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Bhopal राम मंदिर की मर्यादा को आघात पहुंचाती दुष्प्रचार की राजनीति The politics of propaganda that undermines the dignity of the Ram Temple

 


Upgrade Jharkhand News.   आजकल अयोध्या के श्री राम मंदिर में उद्घाटित चढ़ावा चोरी का प्रकरण चर्चाओं में है। कहना अतिश्योक्ति नहीं  कि पारंपरिक मंदिर विरोधियों के लिए यह दुष्प्रचार का सर्वाधिक सुविधाजनक अस्त्र बन गया है। श्री राम, राम मंदिर, सनातन और सबसे बड़ी बात भारत अर्थात भारतीयता को खंडित करने के कुत्सित प्रयास एक बार फिर चरम पर हैं। इनसे बचने के साथ-साथ श्री राम मंदिर पर हुए हमले और फिर उसे मुक्ति दिलाने हेतु करोड़ों करोड़ राम भक्त बलिदानियों, खुशी खुशी प्राण उत्सर्ग करने वाले दिवंगत कार सेवकों तथा भव्य राम मंदिर निर्माण हेतु जीवन दान देने वाले सेवकों के संघर्ष पर गौर करने की जरूरत है। क्योंकि ​इतिहासिक साक्ष्य हैं कि जो राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक चेतना को विस्मृत कर देता है और अपने गौरवशाली अतीत के प्रतीकों की रक्षा नहीं कर पाता, उसका अस्तित्व अंततः संकट में पड़ जाता है। अयोध्या में प्रभु श्री राम की पावन जन्मभूमि पर निर्मित भव्य और दिव्य मंदिर केवल पत्थरों, स्तंभों या नक्काशी का कोई सामान्य भौतिक ढांचा नहीं है। यह भारत की चिरंतन आत्मा, उसकी सांस्कृतिक अस्मिता, सदियों के धैर्य और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का साक्षात, जीवंत प्रतीक है। 


सन् 1528 में विदेशी मुगल आक्रांता मीर बाकी द्वारा सनातन आस्था के इस परम केंद्र को जिस क्रूरता के साथ ध्वस्त किया गया था, वह भारत के मर्म पर एक गहरा घाव था। उस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने और अपनी आस्था की पुनर्स्थापना के लिए सनातन समाज ने 500 वर्षों का एक अभूतपूर्व, अनवरत और धैर्यपूर्ण संघर्ष लड़ा है, जो विश्व के इतिहास में सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का सबसे लंबा आंदोलन है। ​​16वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी के मध्य तक, इस पवित्र भूमि की मुक्ति और प्रभु श्री राम के मंदिर की पुनर्स्थापना के लिए छोटे-बड़े 76 युद्ध लड़े गए। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले इस महायज्ञ में लाखों राम भक्तों ने बिना किसी संकोच के अपने प्राणों की आहुति दे दी। आज़ाद भारत के इतिहास में भी जब इस आंदोलन ने एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप लिया, तब भी राम भक्तों के मार्ग में कांटे ही बिछाए गए। तत्कालीन सत्ताधीशों, छद्म-धर्मनिरपेक्ष ताकतों और व्यवस्था की क्रूरता का वह खूनी मंजर देश कभी नहीं भूल सकता, जब अयोध्या की सड़कों पर निहत्थे और शांतिपूर्ण कारसेवकों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई गईं। उस दमन चक्र के कारण बार-बार राम भक्तों के खून से सरयू का पवित्र जल लाल होता रहा। ​इस अंतहीन और कष्टकारी संघर्ष को वैचारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और संगठनात्मक नेतृत्व प्रदान करने का महती कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  और विश्व हिंदू परिषद जैसे राष्ट्रवादी संगठनों ने किया।


