Upgrade Jharkhand News. इंदौर में 12 सितंबर को प्रस्तावित कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के कार्यक्रम ‘छात्रों की गूंज’ को लेकर मध्यप्रदेश में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई है। राहुल गांधी के पहुंचने से पहले ही भाजपा और कांग्रेस के बीच आयोजन स्थल और भीड़ को लेकर तनातनी शुरू हो गयी है। वहीं, राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा की टिप्पणी ने कांग्रेस के भीतर कार्यक्रम के स्थान को लेकर चल रही अंदरुनी चर्चाओं को भी सामने ला दिया है। कांग्रेस इस आयोजन के जरिए छात्रों और युवाओं के बीच बड़ा राजनीतिक संदेश देने की तैयारी में है। पार्टी का दावा है कि कार्यक्रम में करीब 50 हजार छात्र शामिल होंगे। भाजपा इसी दावे को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधकर छींटाकशी कर रही है।विवाद की शुरुआत इंदौर भाजपा नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा के कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को लिखे पत्र से हुई। मिश्रा ने 50 हजार छात्रों को जुटाने के कांग्रेस के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि पार्टी दो-तीन हजार युवाओं को भी जुटा ले तो दशहरा मैदान पर्याप्त रहेगा। उन्होंने इंदौर के अभय प्रशाल और सुपर कॉरिडोर जैसे स्थानों के विकल्प भी सुझाए।
भाजपा के इस तंज का कांग्रेस ने तीखा जवाब दिया। इंदौर ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े ने खुले पत्र में भाजपा पर छात्रों और युवाओं की आवाज दबाने का आरोप लगाया। उन्होंने नेहरू स्टेडियम में पहले हुए बड़े आयोजनों का हवाला देते हुए कहा कि यहां 40 से 60 हजार लोगों की भीड़ जुट चुकी है। वानखेड़े ने भाजपा से राजनीतिक संकीर्णता छोड़कर स्टेडियम की अनुमति दिलाने में सहयोग करने की मांग की। इससे आयोजन स्थल का मुद्दा सीधे भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर नेहरू स्टेडियम उपलब्ध कराने की मांग की है। पटवारी ने कहा कि राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष और संवैधानिक पद पर आसीन जनप्रतिनिधि हैं। छात्रों और युवाओं के साथ संवाद के लिए नेहरू स्टेडियम उपयुक्त स्थान रहेगा। पटवारी ने इसे सामान्य राजनीतिक आयोजन के बजाय छात्रों और युवाओं से जनसंवाद बताया और संबंधित अधिकारियों को स्टेडियम उपलब्ध कराने के निर्देश देने का आग्रह किया। अब सबकी नजरें सरकार और प्रशासन के फैसले पर है। स्टेडियम की अनुमति मिलती है या कांग्रेस को किसी दूसरे स्थान पर कार्यक्रम करना पड़ता है, यह तो आने वाले दिनों में साफ होगा लेकिन इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा की सोशल मीडिया पोस्ट ने पार्टी के भीतर की चर्चा को हवा दे दी। तन्खा ने लिखा कि उन्होंने पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी की बैठक में इस कार्यक्रम को जबलपुर में आयोजित करने का सुझाव दिया था। उन्होंने जबलपुर को महाकौशल की शान और अपना प्रिय शहर बताया, जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की पसंद इंदौर थी। विवेक तन्खा जबलपुर से आते हैं, जबकि जीतू पटवारी इंदौर से हैं। ऐसे में उनके बयान को आयोजन स्थल को लेकर पार्टी के भीतर मौजूद अलग-अलग राय से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि कांग्रेस की ओर से इसे किसी बड़े विवाद के रूप में पेश नहीं किया गया है, लेकिन बयान ने क्षेत्रीय राजनीति की चर्चा जरूर छेड़ दी है।
कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए कांग्रेस ने अब संगठन को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है। तैयारियों को लेकर इंदौर में एक ही दिन में लगातार सात बैठकें आयोजित की गई। इनमें प्रदेश कांग्रेस की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी के प्रमुख सदस्य, इंदौर, भोपाल और उज्जैन संभाग के विधायक, पूर्व विधायक, जिला अध्यक्ष और वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हुए। बैठकों में कार्यक्रम की तैयारियों, छात्रों की भागीदारी और संगठन की जिम्मेदारियों को लेकर रणनीति तय की गई। व्यवस्थाओं को लेकर कमेटिया बनाई गई। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती 50 हजार छात्रों को जुटाने के अपने दावे को जमीन पर उतारने की है। राहुल गांधी के कार्यक्रम के केंद्र में छात्र और युवा हैं। कांग्रेस शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। पार्टी के लिए यह आयोजन मालवा-निमाड़ में राहुल गांधी की राजनीतिक मौजूदगी मजबूत करने और युवाओं के बीच अपना संदेश पहुंचाने का अवसर भी है। भाजपा की ओर से कार्यक्रम की भीड़ और आयोजन स्थल को लेकर सवाल उठाए जाने से साफ है कि सत्तारूढ़ दल भी इसे गंभीर राजनीतिक गतिविधि के रूप में देख रहा है। यही कारण है कि राहुल गांधी के दौरे से पहले ही दोनों दलों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है।
फिलहाल इंदौर में मुकाबला केवल कार्यक्रम कराने का नहीं, बल्कि यह दिखाने का है कि युवाओं के बीच किस दल की पकड़ मजबूत है। 12 सितंबर को राहुल गांधी के मंच पर पहुंचने से पहले कांग्रेस को संगठन, भीड़ और आयोजन स्थल, तीनों मोर्चों पर अपनी तैयारी साबित करनी होगी। वहीं भाजपा की कोशिश होगी कि कांग्रेस के दावों पर सवाल उठाकर उसके राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन को कमजोर किया जाए। राहुल गांधी के दौरे ने फिलहाल तो मध्यप्रदेश की सियासत को गरमा दिया है और आने वाले दिनों में यह टकराव और तेज होने के आसार दिखाई दे रहे हैं। पवन वर्मा
No comments:
Post a Comment