Upgrade Jharkhand News. भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में चयन प्रतिभाशाली युवाओं का सपना होता है। प्रतिवर्ष सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम घोषित होते ही संचार माध्यमों में युवाओं के प्रदर्शन पर आधारित सफलता का गुणगान होता है। जातीय और क्षेत्रीय आधार पर प्रतिभागियों की रैंक चर्चा का विषय बनती है तथा सीमित साधनों के उपरांत सामान्य तथा उपेक्षित परिवारों के प्रतिभाशाली युवा युवा पीढ़ी के लिए प्रेरक व्यक्तित्व बन जाते हैं। समाचार पत्र व पत्रिकाएं सफल अभ्यर्थियों के साक्षात्कार प्रकाशित करके कठिन लक्ष्य प्राप्त करने कहानी प्रस्तुत करते हैं। कटु सत्य यही है कि विविध श्रेणियों के आरक्षण के उपरांत भी सामान्य वर्ग के प्रतिभाशाली युवा शीर्ष रैंक पाकर सफलता के शिखर को छूते हैं। जो इस परीक्षा में सफल नहीं हो पाते, वे पुनः इस परीक्षा में सफल होने के लिए गंभीर प्रयत्न करते हैं। इस परीक्षा में सफलता हेतु किए जाने वाले प्रयासों में गरीबी,अमीरी, जाति या धर्म आड़े नहीं आता।
इतिहास साक्षी है कि ये परीक्षाएं विशुद्ध योग्यता के आधार पर प्रतिभाशाली उम्मीदवार का चयन करती रही हैं। विगत कुछ समय से दृष्टिगत हो रहा है, कि नाच न जाने आँगन टेढ़ा बताने वाले असफल उम्मीदवार या उनके हितैषी इस परीक्षाओं में भी भेदभाव का आरोप लगाने से परहेज नहीं करते। जब से सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े उम्मीदवारों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण का विधान प्रभावी हुआ है तब से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को यह लगता है, कि सामान्य वर्ग के ई डब्लू एस श्रेणी के उम्मीदवार उनका हक़ छीन रहे हैं। ऐसे तत्व कभी परीक्षा में भेदभाव का आरोप लगाते हैं, कभी परीक्षा के एक अंग साक्षात्कार को अपने असफल होने का कारण बताते हैं। निसंदेह जिसे अपनी प्रतिभा पर भरोसा नहीं होता, वह अपनी असफलता का दोष औरों के मत्थे मढ़ता ही है।
यूँ तो देश की शीर्ष प्रशासनिक तथा चिकित्सा सेवाओं में किसी भी प्रकार के आरक्षण का प्रावधान होना ही नहीं चाहिए, इन परीक्षाओं के आवेदन पत्रों में अभ्यर्थी की जाति का कॉलम भी नहीं होना चाहिए। परीक्षा से जुड़े साक्षात्कार में जाति पूछना या जाति बताना दंडनीय होना चाहिए, ताकि कोई भी असफल उम्मीदवार चयनकर्ताओं पर जातिगत भेदभाव का आरोप न लगा सके तथा जातीय आरक्षण के नाम पर प्रशासनिक व चिकित्सा सेवाओं को पंगु न बनाया जा सके। डॉ. सुधाकर आशावादी

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