Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

Bhopal साहित्य, दर्शन और मानवीय संवेदना की त्रिवेणी गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर Gurudev Rabindranath Tagore, the confluence of literature, philosophy and human sensitivity

 


Upgrade Jharkhand News.  ​विश्व साहित्य के गगन में 'गुरुदेव' रवींद्रनाथ ठाकुर एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनका प्रकाश युगों-युगों तक मानवता को आलोकित करता रहेगा । वे केवल एक कवि या साहित्यकार नहीं थे, बल्कि एक बहुआयामी प्रतिभा के धनी, दार्शनिक, चित्रकार, संगीतकार और मानवतावादी शिक्षक थे । 7 मई 1861 को कोलकाता के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे रवींद्रनाथ ठाकुर की जयंती के पावन अवसर पर, उनके संपूर्ण साहित्यिक अवदान और उनकी यात्रा का स्मरण करना भारतीय चेतना के लिए अत्यंत प्रेरणादायी है। रवींद्रनाथ की साहित्यिक यात्रा अत्यंत विस्तृत और प्रयोगधर्मी रही है। ठाकुर साहब की प्रारंभिक रचनाओं में प्रकृति और सौंदर्य के प्रति उनका अगाध प्रेम दिखाई देता है। 'संध्या संगीत' और 'प्रभात संगीत' जैसी रचनाओं में उनके भीतर के कवि का उदय हुआ। 


सोलह वर्ष की उम्र में 'भानुसिंह ठाकुर' के छद्म नाम से उन्होंने वैष्णव पदावलियों से प्रभावित होकर कविताओं की रचना की, जिससे उनकी विलक्षण प्रतिभा का परिचय मिलता है । आगे 1910 में प्रकाशित 'गीतांजलि' उनके साहित्यिक जीवन का मील का पत्थर सिद्ध हुई। यह केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और आध्यात्मिक मिलन की एक अनूठी यात्रा है । ​1913 में 'गीतांजलि' के लिए रवींद्रनाथ ठाकुर को साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। इस उपलब्धि ने उन्हें एशियाई महाद्वीप का पहला नोबेल पुरस्कार विजेता बनाया और भारतीय साहित्य को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान दिलाई। उनकी 'काबुलीवाला', 'पोस्टमास्टर' और 'छुट्टी' जैसी कहानियाँ मानवीय संवेदनाओं, विशेषकर बाल मनोविज्ञान और ग्रामीण जीवन के यथार्थ का अत्यंत मार्मिक और जीवंत चित्रण करती हैं । उनके उपन्यासों में विशेषकर 'गोरा' और 'घरे-बाहरे' ने तत्कालीन समाज, राष्ट्रवाद और नारी अधिकारों के विषयों पर गहन विमर्श प्रस्तुत किया है।


साहित्य के साथ-साथ उनका संगीत भी उनकी यात्रा का अभिन्न अंग रहा है। उनके द्वारा रचित लगभग 2,230 गीत 'रवींद्र संगीत' कहलाते हैं, जो आज भी बंगाली संस्कृति की आत्मा हैं। भारत का राष्ट्रगान 'जन गण मन' और बांग्लादेश का राष्ट्रगान 'आमार सोनार बांग्ला' उनकी अमर रचनाएं हैं। ​रवींद्रनाथ ठाकुर के साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता उनका 'मानवतावाद' है। वे संकीर्ण राष्ट्रवाद की सीमाओं से परे विश्व-बंधुत्व में विश्वास रखते थे। उनके साहित्य में ​नारी सशक्तिकरण और उनकी पीड़ा मुखर हुई है। साथ ही शिक्षा और प्रकृति के बीच घनिष्ठ संबंध पर जोर दिया गया, जिसका परिणाम 'शांतिनिकेतन' और 'विश्वभारती' की स्थापना के रूप में सामने आया । उन्होंने रूढ़िवादी परंपराओं का विरोध कर समाज को एक प्रगतिशील दृष्टि प्रदान की है। 


​गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की साहित्यिक यात्रा केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का पुनर्जागरण है। उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक है क्योंकि वह हमें अपनी जड़ों से जुड़कर संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देता है। उनकी जयंती पर उनका स्मरण हमें उनके दिखाए मार्ग पर चलने की शक्ति देता है। उन्हें कोटि-कोटि नमन। डॉ. मीना 'मुक्ति



No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU

-ADVERTISEMENT-

.