Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

Bhopal ब्रिक्स सम्मेलन: ईरानी और भारतीय संस्कृति की स्मृतियों का संगम BRICS Summit: A Confluence of Memories of Iranian and Indian Culture

 


Upgrade Jharkhand News.  नई दिल्ली के ब्रिक्स सम्मेलन ने एक बार फिर भारत और ईरान के सभ्यतागत संबंधों को पुनर्जीवित और ऊर्जावान कर दिया। भारत मंडपम में लगे ब्रिक्स बाजार में स्थित ईरान पवेलियन केवल हस्तशिल्प, कलाकृतियों और पारंपरिक प्रतीकों का प्रदर्शन-स्थल नहीं था। वह उस ऐतिहासिक स्मृति का जीवंत संकेत है, जिसमें भारत और ईरान ने एक-दूसरे को केवल पड़ोसी या व्यापारिक साझेदार के रूप में नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों से संवादरत दो सभ्यताओं के रूप में देखा है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की पुत्री ज़हरा पेज़ेश्कियान और उनके पति हसन मजीदी का पवेलियन दौरा इसी सांस्कृतिक निरंतरता को वर्तमान क्षण से जोड़ता है। शिल्पकारों और प्रतिनिधियों से उनकी बातचीत ने यह रेखांकित किया कि भारत-ईरान संबंधों की सबसे गहरी परत सरकारों के समझौतों से नहीं, बल्कि भाषा, संगीत, दर्शन, व्यापार, धर्म, भोजन, स्थापत्य और लोक-स्मृति से बनी है। ईरान पवेलियन में प्रदर्शित कला हमें यह याद दिलाती है कि सभ्यताएं सीमाओं से बड़ी होती हैं। नक्शे बदलते हैं, साम्राज्य उठते और गिरते हैं, राजनीतिक गठजोड़ बनते और टूटते हैं, लेकिन मनुष्य की रचनात्मक स्मृति पीढ़ियों के पार यात्रा करती रहती है।


भारत और ईरान के संबंधों की कहानी 15 मार्च 1950 को स्थापित राजनयिक संबंधों से शुरू नहीं होती। वह सिंधु घाटी सभ्यता, फारस की खाड़ी, बलूचिस्तान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया से होकर गुजरती हुई प्रागैतिहासिक काल तक जाती है।  भारतीय पुरातात्त्विक स्थलों और ईरान के प्राचीन नगरों के बीच व्यापारिक संपर्क के प्रमाण मिले हैं। सिंधु सभ्यता की मुहरें ईरान और मेसोपोटामिया के स्थलों पर मिली हैं। भारत से हाथीदांत, मसाले और वस्त्र जाते थे, जबकि ईरान और मध्य एशिया से धातुएं, फिरोजा, चांदी और अन्य वस्तुएं भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुंचती थीं। अरब सागर और फारस की खाड़ी इस प्राचीन संपर्क-व्यवस्था की जीवनरेखा थीं। यह रिश्ता केवल वस्तुओं का लेन-देन नहीं था। इसके साथ शब्द, मिथक, धार्मिक प्रतीक, संगीत, तकनीक और जीवन-पद्धतियां भी यात्रा करती थीं। संस्कृत और अवेस्ता, दोनों प्राचीन भाषाओं में अनेक समानताएं विद्यमान हैं। संस्कृत का ‘सप्त’ अवेस्ता में ‘हप्त’ के निकट दिखाई देता है, संस्कृत का ‘ऋत’ ईरानी परंपरा के ‘अशा’ से तुलनीय है, ‘यज्ञ’ और ‘यस्न’, ‘मनस्’ और ‘मनह’, ‘पितर’ और ‘पितर’, ‘भ्राता’ और ‘बरादर’ जैसे शब्द एक साझा भाषाई अतीत की ओर संकेत करते हैं। ईरान ने सप्त सिंधु वाले देश भारत को हफ्त हिंदू कहा और इस तरह हिंदू शब्द प्रचलित होता गया।


