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Bhopal दृष्टिकोण - अंजाम-ए- गुलिस्ताँ क्या होगा ? Perspective - What will be the end of Gulistan?

 


Upgrade Jharkhand News. बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफी था, हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए गुलिस्ताँ क्या होगा ? कम शब्दों में बड़ी बात कहने का हुनर साहित्यकार की विशेषता है। उल्लू को विनाश का प्रतीक बताया जाता है, यह सच है या झूठ, कहना मुश्किल है। फिर भी देश की वर्तमान स्थिति का यदि विश्लेषण किया जाए, तो लगता है कि जिन पर देश को विश्वास था, कि वे राष्ट्रहित में समर्पित रहकर राष्ट्र को सर्वोपरि मानते हुए आचरण करेंगे, वही अपनी संकीर्ण राजनीति के चलते देश को बर्बाद करने पर तुले हैं।          यदि ऐसा न होता, तो शीर्ष सदन में मुद्दों से हटकर बहस नहीं होती। मुद्दा बजट सत्र में बजट की कमियों और अच्छाइयों के विश्लेषण की जगह अप्रमाणिक बातों से सदन का समय बर्बाद करने का दुस्साहस न किया जाता। देश में सामाजिक समरसता बनाए रखने हेतु जहाँ अलगाव के प्रतीक प्रावधानों का सामूहिक रूप से विरोध होना चाहिए था, वहां सियासी तत्व अलगावी प्रावधानों के विरुद्ध चुप्पी साधने हेतु विवश हैं। शीर्ष सदन में बात बात पर विरोध करने वाले सियासत के दिग्गज सबका साथ सबका विकास जैसी अवधारणा पर कुछ भी सकारात्मक बोलने से कतरा रहे हैं। ऐसा लगता है, कि जैसे आम आदमी की समस्याओं से पक्ष विपक्ष के किसी भी नेता को कोई सरोकार नहीं है। 


देश को कभी साम्प्रदायिकता की प्रयोगशाला बना दिया जाता है, कभी जातीय विघटनकारी प्रयोगशाला। जिनके पास सत्ता है, वे सत्ता मद में इतने मस्त हैं, कि उन्हें सबका साथ सबका विकास का नारा तो याद रहता है, लेकिन नारे को धरती पर उतारने का उनके पास कोई विमर्श नहीं है। नेता विपक्ष के नाम पर ऐसे व्यक्ति को सदन में अनाप शनाप बोलने की छूट मिली है, जो कभी किसी सिद्धांत पर टिका हुआ प्रतीत नहीं होता। गंभीर मुद्दों पर भी नेता विपक्ष कुछ नहीं बोलते। बहरहाल स्थिति विस्फोटक है। जातीय विघटनकारी शक्तियां देश में केवल नफरत बोने का कार्य कर रही हैं। तर्कसंगत विरोध या समर्थन का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं रह गया है। ऐसे में प्रश्न उत्पन्न होता है, कि क्या देश में संवैधानिक संस्थाओं के प्रति विघटनकारी तत्वों के हृदय में कोई स्थान शेष नहीं है। क्या सदन की मर्यादा सियासी तत्वों के लिए कोई मायने नहीं रखती ? क्या समाज में अलगाव को बढ़ावा देने वाले प्रावधानों की पुनर्समीक्षा नहीं होनी चाहिए ? विषय गंभीर है, कि देश बड़ा है या लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर मुद्दे से हटकर सदन के समय की बर्बादी करने जैसे कृत्य का समर्थन ? डॉ. सुधाकर आशावादी



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