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Bhopal सामाजिक सद्भाव को खतरे में डालती विघटनकारी शक्तियां Disruptive forces endangering social harmony

 


Upgrade Jharkhand News. सब है पीतल यहाँ, कोई कंचन नहीं, धूल ही धूल है, आज चंदन नहीं, देश की सबको चिंता बहुत है मगर, पर दिशा कुछ नहीं, कोई चिंतन नहीं। आज देश उस मुहाने पर खड़ा है, जहाँ अलगाववादी तत्व अपने मंसूबों से देश में अराजकता का वातावरण बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं। राजनीतिक दल अपना अस्तित्व बचाने के लिए अराजकता को प्रोत्साहन दे रहे हैं। उन्हें जन समस्याओं के निस्तारण और जन आकांक्षाओं की पूर्ति से कोई सरोकार नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जगह जगह आयोजित किए जाने वाले धरना प्रदर्शनों के लिए किराये के प्रदर्शनकारी जुटाने का चलन बढ़ गया है। गरीब मजदूरों के हाथ में विरोध पट्टिकाएं थमाकर यह तक नहीं बताया जाता कि विरोध प्रदर्शन किस कारण किया जा रहा है। बहरहाल यह तस्वीर का एक पहलू है। दूसरा पहलू यह भी है कि राजनीति में दोमुंहे साँपों की संख्या बढ़ रही है। धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करने वाले,स्वार्थ को सर्वोपरि मानते हुए, जातीय और धार्मिक गठजोड़ की संभावना तलाशते हुए अपने मतलब के विमर्श गढ़ते हैं। जहाँ इन्हें अपना स्वार्थ सिद्ध होता हुआ दिखाई देता है, वहीं ये दोमुंहे सांप राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए दौड़ जाते हैं, जहाँ इन्हें लगता है कि घटना इनके राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने में सहायक नहीं हो सकती, वहां से ऐसे तत्व दूरी बना लेते हैं।


विडंबना है कि स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालयों से लेकर सामाजिक क्षेत्रों में हर छोटी बड़ी घटना को जातीय रंग देकर जिस प्रकार से सामाजिक सद्भाव में सेंध लगाईं जा रही है तथा ऐसे तत्वों के विरुद्ध समुचित दंडात्मक कार्यवाही नहीं की जा रही है, उससे लगता है, कि या तो संवैधानिक न्याय में कोई कमी है या कार्यपालिका लापरवाह है, जो अराजकता फ़ैलाने वाले तत्वों के प्रति नतमस्तक है। सर्वविदित है, कि आम आदमी को जातीय संकीर्णता से कोई सरोकार नहीं है। मंदिर,मस्जिद,गुरूद्वारे या गिरजाघर के प्रति यदि विशेष सम्मान नहीं है, तो धर्म स्थलों एवं किसी भी पूजा पद्धति से आम आदमी का विरोध भी नहीं है। फिर भी समाज में ऐसे तत्वों का बोलबाला है, जो प्रत्येक घटना में जाति और धर्म ढूँढ़कर नागरिकों को आपस में भिड़ाने का षड्यंत्र रचते रहते हैं। जनप्रतिनिधियों की उदासीनता एवं चुप्पी इस अराजकता को बढ़ाने में अप्रत्यक्ष योगदान देती है। ऐसे में जब तक विघटनकारी शक्तियों और संकीर्ण स्वार्थ की राजनीति करने वाले दोमुंहे साँपों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करके उन्हें राष्ट्रद्रोह का दोषी मानते हुए सजा नहीं दी जाती, तब तक देश में सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की कल्पना नहीं की जा सकती। डॉ.सुधाकर आशावादी



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