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Jamshedpur महाराणा प्रताप: स्वाभिमान और वीरता के अमर प्रतीक Maharana Pratap: An immortal symbol of self-respect and valor

 


Upgrade Jharkhand News. उदयपुर, राजस्थान — भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल पन्नों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं। महाराणा प्रताप सिंह ऐसा ही एक नाम है, जो आज भी करोड़ों भारतीयों के दिलों में वीरता, स्वाभिमान और देशभक्ति की मिसाल के रूप में जीवित है। 9 मई 1540 को राजस्थान के कुम्भलगढ़ दुर्ग में जन्मे महाराणा प्रताप मेवाड़ के शिशोदिया वंश के 13वें शासक थे। उनके पिता महाराणा उदय सिंह द्वितीय ने उदयपुर शहर की स्थापना की थी और माता जयवंता बाई एक साहसी और धार्मिक महिला थीं।


बचपन से ही प्रताप में राजपूती वीरता और स्वाभिमान के गुण दिखाई देने लगे थे। युवावस्था में ही उन्हें युद्ध कौशल, घुड़सवारी, तलवारबाजी और शासन की बारीकियों में प्रशिक्षित किया गया। उनका व्यक्तित्व साहसी, दृढ़निश्चयी और अत्यंत स्वाभिमानी था। 1572 में पिता की मृत्यु के बाद कुछ पारिवारिक विवादों के बावजूद प्रताप मेवाड़ के महाराणा बने। उस समय भारत में मुगल सम्राट अकबर का शासन था, जो पूरे देश को अपने अधीन करने की योजना बना रहा था।


अकबर ने कई राजपूत राजाओं को संधि और वैवाहिक संबंधों के माध्यम से अपने साथ मिला लिया था। उसने महाराणा प्रताप को भी अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए कई बार संदेश भेजे, लेकिन महाराणा ने हर बार मना कर दिया। प्रताप के लिए मेवाड़ की स्वतंत्रता और स्वाभिमान से बढ़कर कुछ नहीं था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे मुगलों की अधीनता स्वीकार करने की बजाय जंगलों में रहना पसंद करेंगे। यह दृढ़ संकल्प ही उनकी महानता का आधार बन गया।


18 जून 1576 को राजस्थान के राजसमंद जिले में हल्दीघाटी नामक स्थान पर भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण युद्ध हुआ। एक ओर थी अकबर की विशाल मुगल सेना, जिसका नेतृत्व मान सिंह कर रहे थे, और दूसरी ओर महाराणा प्रताप की अपेक्षाकृत छोटी सेना। इस युद्ध में महाराणा प्रताप के प्रिय घोड़े चेतक ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया। कहा जाता है कि चेतक ने घायल होने के बावजूद महाराणा को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया और फिर वीरगति को प्राप्त हुआ। आज भी चेतक की समाधि हल्दीघाटी में स्थित है और यह स्थान पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है।


युद्ध का परिणाम निर्णायक नहीं रहा, लेकिन महाराणा प्रताप ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी। इस युद्ध ने यह साबित कर दिया कि साहस और दृढ़ संकल्प के आगे विशाल सेना भी कुछ नहीं कर सकती। हल्दीघाटी के बाद महाराणा प्रताप को अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उन्हें अपने परिवार के साथ जंगलों में रहना पड़ा, घास की रोटियां खानी पड़ीं। एक प्रसिद्ध घटना के अनुसार, एक दिन उनकी पुत्री के हाथ से एक जंगली बिल्ली घास की रोटी छीन ले गई। यह दृश्य देखकर महाराणा का हृदय पीड़ा से भर गया, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।


इसी कठिन समय में उनके मित्र भामाशाह ने अपनी संपूर्ण संपत्ति महाराणा को समर्पित कर दी, जिससे उन्हें फिर से सेना खड़ी करने का अवसर मिला। भामाशाह की यह देशभक्ति भी इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखी गई है। इस सहायता से महाराणा ने नया जोश और उत्साह पाया और पुनः संघर्ष के लिए तैयार हो गए। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में महाराणा प्रताप ने धीरे-धीरे अपने खोए हुए क्षेत्रों को वापस जीतना शुरू कर दिया। उन्होंने चावंड को अपनी नई राजधानी बनाया और वहां से अपने राज्य का संचालन किया।


19 जनवरी 1597 को 56 वर्ष की आयु में चावंड में उनका निधन हो गया। मृत्यु के समय भी उनका सिर मुगलों के आगे कभी नहीं झुका था। महाराणा प्रताप ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि स्वाभिमान और स्वतंत्रता से बढ़कर कुछ नहीं है। उन्होंने साबित किया कि बड़ी से बड़ी कठिनाइयों के बावजूद अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना ही सच्ची वीरता है। आज जब देश आजादी के अमृत महोत्सव का जश्न मना रहा है, महाराणा प्रताप जैसे स्वतंत्रता प्रेमी वीरों की याद और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।


उनका जीवन हमें सिखाता है कि कठिनाइयां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अपने आत्मसम्मान और मूल्यों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए। राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार द्वारा महाराणा प्रताप की स्मृति में कई स्मारक और संग्रहालय बनाए गए हैं। उदयपुर में उनकी विशाल प्रतिमा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है और हर वर्ष उनकी जयंती पर पूरे देश में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। महाराणा प्रताप केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि भारतीय स्वाभिमान और वीरता के जीवंत प्रतीक हैं। उनकी कहानी आज भी लाखों युवाओं को प्रेरणा देती है और देशभक्ति की भावना जगाती है।



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