह कार्यक्रम केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं था, बल्कि बिहार में बाल संरक्षण व्यवस्था को अधिक प्रभावी, संवेदनशील और उत्तरदायी बनाने की दिशा में एक गंभीर प्रयास था। कार्यशाला विशेष रूप से फ्रंटलाइन वर्करों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, परामर्शदाताओं, बाल संरक्षण अधिकारियों तथा विकास क्षेत्र में कार्यरत लोगों को ट्रॉमा (मानसिक आघात) और मनोसामाजिक देखभाल से संबंधित व्यावहारिक ज्ञान एवं कौशल प्रदान करने के उद्देश्य से तैयार की गई थी। विशेषज्ञों ने बताया कि किसी भी बच्चे के जीवन में हिंसा, उपेक्षा, शोषण, घरेलू कलह, प्राकृतिक आपदा, विस्थापन या किसी प्रियजन की मृत्यु जैसी घटनाएँ गहरे मानसिक आघात का कारण बन सकती हैं। कई बार बच्चे अपने व्यवहार से संकेत देते हैं, लेकिन परिवार और समाज उन्हें सामान्य बदलाव समझकर अनदेखा कर देता है। परिणामस्वरूप बच्चों में अवसाद, भय, आत्मविश्वास की कमी, पढ़ाई से दूरी, आक्रामकता अथवा आत्मघाती प्रवृत्तियाँ विकसित हो सकती हैं। कार्यशाला में प्रतिभागियों को ट्रॉमा की पहचान, उससे प्रभावित बच्चों से संवाद स्थापित करने की प्रक्रिया, सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने तथा पुनर्वास के विभिन्न तरीकों की जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने कहा कि किसी भी आघातग्रस्त बच्चे को सबसे पहले विश्वास, सुरक्षा और सहानुभूति की आवश्यकता होती है।


कार्यशाला के दौरान इस बात पर विशेष बल दिया गया कि बाल संरक्षण केवल कानूनी प्रावधानों तक सीमित नहीं है। इसके लिए संवेदनशील दृष्टिकोण, मनोवैज्ञानिक समझ और मानवीय व्यवहार भी उतना ही आवश्यक है। बच्चों की समस्याओं का समाधान केवल प्रशासनिक कार्रवाई से संभव नहीं है, बल्कि परिवार, विद्यालय, समुदाय और सामाजिक संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है। विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को बाल-अनुकूल वातावरण विकसित करने, प्रभावी परामर्श देने और संकटग्रस्त बच्चों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने के व्यावहारिक तरीके बताए। साथ ही विभिन्न केस स्टडी और अनुभवों के माध्यम से यह समझाया गया कि प्रत्येक बच्चा अलग परिस्थितियों से गुजरता है और उसकी सहायता का तरीका भी उसी के अनुरूप होना चाहिए।            प्रोत्साहन इंडिया फाउंडेशन की संस्थापिका सोनम कपूर ने कहा कि संस्था का मुख्य उद्देश्य बच्चों को मानसिक अवसाद और भावनात्मक आघात से बचाना है। यदि किसी कारण से बच्चा ऐसी स्थिति में पहुँच भी जाए, तो उसकी देखभाल कैसे की जाए तथा उसके माता-पिता और परिवार को किस प्रकार जागरूक किया जाए, यही इस प्रशिक्षण का प्रमुख उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि आज मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने की आवश्यकता है। बच्चों की भावनाओं को समझना और उन्हें अभिव्यक्ति का अवसर देना उनके स्वस्थ विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि समय पर उचित सहयोग मिले तो अधिकांश बच्चे सामान्य जीवन में लौट सकते हैं।


कार्यशाला ने विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक साझा मंच उपलब्ध कराया। प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए और बाल संरक्षण से जुड़े व्यावहारिक समाधान पर चर्चा की। इस संवाद ने यह स्पष्ट किया कि बच्चों की सुरक्षा किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। विशेषज्ञों ने कहा कि यदि सरकारी विभाग, स्वयंसेवी संस्थाएँ, विद्यालय, स्वास्थ्य सेवाएँ और समुदाय मिलकर कार्य करें तो बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित और सहयोगात्मक वातावरण तैयार किया जा सकता है। कार्यक्रम के आयोजकों का मानना है कि विकसित भारत की परिकल्पना तभी साकार होगी, जब देश के बच्चे सुरक्षित, स्वस्थ और आत्मविश्वासी होंगे। इसके लिए बाल संरक्षण तंत्र को केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि प्रशिक्षित और संवेदनशील मानव संसाधन से भी सशक्त करना होगा। इस प्रकार के क्षमता-विकास कार्यक्रम दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।      कार्यशाला में इस बात पर भी बल दिया गया कि बिहार में बच्चों और किशोरों के संरक्षण, देखभाल और सशक्तिकरण के लिए एक उत्तरदायी और प्रशिक्षित कार्यबल तैयार करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।


कार्यक्रम में रणजीत कुमार (सचिव, अमर त्रिशला सेवा आश्रम), अवन्तिका जैन, सरला श्रीवास्तव सामाजिक-सांस्कृतिक शोध संस्थान के प्रतिनिधि, प्रसिद्ध कठपुतली कलाकार सुनील कुमार सरला, श्रीवास परफेक्ट सोल्यूशन सोसाइटी के सचिव अनिल कुमार ठाकुर, सोनू सरकार, संतावणा भारती, ज्योतिका भारद्वाज, माधुरी कुमारी, दीनबंधु महाजन तथा सुधीर कुमार सहित अनेक विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।          यह कार्यशाला केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि बच्चों के अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समाज को अधिक संवेदनशील बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल थी। आज आवश्यकता इस बात की है कि बाल संरक्षण को केवल प्रशासनिक विषय न मानकर सामाजिक आंदोलन का रूप दिया जाए। जब परिवार, विद्यालय, समाज और सरकार मिलकर बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देंगे, तभी एक ऐसा समाज निर्मित होगा जहाँ हर बच्चा भयमुक्त, सम्मानजनक और आत्मविश्वास से भरा जीवन जी सके। यही किसी भी विकसित और मानवीय समाज की सबसे बड़ी पहचान है। कुमार कृष्णन



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