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Bhopal मध्यम वर्ग का मौन सियासत का स्वर्णकाल The silent middle class is the golden age of politics.

 


Upgrade Jharkhand News. फ्रांसीसी दार्शनिक जीन जैक्स रूसो का मानना था कि अमीर सत्ता को खरीद लेते हैं और गरीब की जरूरतें उसे सत्ता के हाथों बिकने के लिए मजबूर कर देती हैं। मौजूदा आंकड़ों में इसकी सच्चाई स्पष्ट दिख रही है। एडीआर यानि एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2026 तक केंद्र सरकार किसान सम्मान निधि के जरिए किसानों को 4.27 लाख करोड़ रुपए बांट चुकी है। मार्च में जारी 22वीं किस्त में 18,640 करोड़ रुपए से अधिक जारी किए गए। यह राशि 9.32 करोड़ से ज्यादा किसानों को मिली, इनमें करीब 2.15 करोड़ महिला किसान शामिल हैं। राज्यों में महिलाओं को अलग से पैसे दिए जाते हैं। इसकी शुरुआत मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना योजना से शुरू हुई थी। इस योजना की राजनीतिक सफलता के बाद हर राज्य सरकार ने महिलाओं के लिए खजाने खोल दिए। इस समय मध्यप्रदेश और महाराष्ट में 1500 रुपए, दिल्ली-झारखंड में 2,500 रुपए , पश्चिम बंगाल में 3,000 रुपए, कर्नाटक में 2,000 रुपए मिलते हैं। बिहार चुनाव से पहले मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं को 10,000 रुपए दिए गए। असम विधानसभा चुनाव पहले, ओरुनोदोई नामक योजना के तहत महिलाओं को 9,000 रुपए दिए गए।


प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत देश के लगभग 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन मिलता रहा। अब बचता है मिडिल क्लास। कंपनियां अपने खर्च और सरकार को देने वाले टैक्स की वसूली इसी से करती हैं। सरकार जो मुफ्त स्कीमें चलाती है, टैक्स के जरिए उसका पैसा भी इसी वर्ग से वसूल होता है। इसके पास न तो सत्ता को खरीदने की हैसियत है और न ये खुद को बेचने के लिए तैयार है। टैक्स के जरिए हो रही वसूलियों को चुकाने और परिवार की जरूरतों में उलझे इस वर्ग को कुछ पाने की उम्मीद भी है, खो जाने का भय भी है। उम्मीद और भय के युग्म ने सत्ता के सामने उन कंधों को झुका दिया जिन पर असल में भारतीय अर्थव्यवस्था का सारा बोझ है। सरकार और कंपनियां मिलकर इसे निचोड़ती हैं। आंकड़े इसके गवाह हैं। चालू वित्त वर्ष 2026-27 में 13 जुलाई 2026 तक सरकार को कॉरपोरेट टैक्स (कंपनियों के मुनाफे पर लगने वाला कर) से 2.40 लाख करोड़ रुपए का शुद्ध राजस्व मिला है जबकि इसी अवधि में इनकम टैक्स से कुल 6.51 लाख करोड़ रुपए (6,51,189.81 करोड़ रुपए) का राजस्व प्राप्त हुआ। पर्सनल टैक्सपेयर, हिंदू अविभाजित परिवार और फर्म सहित गैर कॉरपोरेट टैक्सपेयर ने 3.84 लाख करोड़ रुपए भरा है। सरकार खुद मानती है कि देश की अर्थव्यवस्था का असली तारणहार यही वर्ग है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले दिनों कहा है कि अगले 10 साल में भारत के मिडिल क्लास और उच्च-मध्यम वर्ग का देश के कुल उपभोक्ता खर्च में 93% हिस्सा होगा, यानी अगले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा ताकत इसी वर्ग की बढ़ती खरीदारी और खर्च से मिलेगी।


गरीब और अमीर के बीच सरकार के लिए कोल्हू का बैल बना यह वर्ग जितना बेचैन है उतना ही आत्ममुग्ध, स्वाभिमानी और कहीं-कहीं अहंकारी भी है। सियासत इस वर्ग को समय-समय पर श्रेष्ठता बोध का नशा कराती रहती है। जरूरतें भले ही चैन से न जीने दें लेकिन श्रेष्ठता बोध दिखावा करने के लिए प्रेरित करता है। खुद को देश का पालनहार समझने की आत्ममुग्धता और श्रेष्ठताबोध के कारण यह 100 रुपए प्रति लीटर से अधिक महंगा एथनॉल मिला पेट्रोल खुशी खुशी खरीद रहा है। कई जगह यह साबित हो चुका है कि एथेनॉल से पुरानी गाड़ियां खराब हो रही हैं, लेकिन सरकार सीना ठोकर कह रही है, वह जो कर रही है, सही है। पेपर लीक और नौकरी की दर्जनों परीक्षाओं के लटकने से दर्जनों बच्चों की मौत हुई लेकिन अपने ही अधिकारों की मांग करने वालों से इस वर्ग ने सुनिश्चित दूरी बनाई हुई है। यह वर्ग कहीं गंदे पानी से मरता है, कहीं नकली दवाईयों से मरता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी के लिए भारी टैक्स भरता है और सारी सुविधाएं निजी क्षेत्र से लेता है। निजी क्षेत्र के हाथों में गई व्यवस्थाएं अतिरिक्त जेब भी काटती हैं। यानि जिसका टैक्स देता है उसको निजी हाथों से खरीदता है। अब तो हगने-मूतने का भी पैसा लगता है। इस सुविधा का भी निजीकरण हो चुका है। महंगाई, महंगी शिक्षा और इलाज के भारी खर्च, लगातार बढ़ते टैक्स और घटती बचत ने आमदनी और खर्च का संतुलन बिगाड़ दिया है। इसके बावजूद श्रेष्ठताबोध का दिखावा इस वर्ग को तेजी से कर्ज के दलदल में खींच रहा है।


एक आकलन के मुताबिक हर आम भारतीय नागरिक पर औसतन 4,80,000 का कर्ज है। कर्जदारों की आय का लगभग 40% हिस्सा केवल लोन की किस्त चुकाने में खर्च हो रहा है। इसमें से 55% से ज्यादा कर्ज घर बनाने के लिए नहीं, बल्कि रोजमर्रा के खर्चों और लाइफस्टाइल के लिए लिया गया है। देश में उद्योगों की समृद्धि भी जरूरी है और गरीबों की मदद भी लेकिन इसके लिए आम आदमी को कितना निचोड़ना चाहिए, सरकार को इसका भी पैमाना तय करना होगा। हर मोड़ पर इसी वर्ग का दोहन बड़ा जोखिम पैदा कर सकता है।  विवेकानंद



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