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Bhopal व्यंग्य -आँख मिलाने का चैलेंज Satire - Eye contact challenge

 


Upgrade Jharkhand News. कभी अंखियों ही अंखियों में बात होकर बात इतनी आगे बढ़ जाती थी, कि एक दूसरे के बिना जीने की कल्पना भी नहीं की जाती थी। इसका मतलब यह हुआ कि आंखें बोलती बतियाती हैं। किशोरावस्था से लेकर युवावस्था तक पहला प्रेम निमंत्रण आँखें ही देती हैं। अब आँखें दिखाने का दौर आ गया है। लोग बात बात पर आंखें दिखाते हैं। उनकी आँखों से लोग डरते हैं , इतना डरते हैं कि कोई आँख मिलाने की हिम्मत नहीं करता। डर कर भाग जाता है। यानि आँखें दहशत का पर्याय बन गई है। लोग आँखों से आँख मिलाने का चैलेंज देने लगे हैं। कहते हैं कि कोई उनकी आँख से आँख मिलाने की हिम्मत नहीं कर सकता। वास्तव में आँख में आँख डालकर बात करने की हिम्मत हर किसी में नहीं होती। अपने एक मित्र हैं, उन्हें अपनी आँखों की दबंगई पर इतना भरोसा है, जितना अपनी बुद्धिमत्ता पर भी नहीं है। उनसे कोई सवाल पूरब के बारे में पूछो तो वे जवाब पश्चिम का देते हैं। सवाल अर्थव्यवस्था के बारे में पूछो, तो जवाब में जूडो कराटे की ट्रेनिंग की बात करने लगते हैं। उन्हें प्रचार बहुत पसंद है। प्रचार के लिए कभी तालाब की कीचड़ में छलांग लगा देते हैं, कभी सभ्य जनों की सभा में अपनी एक आँख दबा देते हैं। बहरहाल उनकी आंखें भी बोलती हैं और जुबान भी, मगर विषय के अनुरूप नहीं। सभ्य परिवार की गरिमा के अनुकूल नहीं। एक दिन कहने लगे कि कोई मेरी आँख में आँख डालकर बात नहीं कर सकता। 


मैंने पूछा - इसका कारण क्या हो सकता है ? वह बोले - यही कारण है कि मैं इतना सच्चा हूँ, कि कोई झूठा मेरे सच से सामने टिक नहीं सकता। मैंने कहा - ऐसा भी तो हो सकता है, कि आपकी आँख में इंफेक्शन हो, कोई आपसे इसलिए आँख न मिलाता हो, कि कहीं उनकी आँखें भी इंफेक्शन का शिकार न हो जाएं। वह भला कब चुप बैठने वाले थे, सो बोले - नहीं यह बात नहीं है। मुझसे सब डरते हैं, इसलिए आँख मिलाने की हिम्मत नहीं करते।        मैंने कहा - मित्र ... यदि इंफेक्शन का डर नहीं तो कोई अन्य डर भी हो सकता है। वह बोले - मुझे पता है कि लोग मुझसे भी डरते हैं और ,मेरे बोलने से भी। मैंने कहा - ऐसा भी तो हो सकता है कि लोग तुमसे नहीं तुम्हारी हरकतों से डरते हों ? वह बोले - मतलब ? मैंने कहा - हो सकता है कि लोग तुमसे न डरते हों, बस यह सोचकर बात न करते हों, कि तुम्हारे मुँह लगकर क्यों अपना समय बर्बाद करें। वह बोले - यह गलत है, मैं किसी से नहीं डरता, मैंने जूडो कराटे सीखा है, मुझे पता है कि सामने वाले पर ग्रिप कैसे बनाई जाती है। मैंने कहा - यही तो मैं कह रहा हूँ, कि तुमसे बात कुछ की जाती है, तुम जवाब कुछ और देते हो। 


वह बोले - यही तो मेरी खासियत है। मैंने कहा - यह खासियत नहीं है। तुम्हारे ऐसे क्रियाकलापों से कोई तुम्हें मंदबुद्धि समझता है तो कोई पागल। वह आवेश में आ गए और बोले - कोई कुछ भी समझे, मैं किसी से नहीं डरता, मुखिया से भी नहीं। मैं मुखिया को चैलेंज करता हूँ कि हिम्मत हो तो मुझसे बहस करे, मुझसे आँख में आँख डालकर बात करे। मैंने कहा - तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता, तुम्हारे सामने कोई टिक नहीं सकता। वह बोले - मैं भी तो यही कह रहा हूँ। अच्छा टाटा .... बाय बाय ... फिनिश। सुधाकर आशावादी



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