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Bhopal व्यंग्य : हवा हवाई हवाई यात्रा Satire: Air Air Air Travel

Upgrade Jharkhand News. पहले हवाई यात्रा के लिए हजार बार सोचना पड़ता था। मध्यम वर्गीय या निम्न मध्यम वर्गीय हवाई जहाज में उड़ान भरने का सपना भी नहीं देख सकता था, मगर जब से हवाई चप्पल पहनने वालों को हवाई यात्रा का ऑप्शन मिला है, तब से हवाई यात्रा सुलभ हो गई है। इतनी सुलभ, कि समय की बचत के लिए आम आदमी बस और रेल की भीड़ भरी यात्रा को नकारकर हवाई टिकट बुक कराने में रूचि रखने लगा है। एयरपोर्ट पर भी बस अड्डों या रेलवे प्लेटफॉर्म से अधिक भीड़ इकट्ठी होने लगी है। बहरहाल हवाई यात्रा को सुलभ बनाने में निजी क्षेत्र की कंपनियां उतरी हुई हैं। निजी कंपनी बोले तो किसी व्यापारी की निजी दुकान, जिसका उद्देश्य अधिक से अधिक मुनाफा कमाना होता है। 



जिसे ग्राहक की मज़बूरी से कोई सरोकार नहीं होता। जो मांग पूर्ति के नियम से दाम बढ़ाकर या दाम घटाकर अपने व्यापार में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोत्तरी करता है। उसे अपने कर्मचारियों की समस्याएं भी दिखाई नहीं देती। बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ, कि किसी एयरलाइंस की व्यवस्था ही पटरी से उतर गई। अनेक उड़ानें रद्द हो गई। यात्री एयरपोर्ट पर समय से पहले अपने लगेज के साथ पहुँच गए, किन्तु गंतव्य तक नहीं पहुंचे। एयरपोर्ट पर भीड़ इतनी बढ़ी, कि बैठने के लिए कुर्सियां कम पड़ गई। प्रतियोगी परीक्षा के लिए हवाई यात्रा करने वाले होनहार छात्र परीक्षा स्थल तक पहुंच नही सके। महीनों पहले से निश्चित की गई हवाई यात्राएं अनिश्चितता के फेर में फंसकर निरस्त हो गई। 



अब इसे विधि का विधान मानें या हवाई कंपनी की नाकामी। कोई सही सही से जानकारी देने के लायक नहीं बचा। इधर हवाई यात्राएं निरस्त हो रही थी, उड़ानें रद्द हो रही थी, उधर टिकट की बुकिंग जारी थी। यात्री परेशान थे, मगर सियासत खुश थी। कुछ यूट्यूबर अति उत्साहित थे, कि इस नाकामी का ठीकरा जितनी जल्दी हो, सत्ता के सर पर मढ़ा जाए। इसके लिए देश के मुखिया को दोषी ठहराया जाए, कि मुखिया हवाई अड्डे पर जाकर पॉयलट की सीट पर क्यों नहीं बैठ रहा है ? इसे कहते हैं आपदा में अवसर तलाशना। सियासत का पहला नियम यही है, कि जो भी सत्ता में बैठा हो, उसे बदनाम करने का कोई भी अवसर हाथ से न जाने दें। गलती किसी की भी हो, लेकिन किसी की भी गलती पर सत्ता और उसकी व्यवस्था को कोसो। समस्याएं घर में भी आती हैं और सार्वजनिक व्यवस्था में भी। समस्याओं के त्वरित निदान के लिए प्रयास भी किए जाते हैं, किन्तु धैर्य खोते समाज में हथेली पर सरसों उगाने वाले युग में हवाई यात्रा के हवा हवाई होने पर सवाल तो उठेगा ही, कि हवाई यात्रा हवा हवाई क्यों हुई ? सुधाकर आशावादी



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