आंदोलन की धार को कुंद करने और राष्ट्रवादियों का मनोबल तोड़ने के लिए तत्कालीन राम-विरोधी सरकारों ने दमन की पराकाष्ठा पार करते हुए चार राज्यों की चुनी हुई भाजपा सरकारों को असंवैधानिक रूप से बर्खास्त कर दिया। परंतु, राष्ट्रवाद के पथ पर चलने वाले कार्यकर्ताओं और नेताओं ने प्रभु श्री राम के चरणों में अपनी सत्ताओं और सरकारों का बलिदान सहर्ष स्वीकार कर लिया। तुष्टिकरण की संकीर्ण राजनीति के तहत बहुसंख्यक सनातन समाज को लगातार टारगेट पर रखा गया, राम भक्तों पर 'सांप्रदायिक' और 'आतंकवादी' होने के झूठे इल्जाम लगाए गए, और धर्मनिरपेक्षता की आड़़ में सनातन समाज को विखंडित करने की गहरी साजिशें रची गईं। इस दमन और षड्यंत्र का सबसे शर्मनाक अध्याय तब लिखा गया, जब देश की सर्वोच्च वैधानिक संस्थाओं में तत्कालीन सरकारों द्वारा भगवान श्री राम के अस्तित्व को ही 'काल्पनिक' और 'कल्पित' बताने का दुस्साहस किया गया। ​यह आंदोलन तब और अधिक पीड़ादायक तथा चुनौतीपूर्ण हो गया, जब राम मंदिर के घोर विरोधी धर्मनिरपेक्ष नेताओं, वामपंथी इतिहासकारों और राजनीतिक दलों ने राम जन्मभूमि मुक्ति की इस न्यायपूर्ण लड़ाई में लगातार वैधानिक व्यवधान पैदा किए। अदालतों में तारीखें बढ़वाने से लेकर जनमानस को भ्रमित करने तक, हर संभव प्रयास किया गया ताकि यह भव्य मंदिर निर्माण का संकल्प कभी हकीकत न बन सके। हिंदू विरोधी संगठन और नेता इस पवित्र आंदोलन के विरोध में ही लगातार मोर्चा संभाले रहे, जिससे यह संघर्ष दिनों-दिन और अधिक कठिन होता गया।


​परंतु सनातन धर्म का मूल मंत्र है 'सत्यमेव जयते'। तमाम कानूनी अड़चनों, कुतर्कों, राजनैतिक अवरोधों और दुष्प्रचार के पहाड़़ को ढहाते हुए अंततः सत्य की पूर्ण विजय हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूजनीय सरसंघचालक श्री मोहन भागवत और देश के यशस्वी, लोकप्रिय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के गरिमामय मार्गदर्शन में जब मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ होकर पूर्ण हुआ, तो यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में सोमनाथ मंदिर के बाद सांस्कृतिक गौरव का दूसरा सबसे महान ऐतिहासिक क्षण बन गया। बाद में भारत की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा इस पावन धाम में आकर माथा टेकने और प्रभु के दर्शन करने की घटना ने यह पूरी तरह सिद्ध कर दिया कि अब भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों पर गर्व करने से रत्ती भर भी हिचकिचाने वाला नहीं है।  ​बदलते और निरंतर एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरते जा रहे भारत की यह तस्वीर एकदम नई और अभूतपूर्व थी। अभी तक देश ने देखा था कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता मंदिरों से तो सर्वथा दूरी बनाकर ही रखते थे और केवल मस्जिदों, दरगाहों तथा इफ्तार पार्टियों में शिरकत करने को ही धर्मनिरपेक्षता का एकमात्र पैमाना मानते थे। इस नए परिदृश्य से मंदिर विरोधियों और तुष्टिकरण के वैज्ञानिकों में घोर हताशा फैल गई। क्योंकि संपूर्ण देश में एक अभूतपूर्व सकारात्मक वातावरण का निर्माण हो चुका था। यह विशुद्ध भारतीयता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का भाव आज डेढ़़ अरब जनता के अटूट आत्मविश्वास का प्रतीक बन चुका है। वैश्विक स्तर पर भी भव्य राम मंदिर का यह प्रादुर्भाव भारत की सनातन एकता और एक मजबूत, संप्रभु देश की अंतरराष्ट्रीय पहचान बनकर उभरा है। इस सांस्कृतिक लहर के सामने मंदिर विरोधी पूरी तरह अप्रासंगिक होकर खिसिया कर रह गए।


​जब राम मंदिर निर्माण की शुचिता, उसकी भव्यता और उसकी उत्कृष्ट इंजीनियरिंग ने विरोधियों के सारे झूठे दावों को ध्वस्त कर दिया और उनके मुंह पर एक जोरदार तमाचा जड़ा, तो इन पराजित और हताश तत्वों को एक नए मौके की तलाश थी। तभी से घात लगा कर बैठे राक्षस प्रवृत्ति के लोगों को एक ऐसे अवसर का इंतजार था, जिसकी आड़़ लेकर वे पुनः श्री राम मंदिर और राम भक्तों के माथे पर कलंक लगा सकें। जैसी कि आशंका व्यक्त की जा रही है, अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से मंदिर की चढ़ावा गणना व्यवस्था और प्रशासनिक प्रबंधन में इन मंदिर विरोधियों के कुछ छद्म तत्वों को घुसपैठ करने में सफलता प्राप्त हो गई। संभवत इन्हीं राम विरोधी तत्वों की करतूतों के चलते राम भक्तों को चोर कहने का एक अवसर उन लोगों को मिल गया, जो कल तक श्री राम को काल्पनिक कहते थे। ​आज इसी प्रशासनिक या मानवीय चूक को आधार बनाकर राम मंदिर के पारंपरिक विरोधी देश भर में 'चढ़ावा चोरी' का एक कृत्रिम बवंडर खड़ा करने के जी-तोड़ प्रयासों में जुट गए हैं। लेकिन इस तथाकथित प्रकटीकरण और दुष्प्रचार के पीछे छिपे चेहरों को देखकर कुछ अत्यंत गंभीर, तार्किक और विचारोत्तेजक प्रश्न खड़े होते हैं, जिनका उत्तर आज हर सनातनी को खोजना होगा।


