Upgrade Jharkhand News. भारतीय सेना का इतिहास केवल युद्धों की गाथा नहीं है, वह उन व्यक्तित्वों का भी इतिहास है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में कर्तव्य, विवेक और साहस का संतुलन साधा।ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ऐसे ही सैन्य अधिकारी थे, जिनका जीवन भारतीय सेना की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है जिसने स्वतंत्र भारत की सुरक्षा-नींव को व्यवहारिक नेतृत्व और अनुशासन से सुदृढ़ किया। उनकी जयंती के अवसर पर उन्हें स्मरण करना, दरअसल उस सैन्य संस्कृति को स्मरण करना है जो राष्ट्र को संकट से निकालने की क्षमता रखती है।
सैन्य प्रशिक्षण और आरंभिक सेवा -ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने उस काल में सैन्य जीवन में प्रवेश किया, जब भारतीय सेना द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर पुनर्गठन और आधुनिक युद्ध-सिद्धांतों के समावेश के दौर से गुजर रही थी। सैन्य अकादमी से कमीशन प्राप्त करने के बाद उन्होंने इन्फैंट्री-आधारित संरचना में विभिन्न फील्ड और स्टाफ नियुक्तियाँ निभाईं। प्रारंभिक वर्षों में ही उनकी पहचान एक अनुशासित, परिश्रमी और जिम्मेदारी को गंभीरता से लेने वाले अधिकारी के रूप में बनी।
उनका मानना था कि प्रशिक्षण केवल शारीरिक दक्षता तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि मानसिक दृढ़ता, त्वरित निर्णय और टीम-समन्वय भी उतना ही आवश्यक है। यही सोच आगे चलकर उनके नेतृत्व की पहचान बनी।
शौर्य गाथा -22 अक्टूबर सन 1947 को महाराज हरिसिंह ने जब मुजफ्फराबाद पर पाक सेना के कब्जे की खबर सुनी, तो उन्होंने खुद दुश्मन से मोर्चा लेने का फैसला करते हुए सैन्य वर्दी पहनकर ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह को बुलाया। राजेन्द्र सिंह ने महाराजा को मोर्चे से दूर रहने के लिए मनाते हुए खुद दुश्मन का आगे जाकर मुकाबला करने का निर्णय लिया। राजेन्द्र सिंह महाराजा के साथ बैठक के बाद जब बादामी बाग पहुंचे तो वहां 100 के करीब सिपाही मिले। उन्होंने सैन्य मुख्यालय को संपर्क कर अपने लिए अतिरिक्त सैनिक मांगे। मुख्यालय में मौजूद ब्रिगेडियर फकीर सिंह ने उन्हें 70 जवान और भेजने का यकीन दिलाया। इसी दौरान महाराजा ने खुद मुख्यालय में कमान संभालते हुए कैप्टन ज्वाला सिंह को एक लिखित आदेश के संग उड़ी भेजा। इसमें कहा गया था कि ,- "ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह को आदेश दिया जाता है कि वह हर हाल में दुश्मन को आखिरी सांस और आखिरी जवान तक उड़ी के पास ही रोके रखें।"
कैप्टन सिंह 24 अक्टूबर की सुबह एक छोटी सैन्य टुकड़ी के संग उड़ी पहुंचे। उन्होंने सैन्य टुकड़ी ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह को सौंपते हुए महाराजा का आदेश सुनाते हुए खत थमाया। हालात को पूरी तरह से विपरीत और दुश्मन को मजबूत समझते हुए ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने कैप्टन नसीब सिंह को उड़ी नाले पर बने एक पुल को उड़ाने का हुक्म सुनाया, ताकि दुश्मन को रोका जा सके। इससे दुश्मन कुछ देर के लिए रुक गया, लेकिन जल्द ही वहां गोलियों की बौछार शुरू हो गई। करीब दो घंटे बाद दुश्मन ने फिर हमला बोल दिया। दुश्मन की इस चाल को भांपते हुए ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह के आदेश पर कैप्टन ज्वाला सिंह ने सभी पुलों को उड़ा दिया। यह काम शाम साढ़े चार बजे तक समाप्त हो चुका था, लेकिन कई कबाइली पहले ही इस तरफ आ चुके थे।
ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह पर जारी डाक टिकट -इसके बाद ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने रामपुर में दुश्मन को रोकने का फैसला किया और रात को ही वहां पहुंचकर उन्होंने अपने लिए खंदकें खोदीं। रात भर खंदकें खोदने वाले जवानों को सुबह तड़के ही दुश्मन की गोलीबारी झेलनी पड़ी। मोर्चा बंदी इतनी मजबूत थी कि पूरा दिन दुश्मन गोलाबारी करने के बावजूद एक इंच नहीं बढ़ पाया। दुश्मन की एक टुकड़ी ने पीछे से आकर सड़क पर अवरोधक तैयार कर दिए, ताकि महाराज के सिपाहियों को वहां से निकलने का मौका नहीं मिले, ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह को दुश्मन की योजना का पता चल गया और उन्होंने 27 अक्टूबर की सुबह एक बजे अपने सिपाहियों को पीछे हटने और सेरी पुल पर डट जाने को कहा। पहला अवरोधक तो उन्होंने आसानी से हटा लिया, लेकिन बोनियार मंदिर के पास दुश्मन की फायरिंग की चपेट में आकर सिपाहियों के वाहनों का काफिला थम गया। पहले वाहन का चालक दुश्मन की फायरिंग में शहीद हो गया। इस पर कैप्टन ज्वाला सिंह ने अपनी गाड़ी से नीचे आकर जब देखा तो पहले तीनों वाहनों के चालक मारे जा चुके थे। सेरी पुल के पास दुश्मन की गोलियों का जवाब देते हुए वह बुरी तरह जख्मी हो गए। उनकी दाई टांग पूरी तरह जख्मी थी।
