Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

Bhopal भगवान शिव की विराट दिव्यता का महापर्व महाशिवरात्रि Mahashivratri, the grand festival of the immense divinity of Lord Shiva

 


Upgrade Jharkhand News. देवों के देव भगवान भोलेनाथ के भक्तों के लिये श्री महाशिवरात्रि का व्रत विशेष महत्व रखता है। यह पर्व फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन का व्रत रखने से भगवान भोले नाथ शीघ्र प्रसन्न हों, उपासक की मनोकामना पूरी करते हैं। इस व्रत को सभी स्त्री-पुरुष, बच्चे, युवा, वृद्धों के द्वारा किया जा सकता हैं। महाशिवरात्रि के विषय में मान्यता है कि इस दिन भगवान भोलेनाथ का अंश प्रत्येक शिवलिंग में पूरे दिन और रात मौजूद रहता है। इस दिन शिव जी की उपासना और पूजा करने से शिव जी जल्दी प्रसत्र होते हैं। वर्ष में 365 दिन होते हैं और लगभग इतनी ही रात्रियों भी। इनमें से कुछ चुनिंदा रात्रियां ऐसी होती हैं जिनका विशेष महत्व होता है। उन चुनिंदा रात्रियों में से महाशिवरात्रि ऐसी रात्रि है जिसका महत्व सबसे अधिक है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखकर  शिवपूजन, शिव कथा, शिव स्तोत्रों का पाठ व ॐ नमः शिवाय का पाठ करते हुए रात्रि जागरण करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता हैं। व्रत के दूसरे दिन ब्राह्मणों को यथाशक्ति वस्त्र सहित भोजन, दक्षिणादि प्रदान करके संतुष्ट किया जाता हैं।


इस दिन व्रती को फल, पुष्प, चंदन, बिल्वपत्र, धतूरा, धूप, दीप और नैवेद्य से चारों प्रहर की पूजा करनी चाहिए। दूध, दही, घी, शहद और शकर से अलग-अलग तथा सबको एक साथ मिलाकर पंचामृत से शिव को स्रान कराकर जल से अभिषेक करें। चारों प्रहर के पूजन में शिव पंचाक्षर (ओम् नमः शिवाय) मंत्र का जप करें। भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान, भीम और ईशान, इन आठ नामों से पुष्प अर्पित कर भगवान की आरती और परिक्रमा करें।  प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मास शिवरात्रि कहा जाता है। इन शिवरात्रियों में सबसे प्रमुख है फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी जिसे महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि महाशिवरात्रि की रात में देवी पार्वती और भगवान भोलेनाथ का विवाह हुआ था इसलिए यह शिवरात्रि वर्ष भर की शिवरात्रियों से उत्तम है।महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है।  इसे हर साल फाल्गुन माह में 13वीं रात या 14वें दिन मनाया जाता है। इस त्योहार में श्रद्धालु पूरी रात जागकर भगवान शिव की आराधना में भजन गाते हैं। कुछ लोग पूरे दिन और रात उपवास भी करते हैं। शिवलिंग को जल और बेलपत्र चढ़ाने के बाद ही वे अपना उपवास तोड़ते हैं।


शिवजी स्वयं कहते हैं कि 'मैं बड़े-बड़े तपों से, बड़े-बड़े यज्ञों से, बड़े-बड़े दानों से, बड़े-बड़े व्रतों से इतना संतुष्ट नहीं होता हूँ जितना शिवरात्रि के दिन उपवास करने से होता हूँ।' इस रात्रि से शंकर जी का विशेष स्नेह होने का एक कारण यह भी माना जाता है कि भगवान शंकर संहारकर्ता होने के कारण तमोगुण के अधिष्ठाता यानी स्वामी हैं। रात्रि  जीवों की चेतना को छीन लेती है और जीव निद्रा देवी की गोद में सोने चला जा जाता है इसलिए रात को तमोगुणमयी कहा गया है। यही कारण है कि तमोगुण के स्वामी देवता भगवान शंकर की पूजा रात्रि में विशेष फलदायी मानी जाती है। इस पर्व के बारे में ऐसा भी माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान शंकर का रौद्र रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्माण्ड को अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं। इसलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा जाता है। शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री संपत्ति प्रदान करते हैं। शिवरात्रि को शिव की पूजा करने के लिए शिव मंदिरों पर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। भगवान शिव का निवास स्थान कैलाश पर्वत माना जाता है, लेकिन शिव समस्त जगत् में विचरण करते रहते हैं। अगर वे कैलाश पर्वत पर विचरण करते हैं, तो श्मशान में भी धूनी रमाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि शिवरात्रि को शिव संपूर्ण जगत् में विचरण करते हैं।


