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Bhopal व्यंग्य- जीरा वितरण अभियान Satire- Cumin distribution campaign

 


Upgrade Jharkhand News.  ऊँट के मुँह में जीरा डालने से न ऊँट का पेट भरता है, न जीरे की ही प्रतिष्ठा बढ़ती है। पर हमारे देश में यह व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन चुका है। जहाँ देखिए, वहीं जीरे बाँटे जा रहे हैं और ऊँट मुस्कुराते हुए भूखे रहने का अभ्यास कर रहे हैं। सरकार हर 6 माह में मंहगाई राहत  की घोषणा करती है, । कर्मचारी पूछता है, कितना? जवाब आता है, इतना कि समाचार की हेडलाइन बन जाए, मगर जेब की सिलवट भी न बदले। यानी ऊँट के मुँह में जीरा। एक लेखक को वर्षों की तपस्या,प्रकाशक की मिन्नत,जोड़ तोड़ के बाद पुरस्कार मिलना घोषित होता है। पुरस्कार राशि देखकर लेखक भावुक हो गया। इसलिए नहीं कि रकम अधिक थी, बल्कि इसलिए कि यात्रा भत्ता उससे महँगा था । सम्मान का शॉल इतना बड़ा कि उसमें पूरा लेखक लिपट जाए, लेकिन लिफाफा इतना हल्का कि हवा भी उसे उड़ा ले जाए। साहित्य ने फिर कहा,सम्मान अमूल्य होता है। लेखक मन ही मन बोला, “हाँ, इसलिए उसका मूल्य कोई नहीं देता।”


आजकल संस्थाएँ भी जीरा वितरण अभियान चला रही हैं। पाँच सौ रुपये का मानदेय देकर लिखती हैं, “आपका अमूल्य सहयोग मिला।” अमूल्य सहयोग का मूल्य पाँच सौ! लगता है शब्दकोश भी अब महँगाई से डर गया है।    ज्यादा साहित्य प्रेमी आयोजक अपनी इज्जत बचाने के लिए स्वयं ही मानदेय को पत्रम पुष्पम लिख देते हैं, या सुदामा के चावल कहकर उसे थोड़ा ललित टच दे कर अपनी झेंप पता नहीं किससे मिटा लेते हैं। डिजिटल दुनिया ने तो जीरे को और आधुनिक बना दिया है। घंटों का वेबिनार, दर्जनों स्लाइड, अंत में धन्यवाद और एक ई-प्रमाणपत्र। प्रमाणपत्र डाउनलोड करते-करते बिजली का बिल ज़्यादा आ जाए तो आयोजक की आत्मा प्रसन्न हो जाती है कि ज्ञान का प्रसार सफल रहा। शिक्षा में भी यही हाल है। बच्चों से कहा जाता है, बड़े सपने देखो। फिर स्कूल की लाइब्रेरी में तीन किताबें और उन पर चार ताले। खेलो, आगे बढ़ो, मगर मैदान पार्किंग बन चुका है। सपनों का ऊँट दौड़ना चाहता है, व्यवस्था उसे जीरा चबाने का प्रशिक्षण दे रही है।


महँगाई सबसे बड़ी जीरा विशेषज्ञ है। वेतन बढ़ा दो प्रतिशत, खर्च बढ़ा बीस प्रतिशत। फिर अर्थशास्त्री बताते हैं कि आपकी आय में वृद्धि हुई है। सचमुच हुई है, कैलकुलेटर पर, जेब में तो वही पुराना ऊँट बैठा जुगाली कर रहा है।      सोशल मीडिया ने इस मुहावरे को लोकतांत्रिक बना दिया है। किसी ने एक पौधा लगाया, सौ सेल्फियाँ खिंच गईं। किसी ने दो किताबें दान कीं, पचास पोस्ट लिख दीं। काम जीरा, प्रचार ऊँट। एक दर्जन केले मरीजो में बांटकर पुण्यात्मा बन कर ऊंट की तरह अस्पताल से निकलते नेता जी की फोटो अखबार में देखी ही होंगी। हम सब भी कहीं न कहीं इस खेल के हिस्सेदार हैं। रिश्तों में समय नहीं, लेकिन इमोजी भरपूर। पड़ोसी की खबर नहीं, मगर टेक केयर का संदेश तुरंत पहुँच जाता है। संवेदनाएँ भी अब इंस्टेंट जीरे की पुड़िया बन गई हैं। व्हाट्सएप पर ज्ञान त्वरित फॉरवर्ड कर देते हैं, किंतु अमल में नहीं लाते।


दरअसल समस्या जीरे की नहीं, ऊँट की भूख को समझने की है। भूख बड़ी हो और समाधान प्रतीकात्मक, तो व्यंग्य अपने आप जन्म लेता है। समाज को रोटी चाहिए, हम उसे रिबन काटकर आशाई भरोसा परोस देते हैं। लेखक को सम्मान के साथ श्रम का मूल्य चाहिए, हम उसे स्मृति-चिह्न थमा देते हैं। नागरिक को सुविधा चाहिए, हम उसे घोषणा दे देते हैं। अब तो लगता है कि इस मुहावरे का संशोधित संस्करण लिख देना चाहिए, “ऊँट अब जीरा नहीं माँगता, उसे इतना अनुभव हो गया है कि वह पहले लिफाफे का वजन तौलता है।”और हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जीरा बाँटने वाले स्वयं को अन्नदाता समझते हैं। विवेक रंजन श्रीवास्तव



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