उन्होंने उसी समय अपने जवानों को आदेश दिया कि वह पीछे हटें और दुश्मन को रोकें। उन्हें जब सिपाहियों ने उठाने का प्रयास किया तो वह नहीं माने और उन्होंने कहा कि वह उन्हें पुलिया के नीचे आड़ में लिटाएं और वह वहीं से दुश्मन को राकेंगे। 27 अक्टूबर सन 1947 की दोपहर को सेरी पुल के पास ही उन्होंने दुश्मन से लड़ते हुए वीरगति पाई। अलबत्ता, 26 अक्टूबर सन 1947 की शाम को जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को लेकर समझौता हो चुका था और 27 अक्टूबर को जब राजेन्द्र सिंह मातृभूमि की रक्षार्थ बलिदान हुए तो उस समय कर्नल रंजीत राय भारतीय फौज का नेतृत्व करते हुए श्रीनगर एयरपोर्ट पर पहुंच चुके थे। युद्ध विशेषज्ञों का दावा है कि अगर राजेन्द्र सिंह पीछे नहीं हटते तो कबाइली 23 अक्टूबर की रात को ही श्रीनगर में होते। ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने जो फैसला लिया था, वह कोई चालाक और युद्ध रणनीति में माहिर व्यक्ति ही ले सकता था।
नेतृत्व शैली: आदेश नहीं, उदाहरण -ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह का नेतृत्व आदेशात्मक कम और उदाहरणात्मक अधिक था। वे अग्रिम क्षेत्रों का निरीक्षण स्वयं करते, जवानों से संवाद रखते और समस्याओं को कागज़ी रिपोर्ट तक सीमित नहीं रखते थे। उनके अधीनस्थ अधिकारी और सैनिक उन्हें एक ऐसे कमांडर के रूप में याद करते हैं जो कठिन समय में पीछे नहीं हटता था।उनकी नेतृत्व शैली में अनुशासन के साथ मानवीय दृष्टि का समावेश था। वे मानते थे कि सैनिक का आत्मसम्मान उसकी सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए वे निष्पक्षता, पारदर्शिता और समयबद्ध निर्णय पर ज़ोर देते थे।
ब्रिगेडियर के रूप में दायित्व -ब्रिगेडियर के पद पर पहुँचने के बाद उनकी जिम्मेदारियाँ केवल ऑपरेशनल नहीं रहीं, बल्कि युवा अधिकारियों के मार्गदर्शन और प्रशिक्षण तक विस्तृत हुईं। वे अपने युद्ध और फील्ड-अनुभव को संस्थागत ज्ञान में बदलने पर बल देते थे। उनका प्रयास रहता था कि आने वाली पीढ़ी केवल तकनीकी रूप से सक्षम न हो, बल्कि नैतिक रूप से भी दृढ़ हो।
शांति-काल में सेना का चरित्र -ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह का मानना था कि शांति-काल में सेना की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी युद्ध-काल में। प्रशिक्षण, आपदा-प्रबंधन, आंतरिक सुरक्षा सहयोग और नागरिक प्रशासन के साथ समन्वय—इन सभी क्षेत्रों में उन्होंने संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। उनके लिए सेना अनुशासन की पाठशाला थी, जो समाज को भी दिशा देती है।
सेवानिवृत्ति के बाद: समाज के प्रति दायित्व -सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका राष्ट्रधर्म समाप्त नहीं हुआ। वे पूर्व सैनिकों के कल्याण, युवाओं में अनुशासन और नागरिकों में राष्ट्रीय चेतना के प्रसार से जुड़े रहे। उनका स्पष्ट मत था कि यदि समाज और सेना के बीच संवाद सशक्त होगा, तो राष्ट्र स्वतः सशक्त होगा। शिक्षा और सामाजिक मंचों पर वे युवाओं को यह संदेश देते रहे कि राष्ट्रसेवा केवल वर्दी तक सीमित नहीं है। त्वरित लाभ और तात्कालिक लोकप्रियता के दौर में उनका जीवन दीर्घकालिक सोच और राष्ट्रहित की प्राथमिकता का उदाहरण है।
ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि महानता शोर से नहीं, निरंतर सेवा से निर्मित होती है। 1971 जैसे निर्णायक युद्ध-काल से लेकर शांति-कालीन राष्ट्रनिर्माण तक, उन्होंने भारतीय सेना की उस परंपरा को आगे बढ़ाया जिसमें वर्दी में अनुशासन और नेतृत्व में मानवता समान रूप से विद्यमान होती है। उनकी जयंती पर राष्ट्र उन्हें नमन करता है—एक सैनिक, एक नेता और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में।



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