शिवरात्रि के दिन शिव का दर्शन करने से हजारों जन्मों का पाप मिट जाता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह महाशिवरात्रि के पर्व का महत्व ही है कि सभी आयु वर्ग के लोग इस पर्व में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। इस दिन शिवभक्त काँवड़ में गंगाजी का जल भरकर शिवजी को जल चढ़ाते हैं और उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन कुंवारी कन्याएँ अच्छे वर के लिए  शिव जी की पूजा करती हैं। शिव को नीलकंठ भी कहा जाता है। वे ऐसे देवता हैं जो विष स्वयं ग्रहण कर लेते हैं और अमृत दूसरों के लिए छोड़ देते हैं। इसलिए शिव जगत् के उद्धारक हैं।  इस तरह शास्त्र और  पुराण कहते हैं कि महाशिवरात्रि की इस रात का सृष्टि में बड़ा महत्व है। शिवरात्रि को रात का विशेष महत्व  होने की वजह से ही शिवालयों में रात  के समय शिव जी की विशेष पूजा अर्चना होती है। वास्तव में महाशिवरात्रि का पर्व स्वयं परमपिता परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की याद दिलाता है। महाशिवरात्रि के दिन व्रत धारण करने से सभी पापों का नाश होता है और  मनुष्य की हिंसक प्रवृत्ति भी नियंत्रित होती है। निरीह लोगों के प्रति दयाभाव उपजता है। ईशान संहिता में इसकी महत्ता का उल्लेख इस प्रकार है-

शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापं प्रणाशन्

चाण्डाल मनुष्याणं भुक्ति मुक्ति प्रदायक


कृष्ण चतुर्दशी के दिन इस पर्व का महत्व इसलिए अधिक फलदायी हो जाता है क्योंकि चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। ज्योतिष की दृष्टि से भी महाशिवरात्रि की रात्रि का बड़ा महत्व है। भगवान शिव के सिर पर चन्द्रमा विराजमान रहता है। चन्द्रमा को मन का कारक कहा गया है। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात में चन्द्रमा की शक्ति लगभग पूरी तरह क्षीण हो जाती है। जिससे तामसिक शक्तियां व्यक्ति के मन पर अधिकार करने लगती हैं जिससे पाप प्रभाव बढ़ जाता है। भगवान शंकर की पूजा से मानसिक बल प्राप्त होता है जिससे आसुरी और तामसिक शक्तियों के प्रभाव से बचाव होता है। शिवरात्रि को 'अहोरात्रि' भी कहते हैं। महिलाओं के लिए शिवरात्रि का विशेष महत्व है। अविवाहित महिलाएं भगवान शिव से प्रार्थना करती हैं कि उन्हें उनके जैसा ही पति मिले। वहीं विवाहित महिलाएं अपने पति और परिवार के लिए मंगल कामना करती हैं। यह भगवान शिव की विराट दिव्यता का महापर्व है।शिवरात्रि के साथ कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। शिवरात्रि के महत्व को जानने के लिए हमें इन पौराणिक कथाओं को जानना होगा। एक मान्यता यह भी है कि फाल्गुन माह का 14वां दिन भगवान शिव का प्रिय दिन है। इसलिए महाशिवरात्रि को इसी दिन मनाया जाता है।


समुद्र मंथन की पौराणिक कथा- सभी पौराणिक कथाओं में नीलकंठ शिव की कहानी सबसे ज्यादा चर्चित है। ऐसी मान्यता है कि महाशिवरात्रि के दिन ही समुद्र मंथन के दौरान कालकेतु विष निकला था। भगवान शिव ने संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा के लिए स्वयं ही सारा विष पी लिया था। इससे उनका गला नीला पड़ गया और उन्हें नीलकंठ के नाम से जाना गया। महिलाओं के लिए महत्व- ऐसा माना जाता है जब कोई महिला भगवान शिव से प्रार्थना करती है तो भगवान शिव उनकी प्रार्थना को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। भगवान शिव को पूजा में किसी विशेष सामग्री की जरूरत नहीं पड़‌ती है। सिर्फ पानी और बेलपत्र के जरिए भी श्रद्धालु भगवान शिव को प्रसत्र कर सकते हैं।


शिव के संग गौरी की भी हो पूजा -  धार्मिक मान्यतानुसार भगवान शंकर इस दिन संपूर्ण शिवलिंगों में प्रवेश करते हैं। शिव मनुष्य जीवन में सुख संपत्ति, ऋद्धि-सिद्धि, बल-वैभव, स्वास्थ्य, निरोगता, दीर्घायु, लौकिक-पारलौकिक सभी शुभ फलों के दाता हैं। शक्ति का हर रूप शिव के साथ ही निहित है। इसलिए महाशिवरात्रि पर शिव और शक्ति की संयुक्त रूप से आराधना करनी चाहिए। शिवरात्रि को आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने के लिए शिव और शक्ति का योग भी कहा गया है।


सुहागिनों के भी आराध्य हैं शिव -महाशिवरात्रि का पावन दिन सभी कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर और विवाहित महिलाओं को अखंड सुहाग का वरदान दिलाने वाला सुअवसर प्रदान करता है। अगर विवाह में कोई बाधा आ रही हो, तो भगवान शिव और जगत जननी के विवाह दिवस यानी महाशिवरात्रि पर इनकी पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं। शिवरात्रि के दिन मंत्र जाप से भोले भंडारी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। शिवरात्रि के दिन रुद्राक्ष की माला से जप करना चाहिए। जाप पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। जप के पूर्व शिवजी को बिल्वपत्र अर्पित करना चाहिए। शिव को पंचामृत से अभिषेक कराते हुए  मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए।   भीड़भाड़ में या यदि मंदिर में नहीं गये तो ऐसे में घर पर ही ॐ नमः शिवाय जप करें। मानसिक यानि मन से की हुई पूजा षोडशोपचार की पूजा से दस गुना ज्यादा हितकारी और अधिक फलदायक होती है। अंजनी सक्सेना



No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU

-ADVERTISEMENT-

.