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Jamshedpur अमर वीरांगना मैना कुमारी: 1857 की क्रांति में बाल शौर्य और स्वाभिमान का स्वर्णिम अध्याय Immortal warrior Maina Kumari: A golden chapter of child bravery and self-respect in the 1857 revolution

 


Upgrade Jharkhand News. ​भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल प्रौढ़ योद्धाओं के शौर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नन्हे हाथों द्वारा उठाई गई प्रतिरोध की मशालें भी उतनी ही देदीप्यमान हैं। 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम जब ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला रहा था, तब कानपुर के निकट बिठूर की पावन भूमि पर एक ऐसी वीरांगना का उदय हुआ, जिसने अल्पायु में ही राष्ट्रभक्ति की सर्वोच्च परिभाषा गढ़ दी। वह नाम था—वीर बालिका मैना कुमारी। नाना साहब पेशवा की दत्तक पुत्री के रूप में पली-बढ़ी मैना ने मात्र 12-13 वर्ष की अवस्था में क्रूर ब्रिटिश हुकूमत के सामने जो अडिग साहस दिखाया, वह इतिहास के पन्नों में अमर है।

​1857 के सैन्य विद्रोह के दौरान कानपुर और बिठूर क्रांति के प्रमुख केंद्र बन चुके थे। नाना साहब के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने फिरंगियों को कड़ी चुनौती दी। हालांकि, संसाधनों के असंतुलन और अंग्रेजी सेना के भारी जमावड़े के बाद जब अंग्रेजों ने बिठूर पर पुनः नियंत्रण स्थापित किया, तब नाना साहब को रणनीति के तहत भूमिगत होना पड़ा। ब्रिटिश सेना का नेतृत्व कर रहे जनरल हे और जनरल आउट्रम ने बिठूर में भारी तबाही मचाई। अंग्रेजों का उद्देश्य केवल सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि क्रांति की हर निशानी को मिटाना था। वे नाना साहब के राजप्रासाद को तोपों से उड़ाने की योजना बना रहे थे।​उसी समय खंडहर बनते महल के द्वार पर एक सुकुमार बालिका निडर होकर खड़ी हो गई। उसने महल को नष्ट न करने का आग्रह किया। अंग्रेजी अफसर उसकी निर्भीकता और आत्मविश्वास को देखकर दंग रह गए। मैना ने अंग्रेज सेनापति को स्मरण कराया कि निर्दोष पत्थर और महल किसी अपराध के भागी नहीं हैं। उसकी तार्किक और स्वाभिमानी वाणी ने एक क्षण के लिए विदेशी अफसरों को भी सोच में डाल दिया, किंतु साम्राज्यवादी क्रूरता के सामने मानवीय संवेदनाओं का कोई मोल न था।


​जब ब्रिटिश हुकूमत को यह ज्ञात हुआ कि यह बालिका स्वयं नाना साहब की पुत्री है, तो उनके दमनचक्र की दिशा बदल गई। अंग्रेजों ने मैना को बंदी बना लिया। उनका मानना था कि एक छोटी बच्ची को डरा-धमकाकर या प्रलोभन देकर नाना साहब और उनके विद्रोही साथियों के गुप्त ठिकानों का पता आसानी से लगाया जा सकता है।​मैना कुमारी से कठोर पूछताछ की गई। धमकियां दी गईं, मानसिक दबाव बनाया गया और तरह-तरह के भय दिखाए गए। किंतु उस वीरांगना का उत्तर केवल मौन और अडिग नकार था। उसने अपने पिता और राष्ट्र के स्वाभिमान के साथ कभी कोई समझौता स्वीकार नहीं किया। विदेशी सत्ता के विरुद्ध उसका वह मौन तोपों की गर्जना से भी अधिक प्रखर सिद्ध हुआ। अंग्रेजों के तमाम प्रयास बालिका के दृढ़ संकल्प की दीवार से टकराकर चूर हो गए।

​नाना साहब का कोई सुराग न मिलने से तिलमिलाए ब्रिटिश हुकूमत के अफसरों ने अपनी सारी बर्बरता की सीमाएं लांघ दीं। एक मासूम, निहत्थी बच्ची को जिंदा जला देने का अमानवीय आदेश जारी किया गया। ​इतिहास साक्षी है कि जब मैना कुमारी को दहकती चिता की ओर ले जाया गया, तब भी उसके चेहरे पर भय की एक रेखा तक न थी। उसने अपनी मातृभूमि और स्वाभिमान की रक्षा के लिए हंसते-हंसते धधकती ज्वालाओं को गले लगा लिया। वह शरीर से भस्म हो गईं, किंतु उनका आत्मबल ब्रिटिश साम्राज्य के अहंकार को सदैव के लिए झुलसा गया।


​मैना कुमारी का यह बलिदान हमें सिखाता है कि राष्ट्रप्रेम आयु, कद या भौतिक साधनों की सीमाओं में नहीं बंधता। वह समर्पण और निष्ठा की एक ऐसी अंतर्धारा है जो बाल हृदय में भी अंगारे की भांति प्रज्वलित हो सकती है। आज जब हम स्वतंत्र भारत की खुली हवा में सांस ले रहे हैं, तब मैना कुमारी जैसी वीरांगनाओं का पावन स्मरण हमें हमारे दायित्वों का बोध कराता है। उनका अद्वितीय शौर्य युगों-युगों तक प्रत्येक भारतीय के हृदय में स्वाभिमान, निष्ठा और देशप्रेम की अमर ज्योति जलाता रहेगा।



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