वैदिक परंपरा और प्राचीन ईरानी धार्मिक चिंतन में अग्नि, सत्य और नैतिक व्यवस्था के विचारों की समानताएं विद्वानों का ध्यान आकर्षित करती रही हैं। ऋग्वेद का ‘ऋत’ और अवेस्ता का ‘अशा’ ब्रह्मांडीय तथा नैतिक व्यवस्था के विचार से जुड़े हैं। वैदिक अग्नि और ईरानी ‘आतश’ दोनों ही प्रकाश, शुद्धि और पवित्रता के प्रतीक रहे।ईरानी धार्मिक परंपरा में अहुरा मज़्दा और भारतीय परंपरा में असुर शब्द के भाषाई संबंध पर भी विद्वानों ने चर्चा की है। समय के साथ दोनों शब्दों के धार्मिक अर्थ अलग-अलग दिशाओं में विकसित हुए, लेकिन यह परिवर्तन स्वयं इस साझा सांस्कृतिक अतीत का प्रमाण है कि विभाजन के बाद भी स्मृतियां भाषाओं में जीवित रहती हैं।    ईरान और इस्लामी संस्कृति के नवरोज और भारतीय वसंतोत्सवों के बीच भी ऋतु, प्रकाश और नवजीवन की सांस्कृतिक प्रतिध्वनियां देखी जा सकती हैं। भारत के पारसी समुदाय ने नवरोज को भारतीय बहुलतावादी समाज में जीवित रखा। इस समुदाय का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि भारत ने ईरान से आए शरणार्थियों को केवल आश्रय नहीं दिया, बल्कि उन्हें अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचना में सम्मानजनक स्थान दिया। पारसी समुदाय ने भारत के उद्योग, शिक्षा, विधि, विज्ञान, पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन में असाधारण योगदान दिया।


फारसी साम्राज्य और उत्तर-पश्चिमी भारत के बीच संपर्क ने प्रशासन, कला और राजकीय संचार पर प्रभाव डाला। बाद के मौर्यकालीन कला-विकास में पश्चिमी एशियाई प्रभावों पर इतिहासकारों ने विचार किया है, यद्यपि किसी भी प्रभाव को सरल नकल के रूप में देखना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। भारत और ईरान का संपर्क बौद्ध काल में और विस्तृत हुआ। गांधार कला में भारतीय बौद्ध विषयों, यूनानी शिल्प-परंपरा और ईरानी रूपांकनों का अद्भुत मेल दिखाई देता है। बौद्ध कथाएं मध्य एशिया और ईरान से होकर चीन तक पहुंचीं। सासानी ईरान और गुप्त भारत के बीच राजनयिक और सांस्कृतिक संपर्क थे। ईरान के जंदिशापुर जैसे केंद्रों में भारतीय, यूनानी और ईरानी चिकित्सा-परंपराओं का संवाद विकसित हुआ। इसी संपर्क की एक प्रसिद्ध मिसाल पंचतंत्र है। भारतीय नीति-कथाएं पहलवी में पहुंचीं, फिर अरबी में अनुदित हुईं और वहां से यूरोप तक फैल गईं। भारतीय चतुरंग ने ईरान में शतरंज का रूप लिया और आगे चलकर विश्वव्यापी खेल बन गया। मध्यकालीन भारत में फ़ारसी का प्रभाव अत्यंत व्यापक था। कई शताब्दियों तक यह प्रशासन, कूटनीति और साहित्य की प्रमुख भाषा रही, लेकिन यह कहना अधूरा होगा कि फ़ारसी ने भारतीय भाषाओं को दबाकर अपना स्थान बनाया। उसी दौर में मराठी, बांग्ला, कन्नड़, तमिल, पंजाबी, अवधी और ब्रज में भी समृद्ध साहित्य रचा गया। फ़ारसी ने बाजार, दरवाजा, सड़क, कागज, सरकार, रोज, बंद, दफ्तर, दुनिया और खबर जैसे अनेक शब्द भारतीय भाषाओं को दिए।


