- युगान्तर के पन्नों से अंडमान की कालकोठरी तक—एक अदम्य क्रांतिकारी की कथा
Upgrade Jharkhand News. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल महापुरुषों के नामों से नहीं, बल्कि उन जुझारू व्यक्तित्वों से भी बना है जिन्होंने विचार, संगठन और बलिदान—तीनों को एक साथ साधा। ऐसे ही विरले क्रांतिकारियों में एक नाम है बारीन्द्र कुमार घोष, जिन्हें इतिहास बारिन घोष के नाम से भी जानता है। वे न केवल उग्र क्रांतिकारी आंदोलन के सूत्रधार थे, बल्कि निर्भीक पत्रकार और विचारशील लेखक भी थे। अध्यात्म की ऊँचाइयों तक पहुँचे अरविंद घोष के छोटे भाई होते हुए भी बारीन्द्र कुमार घोष ने अपने लिए संघर्ष और जोखिम से भरा अलग मार्ग चुना।
क्रांतिकारी चेतना का जन्म -5 जनवरी 1880 को लंदन के निकट क्रॉयडन कस्बे में जन्मे बारीन्द्र कुमार घोष ऐसे परिवार से आए, जहाँ बौद्धिकता और राष्ट्रचिंतन सांसों में घुला था। पिता डॉ. कृष्णनाथ घोष एक प्रतिष्ठित चिकित्सक और जिला सर्जन थे, जबकि माता स्वर्णलता देवी समाज-सुधारक और विद्वान राजनारायण बसु की पुत्री थीं। अरविंद घोष जैसे बड़े भाई का सान्निध्य और मनमोहन घोष जैसे विद्वान भाई का साहित्यिक वातावरण—इन सबने बारीन्द्र के व्यक्तित्व को प्रारंभ से ही वैचारिक दृढ़ता प्रदान की।
शिक्षा से शस्त्र तक का सफ़र -देवगढ़ में स्कूली शिक्षा और 1901 में पटना कॉलेज में उच्च अध्ययन के बाद बारीन्द्र कुमार घोष ने बड़ौदा में सैन्य प्रशिक्षण लिया। यहीं उनका संपर्क सक्रिय क्रांतिकारी विचारधारा से हुआ। यह वह दौर था जब बंगाल विभाजन ने युवाओं के भीतर उबाल पैदा कर दिया था। संवैधानिक राजनीति से मोहभंग हो चुका था और आज़ादी के लिए निर्णायक टकराव की सोच जन्म ले रही थी।
‘युगान्तर’ : शब्दों से विद्रोह -1906 में स्वदेशी आंदोलन की पृष्ठभूमि में बारीन्द्र कुमार घोष ने बंगाली साप्ताहिक ‘युगान्तर’ का प्रकाशन आरंभ किया। यह अख़बार ब्रिटिश सत्ता के लिए मात्र समाचार-पत्र नहीं, बल्कि खुली चुनौती था।‘युगान्तर’ ने युवाओं को क्रांति के लिए वैचारिक हथियार दिए। इसके लेखों में अंग्रेज़ी शासन की बर्बरता, दासता के विरुद्ध आह्वान और बलिदान की चेतना मुखर थी।भूपेन्द्रनाथ दत्त जैसे क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर बारीन्द्र कुमार घोष ने बंगाल में उग्र राष्ट्रवाद की वैचारिक नींव रखी।
अनुशीलन समिति -बारीन्द्र कुमार घोष और भूपेन्द्रनाथ दत्त के सहयोग से १९०७ में कलकत्ता में ‘अनुशीलन समिति’ का गठन किया गया, जिसका प्रमुख उद्देश्य था- “खून के बदले खून।” १९०५ के बंगाल विभाजन ने युवाओं को आंदोलित कर दिया था, जो की अनुशीलन समिति की स्थापना के पीछे एक प्रमुख वजह थी। इस समिति का जन्म १९०३ में ही एक व्यायामशाला के रूप में हो गया था और इसकी स्थापना में प्रमथनाथ मित्र और सतीश चन्द्र बोस का प्रमुख योगदान था। एम. एन. राय के सुझाव पर इसका नाम अनुशीलन समिति रखा गया। प्रमथनाथ मित्र इसके अध्यक्ष, चितरंजन दास व अरविन्द घोष इसके उपाध्यक्ष और सुरेन्द्रनाथ ठाकुर इसके कोषाध्यक्ष थे। इसकी कार्यकारिणी की एकमात्र शिष्य सिस्टर निवेदिता थीं। १९०६ में इसका पहला सम्मलेन कलकत्ता में सुबोध मालिक के घर पर हुआ। बारीन्द्र कुमार घोष जैसे लोगों का मानना था की सिर्फ राजनीतिक प्रचार ही काफ़ी नहीं है, नोजवानों को आध्यात्मिक शिक्षा भी दी जानी चाहिए। उन्होंने अनेक जोशीले नोजवानों को तैयार किया जो लोगों को बताते थे कि स्वतंत्रता के लिए लड़ना पावन कर्तव्य है।
ढाका अनुशीलन समिति -कार्य की सहूलियत के लिए अनुशीलन समिति का दूसरा कार्यालय १९०४ में ढाका में खोला गया, जिसका नेतृत्व पुल्लिन बिहारी दास और पी. मित्रा ने किया। ढाका में इसकी लगभग ५०० शाखाएं थीं। इसके अधिकांश सदस्य स्कूल और कॉलेज के छात्र थे। सदस्यों को लाठी, तलवार और बन्दूक चलने का प्रशिक्षण दिया जाता था, हालाँकि बंदूकें आसानी से उपलब्ध नहीं होती थीं। बारीन्द्र कुमार घोष ने १९०५ में क्रांति से सम्बंधित ‘भवानी मंदिर’ नामक पहली किताब लिखी। इसमें ‘आनंद मठ’ का भाव था और क्रांतिकारियों को सन्देश दिया गया था कि वह स्वाधीनता पाने तक संन्न्यासी का जीवन बिताएं।
मणिकतल्ला पार्टी और सशस्त्र संघर्ष -1907 में क्रांतिकारी गतिविधियों को संगठित रूप देने के लिए बारीन्द्र कुमार घोष ने ‘मणिकतल्ला पार्टी’ का गठन किया। यह संगठन गुप्त प्रशिक्षण, बम निर्माण और अंग्रेज़ी सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र कार्रवाइयों का केंद्र बना। मणिकतल्ला बम कांड ने ब्रिटिश सरकार को झकझोर कर रख दिया और यही वह मोड़ था जहाँ बारीन्द्र कुमार घोष सीधे औपनिवेशिक दमन के निशाने पर आ गए।
मृत्यु-दंड से काला पानी तक -1908 में बारीन्द्र कुमार घोष को गिरफ़्तार कर मृत्यु-दंड सुनाया गया। यह समाचार उस समय पूरे देश में हलचल मचा देने वाला था। बाद में उनकी सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया और उन्हें अंडमान की कुख्यात सेल्युलर जेल भेज दिया गया।दस वर्षों तक उन्होंने अमानवीय यातनाएँ सहीं। काला पानी का यह कालखंड उनके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा थी, लेकिन यही समय उन्हें भीतर से और अधिक दृढ़ तथा चिंतनशील बनाता गया।क्रांति के बाद की कलम कारावास से मुक्ति के बाद बारीन्द्र कुमार घोष ने सशस्त्र संघर्ष से दूरी बनाते हुए पत्रकारिता को अपना माध्यम बनाया। वे बंगाली दैनिक ‘वसुमित्र’ और अंग्रेज़ी अख़बार ‘द स्टेट्समैन’ से जुड़े।उनके लेखों में अब केवल आक्रोश नहीं, बल्कि अनुभव से उपजा विवेक, आत्मालोचन और राष्ट्रनिर्माण की चिंता दिखाई देती है। वे उन क्रांतिकारियों में शामिल थे जिन्होंने यह समझा कि स्वतंत्रता के बाद भी वैचारिक जागरूकता आवश्यक है।
बारीन्द्र कुमार घोष का जीवन यह सिखाता है कि स्वतंत्रता संग्राम केवल बंदूक और बम की कहानी नहीं है। यह विचार, संगठन, त्याग और समय के साथ आत्मपरिवर्तन की भी गाथा है। वे क्रांति की प्रयोगशाला से निकले ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने अंततः पत्रकारिता की पाठशाला में राष्ट्र को चेतना दी। आज जब हम बारीन्द्र कुमार घोष की जयंती मना रहे हैं, तब उनका जीवन हमें यह याद दिलाता है कि आज़ादी साहस से मिलती है, लेकिन उसे बचाए रखने के लिए विवेक और विचार चाहिए। क्रांतिकारी भी, चिंतक भी—यही बारीन्द्र कुमार घोष की असली पहचान है।

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