Jamshedpur (Nagendra) एक पीड़ित एवं वंचित परिवार को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए झारखंड उच्च न्यायालय ने एक मृत भारी वाहन चालक के परिवार को दिए गए मुआवज़े को ₹5,76,000 से बढ़ाकर ₹18,30,000 (तथा इसके अतिरिक्त 6% वार्षिक साधारण ब्याज) कर दिया। यह वृद्धि मूल मुआवज़े की लगभग 3.18 गुना (317.7%) है। इस केश में पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए जमशेदपुर के रहने वाले युवा अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा को अमिकस क्यूरी के रूप में नियुक्त किया गया था ।
एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) एक लैटिन वाक्यांश है, जिसका शाब्दिक अर्थ "न्यायालय का मित्र" (Friend of the Court) होता है। यह कोई ऐसा व्यक्ति, वकील या संगठन होता है जो किसी चल रहे कानूनी मुकदमे का प्रत्यक्ष पक्षकार (वादी या प्रतिवादी) नहीं होता है। अदालत किसी जटिल, संवेदनशील या जनहित से जुड़े मामले में निष्पक्ष राय, कानूनी सलाह या विशेषज्ञता हासिल करने के लिए स्वयं एमिकस क्यूरी की नियुक्ति करती है , जिनका मुख्य काम अदालत को सही और निष्पक्ष निर्णय लेने में मदद करना होता है । इसी उद्देश्य से अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा को उक्त मामले में एमिकस क्यूरी के रूप में नियुक्त किया गया था। वर्तमान में अधिवक्ता श्री ओझा रांची हाई कोर्ट में वकालत करते हैं ।
मुख्य न्यायाधीश द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी की विशेष सराहना हुई - मुख्य न्यायाधीश ने Amicus Curiae अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा द्वारा की गई योग्य सहायता के लिए उच्च न्यायालय की ओर से विशेष रूप से उन्हें सराहना मिली । न्यायालय ने यह अंकित किया कि उन्होंने अपीलकर्ताओं का पक्ष अत्यंत निपुणता पूर्वक प्रस्तुत किया। न्यायालय द्वारा व्यक्त इस सराहना के अतिरिक्त झालसा को निर्देश दिया गया कि वह पैनल अधिवक्ताओं की अनुसूची के अनुसार श्री ओझा को उनकी निर्धारित फीस का भुगतान करे। इस संबंध में अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा ने उक्त फैसले से अपने आप को काफी गौरांवित महसूस कर रहे हैं । उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा मुझे यह जिम्मेदारी मिलना मेरे लिए अत्यंत सम्मान और गर्व की बात है । लेकिन इस सम्मान के साथ-साथ एक बहुत बड़ी जवाबदेही और नैतिक कर्तव्य का भी अहसास था। इस मामले में एक ऐसा ग्रामीण पीड़ित परिवार, जो पिछले 12 वर्षों से अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा था, उनके पक्ष को माननीय न्यायालय के समक्ष पूरी निष्ठा, तथ्य और कानूनी तर्कों के साथ रखना मेरी प्राथमिक जिम्मेदारी थी । अधिवक्ता श्री ओझा ने बताया कि वर्ष 2014 में दायर अपील का अंतिम रूप से निस्तारण रांची हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक द्वारा दिनांक 28.08.2026 को किया गया। उन्होंने उच्च न्यायालय के इस फैसले के बारे में बिंदुवार निम्नलिखित पक्ष रखे :
* भारी वाहन चालकों के कार्य की महत्वपूर्ण मान्यता : M.A. No. 21 of 2014 में माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारी वाहन चलाना एक कुशल (Skilled) कार्य है और किसी भारी वाहन के चालक को अर्ध-कुशल (Semi-skilled) श्रमिक नहीं माना जा सकता।
* ट्रिब्यूनल के आदेश में संशोधन : MACT, पाकुड़ द्वारा वर्ष 2012 में मृतक चालक जहांगीर खान की आय ₹4,500 प्रति माह निर्धारित की गई थी। माननीय उच्च न्यायालय ने आय को पुनः निर्धारित करते हुए ₹10,000 प्रति माह माना तथा उसमें 40% भविष्य की संभावनाएँ (Future Prospects) जोड़ते हुए कुल मुआवज़ा ₹18,30,000 निर्धारित किया।
* बीमा कंपनी को कड़ा निर्देश एवं ब्याज की गणना : National Insurance Company Ltd. को स्पष्ट आदेश दिया गया है कि वह ₹18,30,000 की संपूर्ण बढ़ी हुई राशि 6% वार्षिक साधारण ब्याज के साथ छह सप्ताह के भीतर माननीय उच्च न्यायालय में जमा करे।
* ब्याज की अवधि : यह ब्याज दावा याचिका दायर करने की तिथि 07.01.2012 से राशि की वास्तविक वसूली/भुगतान तक देय होगा।
* विलंब अवधि का समायोजन (1 वर्ष की छूट) : अपील दायर करने में हुए 388 दिनों के विलंब के कारण, न्यायालय ने बीमा कंपनी को लगभग 1 वर्ष की इस विलंब अवधि का ब्याज भुगतान करने से छूट प्रदान की है।
* विधिक सहायता एवं बैंक खाते में भुगतान की सीधी निगरानी : माननीय उच्च न्यायालय ने Amicus Curiae, झालसा एवं डालसा, साहेब गंज को निर्देश दिया कि वे दावेदार परिवार से व्यक्तिगत संपर्क कर उन्हें मुआवज़ा प्राप्त करने में पूर्ण सहायता प्रदान करें, ताकि राशि सीधे दावेदारों के बैंक खाते में ही ट्रांसफर हो सके और किसी भी प्रकार का शोषण न हो।

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