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Bhopal श्रीजगन्नाथपुरी धाम और विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा Sri Jagannathpuri Dham and the world famous Rath Yatra

 


Upgrade Jharkhand News.  भारत की पूर्व दिशा में, ओडिशा के समुद्र तट पर स्थित श्री श्री जगन्नाथपुरी धाम का महात्म्य अद्वितीय है। वर्तमान भव्य जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में, सन् 1147 से 1178 ई. के मध्य, पूर्वी गंग वंश के शासकों द्वारा कराया गया था। मान्यता है कि गंगवंश के राजा स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण का वंशज मानते थे। लाल बलुआ पत्थर से बना यह मंदिर कलिंग स्थापत्य कला, वास्तुशिल्प और मूर्तिकला का बेजोड़ नमूना है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया की रथयात्रा और सातवें दिन मौसीबाड़ी से वापसी की बहुड़ा यात्रा विश्वभर में प्रसिद्ध है। 


नीलमाधव से जगन्नाथ तक -  सतयुग की कथा है कि अवंतिका नगरी के सूर्यवंशी राजा इंद्रद्युम्न परम विष्णुभक्त थे। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि वे अपने राज्य में भगवान विष्णु का एक विशाल और दिव्य मंदिर बनवाएं। उन्हें ज्ञात हुआ कि नीलगिरि वन के नीलांचल पर्वत पर स्थानीय शबर जनजाति भगवान विष्णु के नीलमाधव नामक नीलवर्णी पाषाण विग्रह की पूजा करती है। कहा जाता है कि नीलमाधव के दर्शन मात्र से रोग, शोक और दरिद्रता दूर हो जाती थी। राजा ने अपने कई मंत्रियों को विग्रह का पता लगाने भेजा, परंतु सभी असफल लौटे। अंत में ब्राह्मण विद्वान विद्यापति को यह कार्य सौंपा गया। विद्यापति नीलगिरि के घने जंगल में पहुंचे। वहां उनकी भेंट शबर राजा विश्ववसु की पुत्री ललिता से हुई। विद्यापति ने ललिता से विवाह किया और इस प्रकार विश्ववसु का विश्वास अर्जित किया। धीरे-धीरे उन्होंने नीलमाधव के गुप्त स्थान का रहस्य जान लिया और राजा इंद्रद्युम्न को सूचित किया। जब राजा सेना सहित नीलांचल पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि नीलमाधव का विग्रह वहां से अंतर्धान हो चुका है। तब आकाश से देववाणी हुई- "हे राजन, नीलमाधव अब तुम्हें इस रूप में प्राप्त नहीं होंगे। समुद्र तट पर, जहां बांकी नदी सागर से मिलती है, वहां एक दिव्य दारु-काष्ठ, अर्थात लकड़ी का लट्ठा तैरता हुआ आएगा। उसी से विग्रह का निर्माण कर मंदिर में स्थापित करो।"


राजा को वह दारु-काष्ठ प्राप्त हो गया, परंतु उनके मन में बसा स्वरूप गढ़ने वाला कोई शिल्पी नहीं मिला। तब स्वयं विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई के वेश में आए और कहा, "मैं 21 दिन में विग्रह बना दूंगा। शर्त यह है कि निर्माण कक्ष को कोई न खोले और कोई प्रश्न न पूछे।" 15 वें दिन रानी गुंडिचा की जिज्ञासा प्रबल हो उठी। वे चुपके से कक्ष में झांकने गईं। उसी क्षण ठक-ठक की ध्वनि बंद हो गई और विश्वकर्मा अंतर्धान हो गए। भीतर तीन अपूर्ण विग्रह थे, जिनके हाथ-पैर नहीं बने थे। एक गौर वर्ण, एक श्याम वर्ण और एक देवी स्वरूप। राजा शोक में डूब गए। पुनः आकाशवाणी हुई-"इन अपूर्ण विग्रहों को ही मेरी इच्छा मानो। इन्हें बलभद्र, जगन्नाथ और सुभद्रा के रूप में स्थापित करो। प्रत्येक 12 वर्ष बाद नवकलेवर की परंपरा के अनुसार नए दारु-काष्ठ से विग्रह बनाना और क्योंकि तुमने मुझे आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को देखा, अतः इसी दिन रथ पर विराजमान कर समस्त प्रजा को दर्शन और स्पर्श का अधिकार देना।"  राजा ने मंदिर बनवाया, ब्रह्मा जी से प्राण प्रतिष्ठा कराई और विग्रह स्थापित किए। रानी गुंडिचा ने मंदिर के निकट अपना निवास बनवाया। यह तय हुआ कि रथयात्रा में भगवान सात दिन मौसीबाड़ी में विश्राम करेंगे। इसी कारण गुंडिचा को मौसी कहा गया और उनके आवास को गुंडिचा मंदिर या मौसीबाड़ीनाम मिला। राजा ने इंद्रद्युम्न सरोवर भी बनवाया।


