Upgrade Jharkhand News. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के इतिहास में पंडित सम्पूर्णानंद का नाम अत्यंत आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। वे ऐसे विरल व्यक्तित्व थे जिनके जीवन में विद्वत्ता, नैतिकता और सार्वजनिक सेवा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। 1 जनवरी 1891 को जन्मे सम्पूर्णानंद ने भारतीय संस्कृति की आत्मा को राजनीति और प्रशासन से जोड़ने का सतत प्रयास किया।
संघर्ष और साधना से निर्मित व्यक्तित्व-पंडित सम्पूर्णानंद का जन्म एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ। प्रारंभ से ही वे अध्ययनशील, अनुशासित और आत्मचिंतनशील प्रवृत्ति के थे। संस्कृत, दर्शन, भारतीय इतिहास और साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। काशी उनकी साधना-स्थली रही, जहाँ से उनके जीवन-दर्शन को वैचारिक दिशा मिली।
स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका-सम्पूर्णानंद केवल विद्वान ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय सेनानी भी थे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने सत्य, अहिंसा और नैतिक साहस को जीवन का मूल मंत्र बनाया।ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलनों में भाग लेने के कारण उन्हें कारावास भी झेलना पड़ा, किंतु इससे उनके संकल्प और अधिक दृढ़ हुए।
शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण का आधार-उनका दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा के बिना सशक्त राष्ट्र की कल्पना अधूरी है। वे काशी विद्यापीठ के कुलपति रहे और भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी और संस्कृत, को शिक्षा का माध्यम बनाने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि विदेशी मानसिक गुलामी से मुक्ति तभी संभव है जब शिक्षा भारतीय संस्कृति और मूल्यों से जुड़ी हो।
मुख्यमंत्री के रूप में योगदान-1954 से 1960 तक पंडित सम्पूर्णानंद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उनके कार्यकाल में शिक्षा, भाषा और संस्कृति को विशेष प्राथमिकता दी गई। उन्होंने प्रशासन में सादगी, ईमानदारी और नैतिकता को स्थापित करने का प्रयास किया। वे सत्ता को साधन मानते थे, साध्य नहीं।राज्यपाल और राष्ट्रदृष्टि मुख्यमंत्री पद के बाद वे राजस्थान के राज्यपाल नियुक्त हुए। इस दायित्व में भी उन्होंने संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक समरसता को सर्वोपरि रखा। वे सत्ता के शिखर पर रहते हुए भी स्वयं को एक सेवक और शिक्षक ही मानते रहे।
विचारक और लेखक-सम्पूर्णानंद एक प्रखर लेखक और विचारक थे। भारतीय दर्शन, संस्कृति और राष्ट्रवाद पर उनके लेख आज भी प्रासंगिक हैं। वे पश्चिमी भौतिकवाद के अंधानुकरण के विरोधी थे और भारतीय जीवन-मूल्यों की पुनर्स्थापना के पक्षधर थे।
प्रेरणादायी विरासत-10 जनवरी 1969 को उनका निधन हुआ, किंतु उनके विचार आज भी जीवित हैं। पंडित सम्पूर्णानंद हमें सिखाते हैं कि राजनीति सेवा का माध्यम होनी चाहिए, सत्ता का नहीं, और शिक्षा केवल रोजगार नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण का साधन है।
जयंती पर संकल्प-उनकी जयंती पर यह आवश्यक है कि हम उनके आदर्शों—सादगी, सत्यनिष्ठा, सांस्कृतिक स्वाभिमान और राष्ट्रसेवा—को आत्मसात करें। पंडित सम्पूर्णानंद का जीवन आज के भारत के लिए भी दिशासूचक दीपस्तंभ है।


No comments:
Post a Comment