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Jamshedpur स्मृति-आह्वान: गुरबख्श सिंह ढिल्लों — साहस, स्वाभिमान और आज़ादी का प्रण Invocation: Gurbaksh Singh Dhillon – A Pledge of Courage, Self-Respect, and Freedom

 


Upgrade Jharkhand News. इतिहास केवल तिथियों और घटनाओं का क्रम नहीं होता; वह उन व्यक्तित्वों की जीवंत स्मृति भी है, जिनके संकल्प ने समय की धारा मोड़ी। गुरबख्श सिंह ढिल्लों ऐसे ही सेनानायक थे—आज़ाद हिंद फ़ौज के निर्भीक कर्नल, जिनका जीवन आज भी हमें स्वतंत्रता के अर्थ और उसकी जिम्मेदारी का बोध कराता है। उनका स्मरण किसी औपचारिक श्रद्धांजलि से अधिक, एक आह्वान है—देश, समाज और स्वयं के प्रति कर्तव्य निभाने का। ढिल्लों उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने गुलामी को नियति नहीं माना। 18 मार्च 1914 को जन्मे ढिल्लों ने ब्रिटिश भारतीय सेना में प्रशिक्षण पाया, पर शीघ्र ही यह समझ लिया कि विदेशी सत्ता की सेवा करते हुए स्वराज का सपना अधूरा रहेगा। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन किया, तो ढिल्लों ने सुरक्षित रास्ते छोड़कर जोखिम का मार्ग चुना। यह निर्णय केवल सैन्य नहीं था—यह आत्मसम्मान का उद्घोष था।


INA में कर्नल के रूप में ढिल्लों का नेतृत्व रणभूमि तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सैनिकों के मन में यह विश्वास रोपा कि आज़ादी किसी और से मिलने वाला उपहार नहीं, बल्कि अपने संकल्प से अर्जित अधिकार है। मलाया और बर्मा के मोर्चों पर उन्होंने अनुशासन, साहस और संगठन की मिसाल पेश की। उनके लिए युद्ध केवल भौगोलिक सीमाओं की लड़ाई नहीं थी; यह भय, दासता और हीनता के विरुद्ध संघर्ष था। लाल क़िला मुक़दमा गुरबख्श सिंह ढिल्लों के जीवन का वह अध्याय है जिसने पूरे देश की चेतना को झकझोर दिया। कर्नल प्रेम सहगल और कर्नल शाहनवाज़ ख़ान के साथ उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया। पर अदालत में ढिल्लों के शब्दों में कोई पश्चाताप नहीं था—केवल गर्व था कि उन्होंने मातृभूमि के लिए खड़े होने का साहस किया। यह मुक़दमा न्यायालय की दीवारों से बाहर निकलकर जनआंदोलन बन गया। सड़कों पर गूंजती आवाज़ें, सैनिकों के पक्ष में उठता जनसमर्थन—इन सबने ब्रिटिश शासन की नैतिक वैधता को गहरी चोट पहुंचाई। इतिहास साक्षी है कि INA और लाल क़िला मुक़दमे ने स्वतंत्रता की प्रक्रिया को निर्णायक गति दी।


स्वतंत्रता के बाद ढिल्लों ने शोर-शराबे से दूर, सादगीपूर्ण जीवन चुना। न पद की आकांक्षा, न यश की चाह—उनकी पूंजी थी स्मृति और संदेश। वे युवाओं से कहते थे कि आज़ादी का अर्थ केवल झंडा फहराना नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण करना है। अनुशासन, ईमानदारी और राष्ट्रहित—यही स्वतंत्र नागरिक के असली अलंकार हैं।आज, जब हम तेज़ी से बदलती दुनिया में खड़े हैं, गुरबख्श सिंह ढिल्लों की स्मृति हमें आईना दिखाती है। क्या हम अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी उतनी ही गंभीरता से लेते हैं? क्या हमारा राष्ट्रप्रेम केवल उत्सवों तक सीमित है, या वह रोज़मर्रा के आचरण में भी दिखाई देता है? ढिल्लों का जीवन कहता है—राष्ट्रभक्ति भाषणों में नहीं, निर्णयों में प्रकट होती है।


यह स्मृति-आह्वान नई पीढ़ी से आग्रह करता है कि वे इतिहास को केवल पाठ्यक्रम न बनाएं, बल्कि प्रेरणा बनाएं। आज़ाद हिंद फ़ौज का साहस हमें बताता है कि एकजुटता में अपार शक्ति होती है। लाल क़िला मुक़दमा सिखाता है कि सत्य और साहस, सत्ता से बड़े होते हैं। और ढिल्लों का उत्तर-स्वतंत्रता जीवन यह याद दिलाता है कि सच्चा नायक वही है जो जीत के बाद भी विनम्र रहे। गुरबख्श सिंह ढिल्लों की स्मृति में हमारा प्रण हो—हम स्वतंत्रता को केवल स्मरण नहीं करेंगे, उसे जिएँगे। अपने काम में ईमानदारी, समाज में संवेदनशीलता और राष्ट्र के प्रति निष्ठा—यही उनकी सबसे सच्ची श्रद्धांजलि है। क्योंकि जिनका जीवन स्वयं एक आह्वान हो, उन्हें याद करना नहीं, अनुसरण करना चाहिए।



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