Upgrade Jharkhand News. आज मौसम बड़ा बेईमान है बड़ा बेईमान है आज मौसम। कभी कभी बिन बादल बरसात हो जाती है, कभी तेज हवाएं चलती हैं, कभी गर्मी में सर्दी का एहसास होता है, कभी शिमला रिज पर घूमने का सा आनंद घर की छत पर मिल जाता है। सब मौसम की मेहरबानी है। वैसे यह मन का विषय है, कि मौसम अनुकूलता और प्रतिकूलता का आभास हम कैसे करते हैं। प्राकृतिक मौसम की तरह राजनीतिक मौसम भी कई बार बदलता है। हाल ही में कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। मौसम विज्ञानियों में अपने अपने कयास लगाए, कि चुनाव परिणाम किसके स्वास्थ्य के अनुकूल मौसम का निर्माण करेंगे और किसके प्रतिकूल। चुनाव परिणाम आए और मौसम विज्ञानियों के कयासों पर पानी फेर गए। जिसे गुमान था, कि मौसम उनकी मुट्ठी से बाहर निकलने का दुस्साहस नहीं करेगा, उनके अनुकूल रहेगा, यकायक बेवफा हो गया या यूँ कहिये कि बेईमान हो गया। उसने तनिक भी नहीं सोचा, कि वह जिसके अनुकूल चल रहा था, उसके अनुकूल ही चले, मगर मौसम है, अपनी मर्जी का मालिक। बहरहाल मौसम बदल गया।
मौसम को अपने अनुकूल बनाये रखने के प्रयास विफल हो गए। कुछ के लिए जहाँ मौसम हिमाचल और कश्मीर की वादियों सा सुहाना ठंडक भरा हो गया, वहीं कुछ के लिए मौसम रुदन का कारण बन गया। रुदालियाँ सड़कों पर उत्तर आई। वे मौसम को गलियां देने लगी। वे उन्हें भी गलियां देने लगी, जिनके अनुकूल मौसम हो गया था। यह उनकी नियति थी। रुदालियाँ बेचारी करती भी तो क्या करती। उनका जन्म ही रुदन के लिए हुआ है। उन्हें किसी की ख़ुशी सहन नहीं होती। उन्हें किसी के दुःख में रुदन के लिए ही पैसे मिलते हैं , यदि उनका रुदन अभ्यास समाप्त हो गया, तो इसका प्रतिकूल असर रुदालियों के व्यवसाय पर पड़ना स्वाभाविक होता है। कुछ रुदालियाँ ऐसी भी हैं, जिन्हें किसी की जीत हार से कोई सरोकार नहीं होता।
उनके लिए सातों दिन एक से रहते हैं। न जीत की ख़ुशी न हार का गम। रुदन उनके लिए सिर्फ़ औपचारिकता निभाने तक सीमित रहता है, रुदन के लिए उन्हें कुछ भी सोचना नहीं होता, उन्हें सिर्फ रुदन करना होता है। हर बार यही होता हो, बार बार यही होता है। कोई हारता है, कोई विजय का वरण करता है, मगर रुदालियों के लिए रुदन का मौसम बार बार आता है, वह भी विशेषकर उस समय, जब चुनावों के परिणाम आते हैं। रुदालियाँ सड़कों पर सोशल मीडिया पर या अन्य अनेक मंचों पर अपने विशेष एपिसोड दिखाना शुरू कर देती हैं। यह उनका उनके धंधे के प्रति समर्पण भी कहा जा सकता है और उनकी वफादारी भरी मजबूरी भी। सुधाकर आशावादी

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