द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा स्वयं इस श्रीक्षेत्र में आए। उनके बाद भी यह स्थान पुरुषोत्तम क्षेत्र, शंख क्षेत्र और नीलांचल धाम के नाम से प्रसिद्ध रहा। कलियुग में विद्वानों ने इन तीनों विग्रहों को जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रूप में प्रतिष्ठित किया। विश्व में जगन्नाथपुरी ही एकमात्र ऐसा धाम है जहां अपूर्ण और बिना हाथ-पैर के विग्रहों की पूजा होती है और वह भी परम फलदायी मानी जाती है।


रथयात्रा: छुआछूत से मुक्ति का महोत्सव - मंदिर में वर्षभर श्रीविग्रहों को स्पर्श करना वर्जित है। केवल सात्विक आचरण वाले भक्त ही गर्भगृह में प्रवेश कर सकते हैं। मंदिर का महाप्रसाद मिट्टी की हांडी में मिलता है। सभी भक्त बिना किसी भेदभाव के, भूमि पर बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसी कारण यह उक्ति प्रचलित हुई-"जगन्नाथ का भात, जगत पसारे हाथ। जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।" प्राचीन समय में मंदिर में दलितों और कोढ़ी रोगियों का प्रवेश निषिद्ध था। भगवान की प्रेरणा से पुजारियों को यह बोध हुआ कि प्रभु सबके हैं। अतः रथयात्रा की परंपरा आरंभ हुई ताकि मार्ग में सभी जाति, धर्म और वर्ग के लोग भगवान को छू सकें, रथ की रस्सी खींच सकें और पुण्य लाभ ले सकें। इस प्रकार रथयात्रा सामाजिक समरसता और समानता का सबसे बड़ा सार्वजनिक मंच बन गई।


रथ निर्माण: शास्त्र और श्रद्धा का संगम - प्रतिवर्ष अक्षय तृतीया से रथ निर्माण का कार्य आरंभ होता है। इसे महाराणा विश्वकर्मा बढ़ई समुदाय की पीढ़ियां करती आ रही हैं। रथ बनाने में नीम, फासी और सागौन की लकड़ी प्रयुक्त होती है। लोहे की एक भी कील का प्रयोग नहीं होता। रथयात्रा के लिए तीन रथ बनाए जाते हैं जिन्हें नंदिघोष, तालध्वज और दर्पदलन कहा जाता है। नंदिघोष: भगवान जगन्नाथ का रथ, ऊंचाई 45 फीट, 16 पहिए, पीले वस्त्र।  तालध्वज: बलभद्र का रथ, ऊंचाई 44 फीट, 14 पहिए, नीले वस्त्र।  दर्पदलन: देवी सुभद्रा का रथ, ऊंचाई 43 फीट, 12 पहिए, लाल और काले वस्त्र। लगभग 1090 मीटर कपड़े से रथों को सजाया जाता है। प्रत्येक रथ के सारथी, रथपाल और द्वारपाल नियुक्त होते हैं। नारियल की छाल से बने मोटे रज्जु रथ खींचने के लिए लगाए जाते हैं। रथों के ध्वजों के नाम भी निश्चित हैं। नंदिघोष का ध्वज त्रिलोक्य मोहिनी, तालध्वज का उन्मानी और दर्पदलन का नदंबिका कहलाता है।


यात्रा क्रम और अन्य महत्वपूर्ण अनुष्ठान 

1.  स्नान यात्रा: ज्येष्ठ पूर्णिमा को 108 स्वर्ण कलशों के सुगंधित जल से तीनों विग्रहों का सार्वजनिक स्नान होता है।  

2.  अनासर: स्नान के बाद भगवान 15 दिन तक ज्वरग्रस्त माने जाते हैं। इस अवधि में दर्शन बंद रहते हैं और विग्रहों की विशेष औषधि से सेवा होती है।  

3.  नवयौवन दर्शन: आषाढ़ अमावस्या को भगवान स्वस्थ होकर भक्तों को नए रूप में दर्शन देते हैं।  

4.  रथयात्रा: आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को तीनों रथ गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। पुरी के गजपति महाराजा स्वयं छेरा पहरा करते हैं, अर्थात सोने की झाड़ू से रथ के मार्ग को बुहारते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि राजा भी भगवान का सेवक है।  

5.  बहुड़ा यात्रा: सात दिन बाद भगवान पुनः मुख्य मंदिर लौटते हैं।  


यात्रा समाप्ति पर रथों को तोड़कर उनकी लकड़ी मंदिर की रसोई में उपयोग की जाती है। श्रीजगन्नाथ मंदिर की रसोई विश्व की सबसे बड़ी रसोई मानी जाती है। यहां 56 प्रकार का भोग बनता है। रसोई की विशेषता यह है कि मिट्टी की हांडियां एक के ऊपर एक रखी जाती हैं और सबसे ऊपर वाली हांडी का प्रसाद सबसे पहले पकता है, जबकि अग्नि सबसे नीचे जल रही होती है। इसे भगवान की लीला माना जाता है।  आज भारत के अनेक शहरों में जगन्नाथ रथयात्रा निकाली जाती है, परंतु पुरी की रथयात्रा का आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व अनुपम है। यह पर्व केवल दर्शन का नहीं, बल्कि मानवता और समानता का भी पर्व है। अंजनी सक्सेना



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