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Bhopal नकली दूध घी से कार्बाइड वाले फल तक हर जगह मिलावट From fake milk and ghee to carbide-laced fruits, adulteration is everywhere.

 


Upgrade Jharkhand News. नकली दूध-घी की फैक्ट्री का पकड़ा जाना,फलों और सब्जियों में इंजेक्शन लगाना क्या हमारे विकसित होने की निशानी है? आप कहेंगे क्या पागल जैसे सवाल पूछ रहा है!सही कहा मैं तब वाकई पागल ही हो जाता हूं जब  ऐसी खबरों को सुनता पढ़ता या देखता हूं। खाद्य पदार्थों में मिलावट करना कानूनन अपराध है मगर इन मिलावट खोरों की जानबूझ कर अनदेखी करना,उनसे इन संगीन जानलेवा अपराधों  को पकड़े जाने पर रिश्वत लेकर छोड़ देना इस मिलावट के अपराध से भी बड़ा अपराध है।जो शासन प्रशासन में बैठे हमारे कथित भाग्य विधाता हैं ,वे अपनी जेबें, तिजोरियां भरने में लिप्त हैं। यदि हम इस पर यह तर्क सुनें कि जनसंख्या बढ़ने के कारण यह स्थिति निर्मित हुई है तो प्रथम तो यह कुतर्क ही माना जाएगा।यह नेताओं ,अधिकारियों का नैतिक दायित्व है कि वे समाज को खाद्य पदार्थों के नाम पर विष देने वालों के विरुद्ध उचित कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं करते?


देश की भोली भाली जनता की आज यह स्थिति है कि वह खामोशी से इस अत्याचार को सह रही है। लगता है, उसने इस स्थिति को अपनी नियति ही मान लिया है। देश के नेताओं के एक सूत्रीय कार्यक्रम कि देश में केवल उन्हीं का राज कायम रहे और इस लक्ष्य की प्राप्ति में वे किसी को भी बाधक नहीं बनने देना चाहते!चाहे वे मिलावट खोर ही क्यों न हों। केवल औपचारिकता के नाम पर खाद्य अधिकारियों द्वारा खानापूर्ति करने के नाम पर सैंपल लेने की प्रक्रिया की जाती है, उसके पश्चात जनता भी खुश और अधिकारी भी सुखी। उन्हें उनकी जेबों की गर्मी खामोश कर देती हैं।परिणाम जनता लाइलाज रोगों से ग्रसित पीड़ा भोग रही होती है। देश में खाद्य विभाग तो बना है लेकिन इस विभाग में कर्मचारियों ,अधिकारियों की संख्या देखेंगे तो हैरान रह जाएंगे।एक अधिकारी के पास तीन तीन जिलों का प्रभार है! अब आप सोचिए कि एक चना भाड़ फोड़ सकता है?इतने अहम विषय पर सरकार का इस तरह उदासीन होना क्या दर्शाता है?


बाजार में नई अबोध पीढ़ी के लिए निर्माण किए जा रहे रंगीन वेफर्स में  कितनी घटिया खाद्य सामग्री पैक की जा रही है, इस पर कोई जिम्मेदार ध्यान नहीं देता। स्थानीय लालची वेफर्स निर्माता विख्यात कंपनियों के नाम के रंगीन पाउच धड़ल्ले से बेचने में सफल हैं ,और अकूत मुनाफा अर्जित कर रहे हैं मगर कोई देखने वाला नहीं! ऐसा प्रतीत होता है जैसे इस गोरख धंधे को सरकार का मूक समर्थन है।यदि ऐसा नहीं है तो इन लालची निर्माताओं को विषैली खाद्य सामग्री के निर्माण से रोका क्यों नहीं जाता? बच्चों का मानो विज्ञान यह है कि वे रंग बिरंगे पाउच की ओर आकर्षित होते हैं और वे इन्हें पाने के लिए हठ करते हैं। बाल हठ के समक्ष अच्छे अच्छों को झुकना पड़ता है नतीजा गंभीर रोग, लिवर फेल और असामयिक मृत्यु!


मौसमी फलों के नाम पर भी आज जो फल बेचे जा रहे हैं उनकी कहानी भी आपको पता ही होगी,नहीं है तो जान लीजिए। वर्तमान में फलों के सीजन में आम, पपीते का नंबर आता है। जिसे समय से पूर्व पीले करने अथवा जल्द पकाने हेतु कार्बाइड नाम के विषैले रसायन का उपयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है जो पूर्णतः प्रतिबंधित है,मगर इस में किसान से पूरे बगीचे खरीद कर व्यापारी खेतों में ही सिंचाई के दौरान कार्बाइड को सिंचाई में दिए जा रहे पानी में मिला कर उन्हें समय से पूर्व पीले पके हुए बताने लगता है। इसी प्रकार केला भी कार्बाइड में पका कर बेचा जा रहा है जो स्वास्थ्य खराब करने में सहायक है। आजकल बाजार में जो टमाटर आ रहा है बड़ा ही विचित्र टमाटर आ रहा है आपने भी महसूस किया होगा टमाटर का ऊपर का खोल इतना कठोर आ रहा है जिसे चबाने पर प्रतीत होता है वह प्लास्टिक कोटेड किया हुआ है! यह भी एक खोज का विषय है जो वैज्ञानिक ही कर सकते हैं। इसी प्रकार जब से रामदेव बाबा ने कहा है कि लौकी का ज्यूस ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है,उसकी मांग रातों रात बढ़ गई है। इसकी जल्द आपूर्ति और जल्द बड़ा करने के लिए प्रतिबंधित इंजेक्शन का उपयोग किया जा रहा है। गाय भैंसों से दूध बढ़ाने में भी इसका उपयोग किया जाता है। मैं उसका नाम यहां बताना उचित नहीं समझता मगर सुधि पाठक इसका नाम भलीभांति जानते ही होंगे। यह फलों, सब्जियों को विषैला ही बनाता है जो स्वास्थ्य वर्धक नहीं है।


ऐसा लगता है, यह भारी मुनाफा कमाने के साथ- साथ आधुनिक अस्पतालों को भी फलीभूत कर रहे हैं?सवाल यह खड़ा होता है कि आम आदमी इन जहरीले खाद्य पदार्थों, वस्तुओं से कैसे बचें, कौन बचाएगा?अराजकता की चरम सीमा पर आम ओ खास किंकर्तव्य विमूढ़ता की भयावह स्थिति में फंसा महसूस कर रहा है। अब भगवान ही है जो हमें बचा सकता है? पंकज शर्मा "तरुण"



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