सवाल : यदि आग मंदिर में तो धुआं राम विरोधियों के गढ़ में कैसे ?

इस कथित चढ़ावा चोरी के दुष्प्रचार को हवा देने में उस राजनैतिक दल और उसके नेताओं की सक्रिय भागीदारी कैसे संभव हुई, जिन पर राम जन्मभूमि का पुरजोर विरोध करने और निहत्थे राम भक्तों पर गोलियां चलवाने का दाग जगजाहिर और इतिहास में दर्ज है? ​अतीत में हिंदुओं को बदनाम करने के लिए 'भगवा     आतंकवाद' का झूठा और खतरनाक शिगूफा छोड़ने वाले राजनैतिक तत्व आज अचानक इतने बड़े 'राम प्रेमी' कैसे हो गए कि उन्हें मंदिर की व्यवस्था की चिंता सताने लगी। ये महाकाल लोक से अयोध्या जी तक पदयात्रा के माध्यम से मंदिर विरोधी बवंडर को अधिकतम विकराल स्वरूप देने के लिए सक्रिय हो गए हैं।  ​सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा देकर प्रभु श्री राम के अस्तित्व को पूरी तरह काल्पनिक बताने वाली कांग्रेस और उसके सहयोगी दल आज अचानक राम भक्तों की भावनाओं की कद्रदान होने का ढोंग कैसे कर सकते हैं?


​इन प्रश्नों का उत्तर स्पष्ट है, यह कोई मंदिर की चिंता नहीं, बल्कि सनातन समाज में पुनः विखंडन और बिखराव पैदा करने की एक बहुत बड़ी और गहरी राजनीतिक साजिश है। वे इस विसंगति को तूल देकर उस आंदोलन, उन संगठनों और उन करोड़ों भक्तों की निष्ठा पर कीचड़़ उछालना चाहते हैं, जिन्होंने अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर पहले श्री राम जन्मभूमि को विधर्मियों से मुक्त कराया और अब वहां पर भव्य श्री राम मंदिर का मूर्त रूप देखकर उत्साहित हो रहे हैं। ​राम भक्तों की आस्था सर्वथा असंदिग्ध, अटूट और परम पवित्र है। राम मंदिर निर्माण, जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन में अपना पूरा जीवन, करियर और परिवार दांव पर लगाने वाले निस्वार्थ सेवक और संगठन कभी भी भ्रष्ट नहीं हो सकते। यह पूरी तरह सत्य है कि व्यवस्थागत सावधानी में कहीं न कहीं चूक अवश्य हुई है, जिसका अनुचित लाभ उठाकर मंदिर एवं सनातन विरोधियों ने वैश्विक स्तर पर लगातार आगे बढ़ रहे राष्ट्र के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। परंतु, हमें विचलित होने के स्थान पर भारतीय न्याय व्यवस्था और राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की शुचिता व पारदर्शिता पर पूर्ण भरोसा रखने की आवश्यकता है। ​यह समय अत्यधिक सजग, सतर्क और संगठित रहने का है। हिंदू समाज को विखंडित करने, जातियों में बांटने और सनातन विरोधी एजेंडे को हवा देने के इन कुत्सित और नापाक मंसूबों को हमें एकजुट होकर विफल करना होगा। जब तक आंतरिक जांच और न्याय व्यवस्था दूध का दूध और पानी का पानी न कर दे, तब तक हमें इन सनातन-विरोधियों के हर दुष्प्रचार का पुरजोर विरोध करना होगा और राष्ट्र की इस अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर की पवित्रता व मर्यादा को अक्षुण्ण रखना होगा। जय श्री राम। जय भारत। डॉ. राघवेंद्र शर्मा



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