भारत की साझा संस्कृति का सबसे सुंदर उदाहरण अमीर ख़ुसरो हैं। वे भारतीय भूभाग में जन्मे, फ़ारसी में लिखे, हिंदवी को प्रतिष्ठा दी और भारतीय संगीत को नई दिशाएं प्रदान कीं। “ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार। जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।” भारत में सूफ़ी परंपरा और भक्ति आंदोलन का संवाद निर्णायक घटनाओं में से एक है। जलालुद्दीन रूमी की कविता में पुकार है - “बियायेद, बियायेद, हर आंक हस्तीद बियायेद - आइए, आप जो भी हैं, आइए।” सादी ने कहा - “बनी आदम अज़ाए-ए-यकदीगरंद, कि दर आफरीनश जे यक गोहरंद - आदम की संतानें एक-दूसरे के अंग हैं, क्योंकि उनकी रचना एक ही तत्व से हुई है।” यह पंक्ति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ से संवाद करती है। कबीर ने भी कहा  “मस्जिद ऊपर मुल्ला पुकारे, क्या बहरा हुआ खुदाई।”           1932 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ईरान की यात्रा की। शीराज में सादी और हाफिज की स्मृतियों से प्रभावित होकर उन्होंने कहा था कि फ़ारसी काव्य मानवीय आत्मा की साझा विरासत है। जवाहरलाल नेहरू ने लिखा था कि कुछ ही लोग ऐसे हैं जो उत्पत्ति और इतिहास दोनों में भारत और ईरान के लोगों से इतने निकट रहे हों।


भारत-ईरान संबंधों को पश्चिम के विरुद्ध पूर्वी एकता जैसे सरल ढांचे में बांधना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। औपनिवेशिक शक्ति-राजनीति ने एशियाई समाजों के बीच अविश्वास बढ़ाया। ब्रिटिश शासन ने फ़ारसी को हटाकर अंग्रेजी को बढ़ावा दिया, जिसने भारतीय समाज की ऐतिहासिक स्मृति को कमजोर किया। ईरान पर प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने संवाद के रास्ते खुले रखे। चाबहार केवल बंदरगाह नहीं, भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच देने वाला रणनीतिक मार्ग है। किसी देश की कला और सभ्यता का सम्मान करना उसकी प्रत्येक नीति का समर्थन करना नहीं होता। उसी तरह किसी सरकार की आलोचना करना उस देश की जनता या संस्कृति के प्रति घृणा का औचित्य नहीं बन सकता। भारत की सभ्यता ने बौद्ध, जैन, वैदिक, शैव, वैष्णव, सूफ़ी, इस्लामी, सिख, पारसी और ईसाई परंपराओं को आत्मसात किया है। आज ब्रिक्स बाजार का ईरान पवेलियन अतीत को संग्रहालय की वस्तु बनाकर नहीं रखता, वह उसे वर्तमान कूटनीति, व्यापार, पर्यटन और शिक्षा से जोड़ता है। यदि संबंधों को संस्थागत रूप देना है तो फ़ारसी, संस्कृत, हिंदी और उर्दू के संयुक्त अध्ययन केंद्र, प्राचीन व्यापार मार्गों पर साझा पुरातात्विक परियोजनाएं, भारतीय और ईरानी विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग, टैगोर, सादी, हाफिज, रूमी, ख़ुसरो और कबीर के साझा अनुवादों को विद्यालयों तक पहुंचाना और चाबहार को सांस्कृतिक संपर्क से जोड़ना आवश्यक होगा।


मिर्जा ग़ालिब ने लिखा है “इश्क पर जोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब, कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।” सभ्यताओं के बीच आत्मीयता भी ऐसी ही होती है। ईरान पवेलियन में रखे कालीन या किसी कवि की पंक्ति बताती है कि भारत और ईरान का रिश्ता केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं, वर्तमान की जिम्मेदारी भी है। किसी सभ्यता की महानता इस बात में नहीं कि वह कितनी शुद्ध रही, उसकी महानता इस बात में है कि उसने दूसरों से संवाद करते हुए अपनी आत्मा को कितना विस्तृत किया। ओंकारेश्वर पाण्डेय



No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU