Upgrade Jharkhand News. वरिष्ठ व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य लेखन आज के दौर की विसंगतियों, राजनीतिक पाखंड और सामाजिक दोहरेपन पर एक करारी चोट है। उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे केवल समस्याओं को उजागर नहीं करते, बल्कि मानवीय प्रवृत्तियों का गहराई से विश्लेषण भी करते हैं। लेखक ने 'आठवीं पीढ़ी की व्यवस्था' जैसे व्यंग्यों के माध्यम से राजनीति में व्याप्त वंशवाद और संचय की प्रवृत्ति पर तीखा प्रहार किया है। वे बताते हैं कि कैसे एक नेता अपनी सात पीढ़ियों का इंतजाम करने के बाद आठवीं पीढ़ी के लिए अपने बेटे को राजनीति में लॉन्च करने की जुगत में रहता है।
'जुगाड़ मतलब टैक्टफुलनेस' और 'सेवा का मेवा' जैसे लेखों में लेखक ने हमारे समाज की 'जुगाड़' संस्कृति और परोपकार के नाम पर चल रहे व्यापार को बड़ी चतुराई से उकेरा है। उदाहरण के लिए, 'सेवा का मेवा' में वे दिखाते हैं कि कैसे पुराने कॉलेज मित्र अब 'प्रभु' बनकर सेवा के नाम पर मेवा खा रहे हैं। 'डीप फेक है यह दुनिया' के जरिए लेखक ने आधुनिक तकनीक के खतरों और हमारी 'डिजिटल दुकानदारी' पर व्यंग्य किया है, जहाँ असल और नकल का भेद करना मुश्किल हो गया है। विवेक जी सहज और पठनीय शैली के धनी हैं । उनकी भाषा सरल, बोलचाल की और व्यंग्य की धार से भरपूर होती है। वे 'जुगाड़' जैसे देसी शब्दों को 'टैक्टफुलनेस' जैसे मैनेजमेंट के भारी-भरकम शब्दों से जोड़कर पाठकों को एक साथ सटायर विट और ह्यूमर से हँसने और सोचने पर मजबूर कर देते हैं।
विवेक रंजन के व्यंग्य वैश्विक कैनवास पर सहजता से प्रकट होते हैं। उनका लेखन उन लोगों के लिए एक आईना है जो समाज की विकृतियों को देखना और समझना चाहते हैं। चूं चूं की खोज , 75 मजेदार समकालीन व्यंग्य लेखों का संग्रह है । यह आम आदमी का मनोरंजन तो करता ही है, पाठक को अपने आस-पास की दुनिया के प्रति अधिक जागरूक और संवेदनशील भी बनाता है। किताब पैसा वसूल और संग्रहणीय है।

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